"मोदी नहीं चाहते कि हम पढ़-लिखकर बड़े बनें। मोदी चाहते हैं कि हम भी अपने माता-पिता की तरह ही तकलीफें झेलकर मर जाएं। मोदी गरीब लोगों का भला नहीं चाहते, इसीलिए तो इतने सारे लोग मर रहे हैं। हम मरना नहीं चाहते, इसीलिए विरोध करने आए हैं।"
जन समाचार मंच
"मोदी नहीं चाहते कि हम पढ़-लिखकर बड़े बनें। मोदी चाहते हैं कि हम भी अपने माता-पिता की तरह ही तकलीफें झेलकर मर जाएं। मोदी गरीब लोगों का भला नहीं चाहते, इसीलिए तो इतने सारे लोग मर रहे हैं। हम मरना नहीं चाहते, इसीलिए विरोध करने आए हैं।"

गरिया की रहने वाली चान्द्रेयी कल्याणी विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में रिसर्च कर रही हैं। एमफिल करने के दौरान उन्होंने जेआरएफ के लिए अर्हता प्राप्त की थी। पीएचडी करते समय ही जेआरएफ की अवधि समाप्त हो जाने के कारण, उन्होंने छह महीने पहले एसवीएमसीएम (SVMCM) स्कॉलरशिप के लिए आवेदन किया था। वह आवेदन मंजूर होने के बाद भी चान्द्रेयी को पिछले चार महीनों से स्कॉलरशिप की राशि नहीं मिली है।
शुक्रवार को छात्रों के इस जुलूस में चलते-चलते चान्द्रेयी ने कहा, "हमारे देश में रिसर्च करने वालों का भविष्य क्या है? नौकरी की बात तो छोड़ ही दीजिए, जो लोग शोध करने आते हैं, वे केवल रिसर्च करने की अपनी तीव्र इच्छा के बल पर ही आते हैं। जिस उम्र में बाकी युवक-युवतियां जीवन का आनंद लेते हैं, उस उम्र में भी मैं केवल यही सोचती रही कि अपनी रिसर्च को सफलतापूर्वक कैसे पूरा करूँ। मैंने अपनी योग्यता के दम पर नेट-जेआरएफ पास किया है, निश्चित रूप से इस दिन को देखने के लिए तो नहीं किया था। पुलिस अगर लाठी चलाना चाहती है, तो चलाए। मैं कम से कम यह तो जानूँगी कि मैं अपने शोध के सम्मान के लिए लाठियां खा रही हूँ, करोड़ों रुपये के बदले प्रश्नपत्र लीक करने के लिए नहीं खा रही हूँ।"
इस मार्च में केवल वयस्क लोग ही नहीं थे, बल्कि जुलूस की शुरुआत से लेकर अंत तक काल्पनिक पंखों पर सवार होकर छठी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों का एक पूरा झुंड उत्साह के साथ दौड़ता-भागता नजर आया। "क्या घर पर पता है कि तुम लोग यहाँ घूम रहे हो?" इस सवाल पर थोड़ा नाराज होते हुए फरहान ने जवाब दिया, "हम घूम क्यों रहे हैं, हम तो प्रतिवाद कर रहे हैं। पापा बाजार में सब्जी बेचने गए हैं और माँ काम वाले घर से शाम 4 बजे से पहले नहीं लौटेंगी। अगर वे लौट भी आईं, तो भी चिंता नहीं करेंगी।" "तुम किस बात का विरोध करने आए हो, क्या तुम्हें पता है?" इस सवाल पर फरहान ने फिर तीखा जवाब दिया, "मोदी नहीं चाहते कि हम पढ़-लिखकर बड़े बनें। मोदी चाहते हैं कि हम भी अपने माता-पिता की तरह ही तकलीफें झेलकर मर जाएं। मोदी गरीब लोगों का भला नहीं चाहते, इसीलिए तो इतने सारे लोग मर रहे हैं। हम मरना नहीं चाहते, इसीलिए विरोध करने आए हैं।" यह जवाब देते ही हाथों में प्लेकार्ड लिए, टूटी-फूटी हिंदी के उच्चारण में 'जन-गण-मन अधिनायक जय हे' गाते हुए फरहान, फैजल और सिराज भागकर जुलूस के बीच में शामिल हो गए।
पार्क सर्कस सेवेन पॉइंट के रहने वाले तौसीफा के घर में माता-पिता के अलावा उसका तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला छोटा भाई भी है। अपनी दीदी का हाथ पकड़कर काफी देर तक चलने के बाद जब 8 साल का छोटा भाई थक गया, तो उसे अपनी गोद में उठाकर 15 साल की तौसीफा जुलूस में आगे बढ़ती रही। तौसीफा और उसके जैसे अन्य बच्चे क्या चाहते हैं? तौसीफा ने कहा, "यहाँ सभी दोस्त हैं। मैं जिनके साथ आई हूँ वे भी दोस्त हैं, और जिन्हें मैं नहीं जानती थी, यहाँ आकर उनसे भी परिचय हो रहा है। जुलूस में आगे बढ़ते हुए मैं जिन्हें भी जानूँगी, वे सब मेरे दोस्त बन जाएंगे। हम सबका लक्ष्य एक ही है, क्योंकि मैं भी बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती हूँ। और मैं नहीं चाहती कि जब मैं अपनी परीक्षा में बैठूँ, तब इस तरह से प्रश्नपत्र लीक हो जाए और मैं भी जीने की इच्छा खो दूँ। अगर ऐसा हुआ तो मेरे अब्बू और अम्मी का क्या होगा, इसी डर से मुझे आज के इस जुलूस में आना सबसे ज्यादा जरूरी लगा।" तौसीफा दसवीं कक्षा में पढ़ती है।
