मानव सभ्यता में देश के मूलवासी जो प्रकृति के सभी प्राणी, जीव-जंतु एवं पेड़-पौधे के साथ मिलजुल कर रहते हैं, वह आदिवासी। आदिवासियों का अपना-अलग परिचय है, प्रकृति के प्रति आस्था है। देश में 700 से भी अधिक आदिवासी जनजातियाँ हैं सबकी अपनी भाषा, खान-पान, रहन-सहन अलग-अलग है मगर सब प्रकृति के पूजक हैं। मगर समाज में नीच जाति, भाषा, रंग, असभ्य, अशिक्षित के नाम पर सामंतवाद, पूँजीवाद, सम्राज्यवाद द्वारा शोषित हुए हैं। हर एक युग में आदिवासी ने उच्च जाति या शासक के लिए कभी दास, कभी श्रमिक, मजदूर के रूप में काम किया है। मगर आदिवासी ने शोषण और अत्याचार से बचने के लिए अपने आप को कभी उच्च जाति बनने की कोशिश नहीं की तथा अपना धर्म भी परिवर्तन नहीं किया था। सहज सरल आदिवासी भेदभाव के कारण समाज से दूर जंगल, पहाड़ों और नदियों के आसपास प्रकृति की गोद में शरण लेते थे। जंगलों एवं नदियों से अपना भोजन इकट्ठा करते थे और आजादी से रहते थे।
अंग्रेजों के आने के बाद जब आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करने लगे एवं अंग्रेजी हुकूमत महाजन, जमींदार जब उन पर जुल्म करने लगे, तब आदिवासियों ने ही इस शोषण, अत्याचार के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाई थी तथा साम्राज्यवादी अंग्रेज शासन के खिलाफ जन आंदोलन शुरू किया था और अस्त्र उठाकर अंग्रेजों का सामना किया था। इसका परिणाम आदिवासियों को संविधान में एक अलग जगह मिली। आदिवासी बहुल राज्य एवं जिलों को पाँचवी एवं छठवीं अनुसूची के अंतर्गत रखा गया। जिससे उम्मीद थी आदिवासियों का विकास होगा और समाज की मुख्य धारा से जुड़ेंगे। लेकिन हम लोग देख रहे हैं कि देश स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद राष्ट्र क्षमता बदलने के बाद भी आदिवासियों की आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर विकास नहीं हो पाया। आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार कागज के पन्ने में दब के रह गए जिस राज्य और जिलों में पाँचवी एवं छठवीं अनुसूची है वह भी पूरा पूरी लागू नहीं हो पाया। देश में आरएसएस द्वारा संचालित बीजेपी सरकार आने के बाद देश के आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं जिससे उनकी समस्याएं और भी बढ़ गई।
* जल जंगल जमीन का अधिकार- देश में कोई भी सरकार हो आदिवासियों को विकास के नाम पर अपने ही जमीन से बेदखल किया है। मगर विकास कॉर्पोरेट का हुआ है आदिवासियों का नहीं। आदिवासियों का जल, जंगल, जमीन रक्षा हो इसलिए spt act, सीएनटी एक्ट, Atrocity एक्ट 1989, पेसा कानून, 2006 का वनाधिकार कानून बनाया गया। 2014 में आरएसएस द्वारा संचालित भाजपा सरकार आने के बाद आदिवासियों का जल, जंगल, जमीन की बेदखली और जोरदार होने लगा ये सरकार कारपोरेट के साथ मिलकर आदिवासियों का जमीन हड़पने का हर तरीका अपनाते हैं जहाँ बात नहीं बनता है सरकार पुलिस की ताकत, इलाका के नेता, गुंडा सभी को काम में लगाते हैं। कभी देशद्रोही, विकास विरोधी, माओवादी, वनवासी बोलकर विभिन्न प्रकार के अत्याचार करके देश के हर राज्य में आदिवासियों का जमीन लूटने का काम कर रही है। पश्चिम बंगाल राज्य के देवचा पांचामी, पुरुलिया का अयोध्या पहाड़, तिलबानी पहाड़ इत्यादि जगह पर आदिवासियों को विकास के नाम पर जबरन अपने जमीन से बेदखल किया जा रहा है।
हमारे पश्चिम बंगाल की बात करें तो 1977 में वाममोर्चा सरकार आने के बाद गरीबों का उद्धार हुआ था भूमिहीनों को जमीन दिया था, पट्टादार, बँटाईदारों को जमीन देकर आदिवासियों का बहुत बड़ा उपकार हुआ था। मगर वर्तमान सरकार आदिवासियों को अपने ही जमीन से बेदखल कर रही है। उत्तर बंगाल में चाय बागान को लगातार कॉर्पोरेट के हाथों बेच रहे हैं। धीरे-धीरे आदिवासी भूमिहीन होते जा रहे हैं।
