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जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं उन लोगों ने ही राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति को गायब किया है - अनूप मित्रा

केशव कुमार भट्टड़•18 जुलाई 20267 मिनट पठन108 बार पढ़ा गया

​जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं और सवाल पूछने से डरते हैं, वे ही राहुल सांकृत्यायन जैसे लोगों की मूर्तियों तक को गायब कर देना चाहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका मानना है कि अगर राहुल की मूर्ति आँखों के सामने रहेगी, तो आज की पीढ़ी के मन में भी यह सवाल जागेगा कि यह व्यक्ति कौन था? इसी उत्सुकता के चलते लोग राहुल सांकृत्यायन के जीवन, उनके दर्शन, उनके साहित्य और उनके संघर्षों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे।


​राहुल सांकृत्यायन के पूरे जीवन को समझने पर पता चलता है कि वे एक तरफ जहाँ ज्ञान प्राप्त करने के भूखे थे, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के लोगों के जीवन के दुखों और उनके संघर्षों के गवाह भी बनना चाहते थे। 1938 में अपनी चौथी तिब्बत यात्रा पूरी कर जब वे कलकत्ता लौटे, तो उन्होंने सक्रिय राजनीति में शामिल होने की घोषणा की। उन्होंने सोमनाथ लाहिड़ी सहित कई लोगों से संपर्क किया। वे किसान आंदोलन में शामिल हुए और अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष भी बने। इस दौरान राहुल किसानों और चीनी मिल के मजदूरों के बीच काम करते रहे। 1939 में जब बिहार के मुंगेर में कम्युनिस्ट पार्टी की बिहार यूनिट का गठन हुआ, तो राहुल सांकृत्यायन इसके संस्थापक सदस्यों में से एक थे। किसान आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल में भी समय बिताना पड़ा।

जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं उन लोगों ने ही राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति को गायब किया है - अनूप मित्रा

जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं उन लोगों ने ही राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति को गायब किया है

  • अनूप मित्रा

​जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं और सवाल पूछने से डरते हैं, वे ही राहुल सांकृत्यायन जैसे लोगों की मूर्तियों तक को गायब कर देना चाहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका मानना है कि अगर राहुल की मूर्ति आँखों के सामने रहेगी, तो आज की पीढ़ी के मन में भी यह सवाल जागेगा कि यह व्यक्ति कौन था? इस इंसान के बारे में वैसे तो हमें कुछ खास पता नहीं है। और इसी उत्सुकता के चलते लोग राहुल सांकृत्यायन के जीवन, उनके दर्शन, उनके साहित्य और उनके संघर्षों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे। इसी सोच के साथ, 1993 में 9 अप्रैल को महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जन्मशती मनाने का कार्यक्रम रानीगंज के कुछ साहित्य प्रेमियों ने हाथ में लिया था। राहुल सांकृत्यायन को आम लोगों तक पहुँचाने की यह सोच श्रमिक आंदोलन के नेता, वर्तमान में दिवंगत कॉमरेड विवेक चौधरी ने शुरू की थी। उन्हीं की पहल पर लेखकों, कलाकारों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और लोकतांत्रिक आंदोलन के कार्यकर्ताओं को मिलाकर रानीगंज में "राहुल सांकृत्यायन जन्मशती आयोजन समिति" का गठन किया गया। इस काम से तत्कालीन अविभाजित बर्धमान (बर्धमान) जिले के अग्रणी लोग जुड़े।

​उनका जन्म 9 अप्रैल 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा गाँव में हुआ था। नाम था केदारनाथ पांडे। पिता गोवर्धन पांडे और माता कुलवंती देवी थीं। बाद में, एक बौद्ध भिक्षु के रूप में उन्होंने 'राहुल सांकृत्यायन' नाम अपनाया। काशी पंडित सभा से उन्हें 'महापंडित' की उपाधि मिली। एक जानकारी के अनुसार, भले ही काशी महापंडित सभा ने उन्हें 'महापंडित' की उपाधि दी थी, लेकिन उनकी कोई औपचारिक या पारंपरिक स्कूली शिक्षा न होने के कारण भारत के किसी भी शैक्षणिक संस्थान ने उन्हें नहीं बुलाया। इसके विपरीत, उन्हें श्रीलंका के बौद्ध विहारों और उस समय पूर्वी ज्ञान की शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ केंद्र 'लेनिनग्राद विश्वविद्यालय' से अध्यापन के लिए आमंत्रण मिला। उन्होंने कई देशी और विदेशी भाषाओं पर महारत हासिल की थी।

