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मेरी नौकरी कहाँ है?: सैनिक शूर

राजीव कुमार पाण्डेय•22 जुलाई 20266 मिनट पठन16 बार पढ़ा गया

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिन्हें हम 'व्हाइट कॉलर' कर्मचारी कहते हैं, उन्हें भी रोजगार के लिए बेंगलुरु या गुड़गांव जाना पड़ता है। हमारे कोलकाता शहर के साल्ट लेक सेक्टर 5 के बाद कोई 'सेक्टर 6' नहीं बना, जिसके कारण 'प्रवासी इंजीनियरों' को बाहरी राज्यों में जाकर स्क्रीन के सामने 12 से 14 घंटे दमघोंटू ड्यूटी करनी पड़ रही है। अकेले कोलकाता कॉर्पोरेशन के विभिन्न विभागों में लगभग 30,000 स्थायी पद खाली पड़े हैं। यदि इन पदों पर पारदर्शी भर्ती हो, तो शहर के 144 वार्डों में औसतन हर वार्ड के 200 युवाओं को रोजगार मिल सकता है।

मेरी नौकरी कहाँ है?: सैनिक शूर

सरीफुल सरदार, हमारे राज्य के एक सुदूर गांव के रहने वाले हैं। वे एक प्रवासी श्रमिक के रूप में काम करते थे। साल 2021 में जब कोविड महामारी का प्रकोप चरम पर था, तब सरीफुल को गुजरात से वापस अपने गांव लौटना पड़ा था। 'सबका विकास' का ढोल पीटने वाली सरकार ने संकट के उस दौर में इन श्रमिकों को घर पहुंचाने तक का कोई इंतजाम नहीं किया, जिसके कारण सरीफुल को गुजरात से 23 दिनों तक पैदल चलकर अपने गांव आना पड़ा था। वापस लौटने पर उन्हें अपने गांव, शहर या राज्य में कोई काम नहीं मिला। परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें फिर से बाहरी राज्य का रुख करना पड़ा।

रोजगार न देने वाले हुक्मरान ही ऐसे मजबूर लोगों को 'प्रवासी श्रमिक' (माइग्रेंट वर्कर) का नाम दे देते हैं। असल में, इन्हें 'घरछूटे' या 'घर से बेघर' श्रमिक कहना अधिक न्यायसंगत होगा, क्योंकि कड़वी हकीकत को छिपाने के लिए इन पर 'प्रवासी' का ठप्पा लगा दिया जाता है। यह स्थिति मोदी सरकार के 'गुजरात मॉडल' के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर करती है। 'डिजिटल इंडिया' का शोर मचाने वाली व्यवस्था ने युवाओं को सिर्फ 'रोजगारहीन युवा' बनाकर छोड़ दिया है। भाजपा शासित राज्यों में तो इन घर से बेघर श्रमिकों को केवल बांग्ला बोलने के 'अपराध' में मारपीट कर काम से निकाल दिया जाता है।

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिन्हें हम 'व्हाइट कॉलर' कर्मचारी कहते हैं, उन्हें भी रोजगार के लिए बेंगलुरु या गुड़गांव जाना पड़ता है। हमारे कोलकाता शहर के साल्ट लेक सेक्टर 5 के बाद कोई 'सेक्टर 6' नहीं बना, जिसके कारण 'प्रवासी इंजीनियरों' को बाहरी राज्यों में जाकर स्क्रीन के सामने 12 से 14 घंटे दमघोंटू ड्यूटी करनी पड़ रही है। अकेले कोलकाता कॉर्पोरेशन के विभिन्न विभागों में लगभग 30,000 स्थायी पद खाली पड़े हैं। यदि इन पदों पर पारदर्शी भर्ती हो, तो शहर के 144 वार्डों में औसतन हर वार्ड के 200 युवाओं को रोजगार मिल सकता है। मगर, भाजपा और तृणमूल जैसी शासक श्रेणियां स्थायी रोजगार की अवधारणा पर ही कुठाराघात कर रही हैं।

केंद्र सरकार कोलकाता में भारी उद्योगों वाले सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के शेयर निजी कंपनियों को बेच रही है। गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, बंगाल केमिकल्स और काशीपुर गन एंड शेल फैक्ट्री जैसे संस्थान, जो कभी कोलकाता के युवाओं के लिए रोजगार के बड़े केंद्र हुआ करते थे, वे अब लगातार फैक्ट्रियों में तालाबंदी के कारण श्मशान बनते जा रहे हैं। सरकार स्थायी पदों पर नियमित भर्ती करने के बजाय अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) और अस्थायी कर्मचारियों के जरिए 'बाध्य और बंधुआ मजदूर' तैयार करने में जुटी है। देश के 93% युवा असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं, जहां न तो काम की कोई गारंटी है और न ही न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा। नए श्रम कोड के नियमों ने काम के घंटे बढ़ाकर 12-14 घंटे कर दिए हैं और ऊपर से हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती है।