* 2006 का वनाधिकार-2006 का वन अधिकार वामपंथियों द्वारा लाया गया था। वन आदिवासियों के अधिकार में था। इसमें ग्राम सभा की बहुत बड़ी मान्यता थी। ग्राम सभा की अनुमति के बिना ना पेड़ काटा जाता था और ना लगाया जाता था। वनों की कटाई और खनन में भी ग्राम सभा की सहमति रहना बहुत जरूरी था। प्रत्येक ग्राम में वनरक्षा कमेटी बनायी गयी थी। आदिवासी जीविकोपार्जन के लिए जंगलों से सूखी लकड़ी, केंदु पत्ता, साल पत्ता ,फल ,मूल इकट्ठा करते थे और इसको LAMPS के द्वारा उचित मूल्य में खरीदा जाता था। जो खास करके आदिवासी महिलाओं के लिए बहुत बड़ा आर्थिक सहयोगी था। मगर RSS संचालित सरकार द्वारा 2006 का वन अधिकार को परिवर्तन करने की भी कोशिश की गया। ग्राम सभा की मान्यता को कमजोर किया गया। वन कमेटी में आरएसएस के अपने लोगों को रखा जा रहा गया है जिसके कारण कॉर्पोरेट आसानी से जंगलों में कटाई, पत्थर, मिट्टी, बालू की खनन इत्यादि का धंधा चल रहे हैं।
* एस टी/एससी संरक्षण का उल्लंघन-संविधान के मौलिक अधिकार में एसटी एससी संरक्षण की बात की गई है। सरकार द्वारा बेसरकारीकरण के कारण एवं सरकारी पदों पर नियुक्ति ना होने के कारण एस टी, एस सी को संरक्षण नहीं मिल पा रहा है। वह संरक्षण से वंचित हो रहे हैं। सरकारी शिक्षा संस्थान बंद हो रहे हैं। प्राइवेट शिक्षण संस्थानों में आरक्षण नहीं मिलता। केंद्र सरकार के अब तक के लगभग 1.25 लाख एसटी/एससी पद खाली है। पश्चिम बंगाल में गैर आदिवासी नकली एस टी सर्टिफिकेट लेकर लंबे समय से एसटी/एससी आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, कई दफ्तर में नौकरियां कर रहे हैं कई बड़े शिक्षा संस्थानों में संरक्षण के तहत शिक्षा ले रहे हैं। जिससे बहुत बड़ी संख्या में मूल आदिवासी संरक्षण से वंचित हो चुके हैं।
* सरकारी स्कूल एवं आदिवासी स्कूल हॉस्टल बंद होना- बीजेपी सरकार आने के बाद RSS एवं कारपोरेट अपनी शिक्षा के नाम पर धंधा खोलने में कामयाब हुए हैं। लगातार प्राइवेट स्कूल की संख्या बढ़ती जा रही है। सरकारी स्कूल, आदिवासी स्कूल हॉस्टल बंद होते जा रहे हैं, जहाँ आदिवासियों के बच्चे पढ़ते हैं। सरकारी स्कूल एवं शिक्षा संस्थान बंद होने से आरक्षण की भी बात नहीं आती। यहाँ तक कि एकलव्य मॉडल स्कूल भी RSS द्वारा संचालित हो रहा है। शिक्षा महंगे होने के कारण आदिवासी छात्रों में लगातार dropout बढ़ रहा है। शिक्षा की दर घट रही है।
* पश्चिम बंगाल में100 दिन का रोजगार गारंटी बंद होना- आदिवासियों में अधिकतर छोटे किसान, मजदूर एवं श्रमिक होते हैं। एमजी एनआरजीएस के तहत 5 किलोमीटर के दायरे में मिलने वाले 100 दिन का काम 2021 सालों से बंद हो चुका है। जिसमें बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ एवं जिनके छोटे बच्चे हैं वे भी आसानी से काम कर पा रहे थे। काम बंद होने के कारण आदिवासियों को बहुत बड़ी समस्या में धकेल दिया और प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ गई है। वर्तमान सरकार द्वारा MGNRGS के जगह BV RAMG लागू कर दिया है। यह गरीबों के लिए रोजगार का अवसर नहीं है शोषण है।
* प्रवासी मजदूर- पश्चिम बंगाल के साथ-साथ पूर्वी भारत में नौकरी के अवसर की कमी के कारण, उद्योग स्थापित न होने के कारण एवं 100 दिन का काम बंद रखने के कारण युवाओं के साथ-साथ वयस्क महिला, पुरुष सब प्रवासी मजदूर बनकर भिन्न राज्य में काम की तलाश में जा रहे हैं। सबसे ज्यादा आदिवासी इलाकों से प्रवासी मजदूर देखने को मिलते हैं। जिसके कारण उनके शिक्षा सामाजिक संस्कृति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
