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राजीव कुमार पाण्डेय•24 जुलाई 20264 मिनट पठन6 बार पढ़ा गया

सत्ता के शिखर पर होने के कारण उनका अहंकार इतना बढ़ गया है कि देश की आने वाली पीढ़ी के दुख ने उनके दिल को ज़रा भी नहीं छुआ। शायद वे इसलिए बेपरवाह हैं क्योंकि उनके अपने परिवारों के बच्चे इन मुद्दों से बहुत दूर हैं; ज़्यादातर केंद्रीय नेताओं और मंत्रियों के बच्चे विदेश में पढ़ते हैं। नतीजतन, वे देश में पेपर लीक या शिक्षा व्यवस्था के ढहने को लेकर उदासीन बने रहते हैं।

नीट परीक्षा का पेपर लीक हुए लगभग तीन महीने हो चुके हैं। घोर निराशा और अनिश्चितता के कारण कम से कम 22 परीक्षार्थियों ने आत्महत्या कर ली है। जो परीक्षा हो चुकी थी, उसे रद्द कर दिया गया और दोबारा परीक्षा कराई गई। फिर भी, मोदी सरकार में किसी में भी पछतावे या अफ़सोस का कोई भाव नहीं दिखा। शिक्षा के क्षेत्र में इतनी बड़ी आपदा और इतने सारे परीक्षार्थियों की बुरी हालत के बावजूद, किसी ने भी इसकी थोड़ी सी भी ज़िम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं दिखाई। प्रधानमंत्री तो दूर, शिक्षा मंत्री ने भी चिंता और परेशानी से जूझ रहे लाखों युवाओं को भरोसा दिलाने की ज़रूरत नहीं समझी। सत्ता के शिखर पर होने के कारण उनका अहंकार इतना बढ़ गया है कि देश की आने वाली पीढ़ी के दुख ने उनके दिल को ज़रा भी नहीं छुआ। शायद वे इसलिए बेपरवाह हैं क्योंकि उनके अपने परिवारों के बच्चे इन मुद्दों से बहुत दूर हैं; ज़्यादातर केंद्रीय नेताओं और मंत्रियों के बच्चे विदेश में पढ़ते हैं। नतीजतन, वे देश में पेपर लीक या शिक्षा व्यवस्था के ढहने को लेकर उदासीन बने रहते हैं।

हालाँकि, छात्र और युवा समुदाय—जिनके लिए ये मुद्दे वास्तव में मायने रखते हैं—चुपचाप हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते थे। उन्होंने 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आह्वान पर अलग-अलग चरणों में विरोध प्रदर्शनों में शामिल होना शुरू किया। एक महीने पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू हुआ। कुछ दिनों बाद, सोनम वांगचुक भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए। छात्रों और युवाओं को अपना समर्थन देते हुए, उन्होंने विरोध स्थल पर ही आमरण अनशन शुरू कर दिया और दूसरे छात्र भी उनके साथ जुड़ गए। जैसे-जैसे समय बीतता गया, भीड़ बढ़ती गई और समर्थन व एकजुटता मज़बूत होती गई। हालाँकि, मोदी सरकार ने स्थिति को नज़रअंदाज़ करना जारी रखा। इसी बीच, मॉनसून सत्र के पहले दिन 'संसद मार्च' का आह्वान किया गया। ठीक इससे पहले, अमित शाह की पुलिस अचानक बहुत ज़्यादा जोश के साथ हरकत में आई; उन्होंने ज़बरदस्ती अनशन कर रहे वांगचुक को हटाया और उन्हें एक तरह से अस्पताल में नज़रबंद कर दिया। इस घटना ने आग में घी का काम किया। इसने पूरे देश में ज़बरदस्त प्रतिक्रिया पैदा की—सिर्फ़ छात्रों और युवाओं में ही नहीं, बल्कि हर वर्ग के लोगों में। जंतर-मंतर पर भीड़ तेज़ी से बढ़ने लगी। लोगों की यह भारी भीड़ इस बात का साफ़ संकेत थी कि संसद तक का मार्च जन-विरोध की एक विशाल लहर में बदल सकता है। खास बात यह है कि जो लोग पहले कभी ऐसे विरोध-प्रदर्शनों में शामिल नहीं हुए थे, वे भी अब बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुँच रहे हैं।

सरकार को अच्छी तरह अंदाज़ा था कि यह आंदोलन उम्मीदों से कहीं ज़्यादा बड़ा होगा। इसलिए, इसे कुचलने के लिए हर मुमकिन कोशिश की गई। ज़ुल्म और बर्बरता की कोई हद नहीं रही; दिल्ली की सड़कें आने वाली पीढ़ी के खून से लाल हो गईं। बेगुनाह छात्रों के साथ खूंखार अपराधियों, गुंडों, असामाजिक तत्वों और आतंकवादियों जैसा बर्ताव किया गया। फिर भी, उन्हें दबाया नहीं जा सका। पिटाई खाने, खून बहने और गिर पड़ने के बावजूद, उन्होंने सड़कें छोड़ने से इनकार कर दिया; वे आखिर तक लड़ते रहे।

लंबे समय तक देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने इस मामले पर एक शब्द भी नहीं कहा। वही बता सकते हैं कि वह किस ग्रह पर रह रहे थे। राजधानी की सड़कों पर उमड़ी देश के युवाओं की लहर को शांत करने में नाकाम रहने के बाद, वह अचानक—मानो किसी दूसरी दुनिया से—सामने आए और उन्हें एहसास हुआ कि परीक्षा के पेपर लीक होना एक गंभीर अपराध है और दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए। यही '56-इंच' वाले 'विश्व गुरु' (ग्लोबल लीडर) की पहचान है।

आंकड़ों से पता चलता है कि 2014 से अब तक 152 परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र लीक हुए हैं, जिससे कम से कम 10 करोड़ छात्र चिंता, अनिश्चितता और निराशा के शिकार हुए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर पेपर लीक उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हुए—यानी उन राज्यों में जहाँ मोदी की 'डबल-इंजन' सरकार है। पिछले 12 सालों में यह सब होता रहा, लेकिन मोदी को कभी इस मुद्दे पर बोलते हुए नहीं सुना गया। आज ही उन्हें एहसास हुआ कि यह एक गंभीर अपराध है। क्या यह जानबूझकर साधी गई चुप्पी है, किसी मूर्ख का अहंकार है, या फिर सत्ता का घमंड?

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साभार : गणशक्ति

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प्रकाशित: 24 जुलाई 2026 • 4 मिनट पठन

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"22 लाख से अधिक छात्रों की आँखों के सपने, होनहार युवाओं की जलती चिता, और पर्चे के बदले अस्मत माँगते 'गुरु' का घिनौना चेहरा— यह है उस परीक्षा का सच, जिसे देश 'डॉक्टर' बनाने के लिए करवाता है। जब तंत्र की लापरवाही और धन की हवस हद पार कर जाए,तो शिक्षा का मंदिर श्मशान और व्यापार की मंडी बन जाता है।

आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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