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बच्चे हंस रहे हैं! -वसंत आबाजी डहाके

राजीव कुमार पाण्डेय•24 जुलाई 20262 मिनट पठन12 बार पढ़ा गया

कारण और प्रतिक्रिया की

तलाश जारी है

राज्य सरकारें 

चिंता से आक्रांत है

और 

केंद्र सरकार से मदद

पाने के लिए फेरे मार रही हैं

बच्चे हंस रहे हैं! -वसंत आबाजी डहाके

स्कूल के बच्चे 

बगीचे में आकर

बेतहाशा हंस रहे हैं

 

बच्चों के 

हंसने की आवाज़ें

बढ़ती ही जा रही हैं

 

पड़ोस में 

पुलिस थाने का सिपाही

आश्चर्यचकित होकर

देख रहा है

 

बच्चे लगातार हंस रहे हैं

 

कार्यकर्ता घबराकर

अपने अपने 

नेताओं के पास

दौड़ पड़ते हैं

और बताते हैं कि

 

नेताजी!

बच्चे हंस रहे हैं

 

पत्रकार 

दबे-छिपे

राज़ जानने का

प्रयास कर रहे हैं

फुसफुसाकर

हेड ऑफिस को बता रहे हैं

कि बच्चे हंस रहे हैं

 

कारण और प्रतिक्रिया की

तलाश जारी है

राज्य सरकारें 

चिंता से आक्रांत है

और 

केंद्र सरकार से मदद

पाने के लिए फेरे मार रही हैं

 

कोई तो सेवानिवृत्त अधिकारी 

अख़बार में लिख कर 

जांच की मांग कर रहा है

कि बच्चे क्यों हंस रहे हैं

 

सुपर स्टार के 

सिनेमा वाले थिएटर

वीरान पड़े हैं

 

पोस्टर पर की चंद्रमुखी

का चेहरा सूख गया है

 

लोग निकल पड़े हैं

बगीचे की ओर

कि बच्चे हंस रहे हैं

 

बच्चे हंस रहे हैं

बेतहाशा हंस रहे हैं

 

शहर में कर्फ़्यू लगा गया है

शांतिभंग विरोधी धारा लगा दी गई है 

 

फिर भी

बच्चे हंस रहे हैं 

 

सार्वजनिक बगीचे में

तितलियों के पीछे भागते

बच्चे हंस रहे हैं

लगातार हंस रहे हैं

 

यह अच्छी बात नहीं है

किसी दूरदर्शी व्यक्ति ने कहा

और फ़रमान निकाला

कि सार्वजनिक बगीचे को

नेस्तनाबूद कर दिया जाए

 

उध्वस्त बगीचे की ओर देखकर

बच्चे अब भी हंस रहे हैं

 

बंदूक और लाठी लिए

सिपाहियों की ओर देखकर 

बच्चे बेतहाशा हंस रहे हैं 

भयंकर हंस रहे हैं

 

बच्चे हंसते जा रहे हैं

 

(मराठी से अनुवाद : हूबनाथ)

[लेखक परिचय: वसंत अबाज़ी दहाके मराठी भाषाविद्, शब्दकोशकार, लेखक और कवि हैं। वे 1966 में अपनी लंबी कविता 'योगभ्रष्ट' से प्रसिद्ध हुए। उन्हें 2009 में उनके संग्रह "चित्रलिपि" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे फरवरी 2012 में चंद्रपुर में आयोजित 85वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष थे।

[अनुवादक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]

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बच्चे हंस रहे हैं! -वसंत आबाजी डहाके

प्रकाशित: 24 जुलाई 2026 • 2 मिनट पठन

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