आयोग ने कुल 44 लोगों को तलब किया था। उनमें बुद्धदेव भट्टाचार्य, तत्कालीन गृह सचिव मनीष गुप्त, पूर्व मुख्य सचिव एन. कृष्णमूर्ति, पूर्व पुलिस कमिश्नर तुषारकांति तालुकदार, बिमान बोस, सोमेन मित्र, मदन मित्र, सौगत रॉय सहित कई राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तियां शामिल थीं। हालांकि, तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष पंकज बनर्जी आयोग के सामने पेश नहीं हुए थे। उनका आरोप था कि गोलीबारी के लिए जिसे वह ज़िम्मेदार मानते हैं, उस मनीष गुप्त को आयोग ने वस्तुतः बरी कर दिया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने 21 जुलाई की गोली कांड की घटना की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया था। लेकिन उसी आयोग को राइटर्स बिल्डिंग में मौजूद सरकारी दस्तावेज़ क्यों नहीं सौंपे गए? क्यों आयोग की रिपोर्ट लगभग 12 साल बाद भी सार्वजनिक नहीं की गई? और 21 जुलाई आंदोलन की मुख्य आयोजक होने के बावजूद ममता बनर्जी ने खुद गवाही क्यों नहीं दी? सोमवार को विधानसभा में '21 जुलाई जांच आयोग' की रिपोर्ट पेश होने के बाद ये सवाल एक बार फिर सामने आ गए हैं।
17 फरवरी 2012 को तृणमूल सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशांत चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। आयोग ने 30 दिसंबर 2014 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन यह सार्वजनिक नहीं हुई। सोमवार को विधानसभा में इसे पेश करते हुए शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि आयोग को तत्कालीन राज्य सरकार से कोई भी सरकारी दस्तावेज़ हासिल नहीं हुआ था।
बुद्धदेव भट्टाचार्य के सवालों का जवाब नहीं मिला
इसी संदर्भ में दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का बयान एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है। 26 फरवरी 2014 को आयोग के समक्ष गवाही देते हुए उन्होंने सवाल उठाया था—
"सरकारी दस्तावेज़ मिले बिना सच सामने कैसे आएगा?"
उन्होंने आयोग के अध्यक्ष को सलाह दी थी कि तत्कालीन गृह सचिव मनीष गुप्त से पूछताछ की जाए और प्रशासनिक जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाए।
पुलिस गोली कांड की हर घटना की प्रशासनिक जांच रिपोर्ट सरकार के पास सुरक्षित रहनी चाहिए। इसके बावजूद तृणमूल सरकार ने दावा किया था कि 21 जुलाई 1993 की वह रिपोर्ट मिल नहीं रही है। उसी समय बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आगाह किया था कि सरकारी दस्तावेज़ गुम हुए हैं या उन्हें जानबूझकर नष्ट किया गया है—इसकी भी अलग से उचित जांच होनी चाहिए। उनकी वही आशंका सोमवार को रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर चर्चा में आ गई।
शुभेंदु अधिकारी का आरोप है कि सरकारी दस्तावेज़ न होने के कारण आयोग लगभग 300 लोगों की गवाही सुनकर रिपोर्ट तैयार करने के लिए मजबूर हुआ। आयोग ने मृतक 12 लोगों के परिवारों को 25 लाख रुपये और घायलों को 5 लाख रुपये के मुआवजे की सिफारिश की थी, लेकिन उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन तृणमूल सरकार ने मृतक परिवारों को केवल 2 लाख रुपये और घायलों को मात्र 15 हजार रुपये दिए थे। उनके शब्दों में "जिन्होंने आयोग का गठन किया था, वही ममता बनर्जी आयोग के समक्ष गवाही देने नहीं गईं।"
आयोग ने कुल 44 लोगों को तलब किया था। उनमें बुद्धदेव भट्टाचार्य, तत्कालीन गृह सचिव मनीष गुप्त, पूर्व मुख्य सचिव एन. कृष्णमूर्ति, पूर्व पुलिस कमिश्नर तुषारकांति तालुकदार, बिमान बोस, सोमेन मित्र, मदन मित्र, सौगत रॉय सहित कई राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तियां शामिल थीं। हालांकि, तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष पंकज बनर्जी आयोग के सामने पेश नहीं हुए थे। उनका आरोप था कि गोलीकांड के लिए जिसे वह ज़िम्मेदार मानते हैं, उस मनीष गुप्त को आयोग ने वस्तुतः बरी कर दिया।
तृणमूल का दावा था कि 21 जुलाई को 13 लोगों की मौत हुई थी। लेकिन आयोग की रिपोर्ट में 12 लोगों की पहचान की पुष्टि होने का उल्लेख है। एक व्यक्ति के शव की शिनाख्त नहीं हो सकी थी। उसकी पहचान या मौत की परिस्थितियों के संबंध में भी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं मिली।
विधानसभा में शुभेंदु अधिकारी ने आगे आरोप लगाया "21 जुलाई का इस्तेमाल करके राजनीतिक सत्ता से लेकर व्यक्तिगत संपत्ति तक, सब कुछ हासिल किया गया है।"
इसके साथ ही उन्होंने बताया कि पीड़ित परिवार चाहें तो नई प्राथमिकी दर्ज करा सकते हैं, और आयोग की सिफारिश के अनुसार मुख्यमंत्री राहत कोष से मृतक परिवारों को 25 लाख रुपये और घायलों को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा।
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