इन छात्रों के दावों और मांगों में कोई अस्पष्टता नहीं थी, और न ही केवल किसी अफवाह या बहकावे में आकर जुलूस में शामिल होने की कोई प्रवृत्ति थी। वे अपने और अपने भाई-बहनों के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके माता-पिता के सपने सच हों। इस सुरक्षा को सुनिश्चित करने के रास्ते में धर्मेंद्र प्रधान और मोदी सरकार सबसे बड़ी बाधा हैं, यह बात इन बच्चों ने बहुत अच्छी तरह से समझ ली है। यही वजह थी कि तौसीफा सियालदह से धर्मतला डोरिना क्रॉसिंग तक अपने भाई को गोद में लेकर लगातार इस जुलूस में चलती रही।
कांकीनाड़ा से बेहाला, और गड़िया से पार्क सर्कस, दमदम से शिवपुर तक—कोलकाता और उसके आसपास के विभिन्न शहरों और गांवों से हजारों की तादाद में युवा, छात्र-छात्राएं और किशोर-किशोरियां धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए। उनके बीच हाल ही में स्कूल पास करने वाले किशोरों के दल के साथ-साथ जुलूस में पीछे चल रहे उनके अभिभावक भी शामिल थे। 'ला मार्टिनियर फॉर बॉयज़' स्कूल का छात्र बिक्रमजीत स्कूल की छुट्टी होते ही अपने दोस्तों के साथ सीधे इस जुलूस में पहुंच गया था। उसके पीछे-पीछे उसके पिता बिक्रमजीत का स्कूल बैग टांगे जुलूस में चल रहे थे। उन्होंने कहा, "मेरा बेटा इस मार्च में आना चाहता था। उसने मुझसे कहा कि अगर उसका आज आना जरूरी नहीं माना गया, तो भविष्य में जब उसके साथ ऐसा कुछ गलत होगा, तब कोई उसके साथ खड़ा नहीं होगा। इसलिए मैं उसे मना नहीं कर सका। कोई और समय होता तो शायद मैं उसे रोक देता, लेकिन भाजपा सरकार और उसके शिक्षा मंत्री ने देश की शिक्षा व्यवस्था को जिस तरह कीचड़ में धकेल दिया है, उसके बाद अपने बच्चों को रोकने का हमारा कोई हक नहीं बनता। नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो गया है, इस देश में ऐसा भी हो सकता है, यह बात हम कभी सोच भी नहीं सकते थे।"
तौसीफा और बिक्रमजीत के साथ ही कांकीनाड़ा से एलकेजी में पढ़ने वाले अपने बच्चे को लेकर स्कूल की एक शिक्षिका के साथ 25 साल की युवा शमिमा भी आई थीं। इसी तरह 'मॉडर्न हाई स्कूल फॉर बॉयज़' के उर्दू शिक्षक शमसार अहमद भी आए थे। यह नजारा देखकर उनके दो पूर्व छात्र, जो अब कॉलेज में पढ़ते हैं, अपने पुराने शिक्षक और वहां मौजूद अन्य किशोर-किशोरियों व युवाओं के लिए पीने के पानी की बोतलें लेकर आगे आए। उन्होंने कहा, "हमारे साथ जो होना था वह तो हो गया, और हमारे पास अब दिन ही कितने बचे हैं। लेकिन ये बच्चे और युवा इस तरह के धोखे और वंचना के हकदार नहीं हैं। अखिल भारतीय परीक्षाओं के फॉर्म के दाम एनटीए द्वारा दिन-ब-दिन बढ़ाए जा रहे हैं, और उसके साथ ही ट्यूशन व कोचिंग का भारी खर्च अलग से है।" शमिमा की अपनी पढ़ाई तो पूरी हो चुकी है, लेकिन अपने बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए वह कांकीनाड़ा से दौड़कर इस जुलूस में शामिल होने आई हैं। उनका मानना है कि "बच्चे को बचपन से ही यह सीख मिलनी चाहिए कि अगर कोई आपकी शिक्षा के अधिकार को छीनने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कैसे लड़ना है और अपना अधिकार कैसे बचा कर रखना है।
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साभार: गणशक्ति
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 25 जुलाई 2026 • 6 मिनट पठन

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
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