भाजपा और तृणमूल ने मिलकर पूरी व्यवस्था को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। बुनियादी मुद्दों और रोजगार की मांग से युवाओं का ध्यान भटकाने के लिए नफरत और हिंसा का माहौल बनाया जा रहा है। जब हम इस संकट की तह में जाते हैं, तो पाते हैं कि रोजगार के अवसरों को कम करना वास्तव में इस नव-उदारवादी ढांचे को बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति है। युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल रहा है और उन्हें निजी कंपनियों में बेहद कम वेतन पर काम करना पड़ रहा है। यह कृत्रिम संकट सिर्फ शासक वर्ग के मुनाफे की अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए तैयार किया गया है।

भारत की कुल जनसंख्या का 60% से अधिक हिस्सा युवाओं (15 से 40 वर्ष की आयु) का हैं। पूरी दुनिया में युवा आबादी के मामले में भारत पहले स्थान पर है। इसके बावजूद, हर साल स्थायी रोजगार के अवसर सुनियोजित तरीके से कम किए जा रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के लाखों खाली पदों को भरने के बजाय सरकारी तंत्र को ठेका प्रथा पर चलाया जा रहा है, ताकि श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी के अधिकारों से वंचित रखा जा सके। लघु और मध्यम उद्योगों की बदहाली ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। आरजी कर अस्पताल के मामले को ही देखें, तो वहां भी अधिकांश स्वास्थ्य कर्मचारी अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर कार्यरत हैं, जबकि सैकड़ों स्थायी पद खाली पड़े हैं। कार्यस्थल पर युवतियों को समान अधिकार देने के बजाय उनके काम के घंटे तय करके उनके अधिकारों को सीमित किया जा रहा है।

बुलडोजर की विनाशलीला के जरिए हमारे हॉकर भाइयों की रोजी-रोटी रोज छीनी जा रही है। 'भय आउट, भरोसा इन' का नारा देने वाली सरकारों के राज में आज चारों तरफ सिर्फ 'भय' का माहौल है। यह बुलडोजर राज हमारी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का प्रतीक बन चुका है। दूसरी तरफ, पर्यावरण को नष्ट करने का खेल जारी है। अंडमान निकोबार से लेकर अरावली तक जैव विविधता को अडाणी-अंबानी जैसे उद्योगपतियों के फायदे के लिए तबाह किया जा रहा है। कोलकाता में नागरिक सुविधाएं और जल निकासी व्यवस्था गंभीर संकट में हैं। हमारे शहर में हर साल औसतन ढाई लाख पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन को इसकी कोई परवाह नहीं है। इसके विपरीत, जब देश में नीट परीक्षा के भ्रष्टाचार के खिलाफ सोनम वांगचुक जैसे लोग अनशन करते हैं, तो अमित शाह की पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर प्रताड़ित करती है। पश्चिम बंगाल में भी पुलिस प्रशासन कॉर्पोरेशन के सामने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए फासीवादी तरीके अपना रहा है।

इस नव-उदारवादी दौर में रोजगार के अधिकार के आंदोलन ने अब एक नया रूप ले लिया है। युवा समाज अब 'Where is my job' - 'मेरी नौकरी कहाँ है' के नारे के साथ एकजुट होकर सड़कों पर उतर रहा है। युवा आंदोलन की मुख्य मांग है कि सभी के लिए स्थायी काम सुनिश्चित किया जाए, काम के अधिकार को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए, न्यूनतम 26,000 रुपये मासिक मजदूरी मिले और सभी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए।

इस राज्य में गरीब परिवारों के बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीनकर 8,000 सरकारी माध्यमिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जबकि पूरे देश में यह संख्या लगभग 70,000 है। धर्मेंद्र प्रधान जैसे लोग बिना किसी जवाबदेही के घूम रहे हैं, नीट जैसी परीक्षाओं में खुलेआम धांधली हो रही है और कॉर्पोरेशन के स्कूल बंद किए जा रहे हैं। इस भ्रष्ट तंत्र को बदलने के लिए युवाओं का यह मार्च है। भ्रष्टाचार को खत्म करने, 100 दिनों के काम को बढ़ाकर 200 दिन करने और अपने ही क्षेत्र में स्थायी रोजगार पाने की मांग को लेकर युवा अब 'घर बेघर' होने के बजाय अपने हक की लड़ाई को मजबूत करने का संकल्प ले रहे हैं।

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(लेखक डीवाईएफआई पश्चिम बंगाल राज्य कमिटी के सदस्य है)

साभार:- गणशक्ति

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प्रकाशित: 22 जुलाई 2026 • 6 मिनट पठन

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इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

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