* फसल एवं मजदूरी का सही मूल्य न मिलना एवं पशुओं की खरीद बिक्री पर रोक- ग्रामीण आदिवासियों के जीने का दो सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है खेती करना, खेतमजूरी एवं पशुपालन आदिवासी लोग अधिकतर छोटे किसान होते हैं। गाँव के हर किसान खेती एवं मजदूरी के साथ-साथ सभी ग्रामीण आदिवासी पशुपालन करते हैं जो आर्थिक रोजगार का एक बहुत बड़ी साधन है। लंबे समय से किसानों को फसल का एवं मजदूरों को सही मजदूरी तो नहीं मिल रहा है। मगर उनका एक बड़ा पैसे कमाने का रास्ता पशुपालन जिस पर वर्तमान सरकार ने खरीद बिक्री पर रोक लगायी है ।जिससे आदिवासियों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है।
* RSS द्वारा आदिवासियों का जबरन धर्म, सांस्कृतिक परंपरा परिवर्तन की कोशिश करना-आरएसएस द्वारा 100 साल से चल रही हिंदू राष्ट्र बनाने की मनोकामनाएं भाजपा द्वारा पूरा करना चाहता है। भारत में आदिवासी ही एक ऐसा संप्रदाय है जो सबसे अलग है - न हिंदू है, न इसाई है, न मुस्लिम है, प्रकृति पर विश्वास एवं आस्था रखने वाले एक संप्रदाय है। लेकिन आदिवासियों के बीच जाकर आरएसएस द्वारा हिंदू धर्म का जोरदार प्रचार चल रहा है। आदिवासी इलाकों में हर चौराहे पर लाल सफेद रंग का हनुमान मंदिर बनाया जा रहा है। रामनवमी एवं हनुमान जयंती जैसे मौके पर आदिवासियों को पैसे एवं खाने-पीने का लालच देकर रैलियों में बुलाते हैं।यूसीसी बिल लाकर आदिवासियों की सांस्कृतिक परंपरा को बदलना चाहते हैं।
* SIR: - के द्वारा बहुत से आदिवासियों का नाम वोटर तालिका से हटा दिया गया है। जबकि वे राज्य के मूलनिवासी हैं। जिन्होंने इस राज्य और देश को बसाया, पर्यावरण को बचाया।उन आदिवासियों को अब सरकार ने अपने ही देश में अनजान बना दिया।
* 2027 की जातिगत जनगणना में आदिवासी कालम न होना:- 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में आदिवासियों की जनसंख्या 10.45 करोड़ है जो कुल जनसंख्या का 8.6% है। लेकिन 2027 की जातिगत जनगणना में 6 अन्य धर्म का कालम है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन एवं बौद्ध। पर आदिवासियों के लिए कोई अलग कालम नहीं है। लिखने के समय आदिवासी या तो हिंदू या अन्य में टिक करने के लिए बाध्य हो जाएंगे। जनगणना में आदिवासी जनसंख्या कम हो जाएगी। आने वाले दिन में आदिवासी विकास के लिए देश एवं राज्य के बजट कम कर दिए जाएंगे।विधानसभा एवं लोकसभा आरक्षित सीट खत्म होने की संभावना बढ़ेगी। वर्तमान सरकार द्वारा आदिवासियों के आरक्षण को खत्म करने की सोची समझी साजिश है।
* आरएसएस द्वारा कुड़मी एवं आदिवासियों की लड़ाई को बढ़ावा देना - कुड़मी संप्रदाय अपने असंवैधानिक मांग एस टी तालिका में सूचीबद्ध होने को लेकर सालों से आंदोलन कर रहे हैं। इसके विपरीत आदिवासी इसको रोकने लिए आंदोलन कर रहे हैं। आरएसएस द्वारा दोनों पक्ष के आंदोलनकारी को भड़काया जा रहा है एवं उनकी मांगों को पूरा करने का वादा भी कर रहे हैं ताकि उन्हें राजनीतिक फायदा हो सके।
हमारे देश में बहुत सारे जाति एवं धर्म के लोग रहते हैं। सबके रंग-रूप, भेष-भाषा अलग हैं। विभिन्नता में एकता का देश है भारत। इतिहास गवाह है लोकतांत्रिक देश में साम्राज्यवादी, पूँजीवादी, एकनायकवादी शासन नहीं चलेगा। इसको खत्म करने के लिए सभी मेहनतकशों, नौजवानों-छात्रों, महिलाओं को एकजुट होकर आंदोलन तेज़ करना होगा।
(लेखिका पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज की संरक्षक हैं)
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...