​ज्ञान अर्जित करने, दुनिया के लोगों को प्रत्यक्ष देखने और उनके जीने के संघर्ष को बिल्कुल करीब से समझने की तीव्र इच्छा लेकर वे एक 'विश्व यात्री' बन गए। इस ज्ञान के सफर में उन्होंने समाज या अर्थव्यवस्था, किसी भी पहलू की उपेक्षा नहीं की। इसीलिए उन्होंने खुद को कभी भी एक तय ढर्रे की जिंदगी में बाँधकर नहीं रखा।

​राहुल सांकृत्यायन के पूरे जीवन को समझने पर पता चलता है कि वे एक तरफ जहाँ ज्ञान प्राप्त करने के भूखे थे, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के लोगों के जीवन के दुखों और उनके संघर्षों के गवाह भी बनना चाहते थे। 1938 में अपनी चौथी तिब्बत यात्रा पूरी कर जब वे कलकत्ता लौटे, तो उन्होंने सक्रिय राजनीति में शामिल होने की घोषणा की। उन्होंने सोमनाथ लाहिड़ी सहित कई लोगों से संपर्क किया। वे किसान आंदोलन में शामिल हुए और अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष भी बने। इस दौरान राहुल किसानों और चीनी मिल के मजदूरों के बीच काम करते रहे। 1939 में जब बिहार के मुंगेर में कम्युनिस्ट पार्टी की बिहार यूनिट का गठन हुआ, तो राहुल सांकृत्यायन इसके संस्थापक सदस्यों में से एक थे। किसान आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल में भी समय बिताना पड़ा।

​वर्ष 1993 में हमारे राज्य के कई जिलों में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जन्मशती मनाने का कार्यक्रम तय किया गया। अविभाजित बर्धमान जिले के रानीगंज में 9 अप्रैल को शताब्दी समारोह की शुरुआत हुई। तत्कालीन कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर और राज्य की जन्मशती आयोजन समिति की ओर से तुषारकांति तालुकदार ने उद्घाटन भाषण दिया। जननेता सांसद हाराधन राय सहित कई शिक्षाविद मंच पर उपस्थित थे। राहुल सांकृत्यायन के जीवन पर एक चित्र प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इसके बाद, ​साल भर इस लगभग गुमनाम इंसान के विभिन्न पहलुओं पर अलग-अलग क्षेत्रों में संगोष्ठी आयोजित की गईं। राहुल सांकृत्यायन ने मुख्य रूप से जिन मजदूरों और किसानों के लिए काम किया था, उनके बीच भी कई जगहों पर छोटी-छोटी संगोष्ठी आयोजित की गईं। राहुल के बारे में जानने वाले शिक्षक, शिक्षिकाएँ और प्रोफेसर इस काम से जुड़े। साल भर चले विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से राहुल सांकृत्यायन को जानने और पहचानने का काम शुरू हुआ। इसी समय यह तय हुआ कि रानीगंज के प्रवेश द्वार रानीगंज मोड़ पर राहुल सांकृत्यायन की एक आदमकद मूर्ति स्थापित की जाएगी। पुरुलिया के प्रसिद्ध मूर्तिकार ध्रुव दास ने यह मूर्ति तैयार की। अगले वर्ष, 9 अप्रैल 1994 को रानीगंज मोड़ पर यह मूर्ति स्थापित कर दी गई। इस एक वर्ष के भीतर महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बारे में बहुत लोगों की रुचि बढ़ी। मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम में भारी संख्या में लोग मौजूद थे। केवल मुट्ठी भर लेखक और बुद्धिजीवी ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में मजदूर और मेहनतकश आम लोग भी वहाँ पहुँचे थे। इस आदमकद मूर्ति का अनावरण पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्रता सेनानी और किसान आंदोलन के नेता बिनय कृष्ण चौधरी ने किया था। इस अवसर पर राहुल सांकृत्यायन की पत्नी डॉ. कमला सांकृत्यायन, पुत्र प्रोफेसर जेता सांकृत्यायन, पुत्री जया सांकृत्यायन, मूर्तिकार ध्रुव दास और जननेता हाराधन रॉय आदि उपस्थित थे।


