किसान सभा के अध्यक्ष मेघनाथ भूइयां और संपादक परेश पाल ने एक संयुक्त बयान में इस घटना पर गहरी चिंता और आक्रोश व्यक्त किया है। उनका आरोप है कि 14 जुलाई की सुबह तड़के इलाके की बत्तियां बुझाकर और सीसीटीवी कैमरों को निष्क्रिय करके योजनाबद्ध तरीके से इस घटना को अंजाम दिया गया है।
लेनिन की मूर्ति तोड़ने से जिस राजनीति की शुरुआत हुई थी, अब उसी की निरंतरता में स्वतंत्रता सेनानी, जनवादी लेखक, मार्क्सवादी विचारक और किसान आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति भी तोड़फोड़ का शिकार हुई है। इसे लेकर पश्चिम बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने सवाल उठाया है कि क्या इस तरह राहुल सांकृत्यायन जैसे महान मनीषी के आदर्शों को मिटाना संभव है?
गत रविवार को पश्चिम बर्धमान के रानीगंज में 19 नंबर राष्ट्रीय राजमार्ग के मोड़ पर पिछले लगभग 3 दशकों से स्थापित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति को रातों-रात तोड़कर हटा दिया गया। किसान सभा के अध्यक्ष मेघनाथ भूइयां और संपादक परेश पाल ने एक संयुक्त बयान में इस घटना पर गहरी चिंता और आक्रोश व्यक्त किया है। उनका आरोप है कि 14 जुलाई की सुबह तड़के इलाके की बत्तियां बुझाकर और सीसीटीवी कैमरों को निष्क्रिय करके योजनाबद्ध तरीके से इस घटना को अंजाम दिया गया है। इसके बाद प्रदर्शनकारियों के प्रति स्थानीय सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं का हिंसक और आक्रामक रवैया भी एक बड़ी साजिश का संकेत देता है।
किसान सभा का कहना है कि राहुल सांकृत्यायन देश के सबसे सम्मानित स्वतंत्रता सेनानियों, प्रख्यात विद्वानों, समाजवादी विचारकों और अखिल भारतीय किसान आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक थे। भारतविद् (Indology), दर्शन और समाजवाद में उनका असाधारण योगदान, जमींदार-विरोधी किसान आंदोलनों में उनकी भागीदारी और जेल यात्रा ने उन्हें जनता का प्रिय नेता बनाया था। 36 भाषाओं के जानकार इस मनीषी को हिंदी भाषा का पहला 'महापर्यटक' भी कहा जाता है। अपने 45 वर्षों के लंबे भ्रमण जीवन में उन्होंने कई बहुमूल्य पुस्तकों की रचना की।
इस घटना की तीव्र निंदा करते हुए पश्चिम बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने तत्काल निष्पक्ष जांच, दोषियों को सजा और उसी स्थान पर पूरे सम्मान के साथ राहुल सांकृत्यायन की एक पूर्ण आदमकद मूर्ति फिर से स्थापित करने की मांग की है।
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साभार: गणशक्ति
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