​तभी से हर साल 9 अप्रैल को महापंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्मदिन पश्चिम बंग गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ की ओर से मनाया जाता रहा है। इस वर्ष भी यह दिन मनाया गया। ​बीते 12 जुलाई, रविवार की देर रात रानीगंज मोड़ पर स्थित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति पूरी तरह से गायब हो गई। यह बात अगले दिन सोमवार को लोगों के सामने आई। घटनास्थल पर जाने पर देखा गया कि मूर्ति वहाँ नहीं है, बस ईंट और पत्थरों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। घटनास्थल राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाईवे) के बीच में है और पास में ही फ्लाईओवर है, जहाँ हमेशा बड़ी संख्या में पुलिस तैनात रहती है। इसके बावजूद ऐसी घटना घट गई। तुरंत स्थानीय पुलिस चौकी (आईसी) को मामले की जानकारी दी गई, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ नहीं पता। इसके बाद रानीगंज थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई। घटना की तुरंत जांच कर दोषियों को सजा देने और मूर्ति को फिर से स्थापित करने की मांग की गई। मंगलवार, 14 जुलाई की शाम को उसी स्थान पर एक विरोध सभा आयोजित की गई। हर किसी ने इस घटना की निंदा की। मूर्ति तोड़े जाने की घटना का माकपा (सीपीएम) पश्चिम बर्धमान जिला कमेटी के सचिव गौरांग चटर्जी ने कड़ा विरोध किया है। पश्चिम बंग गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ के राज्य सचिव रजत बंदोपाध्याय ने भी इस घटना की तीव्र निंदा की है और अपराधियों को सजा देने व मूर्ति को दोबारा स्थापित करने की मांग की है।

​हालांकि, उपद्रवियों की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। लेकिन विरोध सभा के तुरंत बाद, जब पार्टी कार्यकर्ता स्थानीय सियारसोल पार्टी कार्यालय में बैठे थे, तब बस्ती संगठन के पश्चिम बर्धमान जिला सचिव संजय प्रामाणिक को भाजपा कार्यकर्ताओं के एक समूह ने धमकी दी कि उन्होंने यह सभा क्यों आयोजित की। हालांकि, इलाके के लोगों के विरोध के कारण वे वहाँ से भाग गए।

​असल में यह समझना मुश्किल नहीं है कि शासक कभी भी बहुलतावाद को स्वीकार नहीं कर सकते। वे ज्ञान अर्जित करने और स्वतंत्र सोच के विरोधी हैं। इसीलिए अब लेनिन से लेकर राहुल सांकृत्यायन जैसे लोग उनके गुस्से के निशाने पर हैं।

​लेकिन राहुल सांकृत्यायन एक निडर खोजी थे, जो ज्ञान के मार्ग पर प्रकाश की तलाश में आगे बढ़ने से कभी नहीं डरते थे। उनकी मूर्ति को गायब करने जैसी इस जघन्य घटना के खिलाफ विरोध और निंदा की आवाजें राज्य के कोने-कोने में गूँज रही हैं।



फोटो (ऊपर से)

(01) राहुल सांकृत्यायन की रानीगंज में स्थापित मूर्ति, जो रात के अंधेरे में गायब कर दी गई।

(02) राहुल सांकृत्यायन की पत्नी डॉ. कमला सांकृत्यायन का सम्मान करते हुए सांसद श्रमिक नेता हाराधान राय

(03) भाषण देती हुई डॉ. कमला सांकृत्यायन
(04) भाषण देते हुए राहुल सांकृत्यायन के पुत्र प्रोफेसर जेता सांकृत्यायन

(05) रानीगंज की एक सभा में भाषण देते हुए राहुल सांकृत्यायन की बेटी जया सांकृत्यायन

लेखक गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ (रानीगंज आंचलिक कमेटी) के पूर्व सचिव हैं।
साभार: बांग्ला साप्ताहिक पत्रिका 'देशहितैषी', अनुवाद: 'अपराजिता', फोटो साभार

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जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं उन लोगों ने ही राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति को गायब किया है - अनूप मित्रा

प्रकाशित: 18 जुलाई 2026 • 7 मिनट पठन

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सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।

लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।


केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

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