" ग़ुलामी और आज़ादी में
सिर्फ़
इतना ही फ़र्क है
ग़ुलामी में
आदमी रोज़ मरता है
आज़ादी में
कभी मौत आती ही नहीं "।
जन समाचार मंच
" ग़ुलामी और आज़ादी में
सिर्फ़
इतना ही फ़र्क है
ग़ुलामी में
आदमी रोज़ मरता है
आज़ादी में
कभी मौत आती ही नहीं "।
- हूबनाथ
आज़ादी
कायरों और कमज़ोरों
के लिए नहीं होती
झूठे और मक्कारों
के लिए तो
बिल्कुल नहीं
आज़ादी
खैरात में या
भीख में भी
नहीं मिलती
इसकी कीमत
चुकाते रहना पड़ता है
जब तक
आप आज़ाद रहना
चाहते हो
यदि
मौत के बदले भी
मिले आज़ादी
तो समझो
कि सौदा सस्ते में छूटा
सिर्फ़
ज़िंदा रहने के लिए
ग़ुलामी
ज़िंदगी की सबसे बड़ी
बेइज़्ज़ती है
फिर वह ग़ुलामी
ईश्वर की हो
धर्म की
राज्य की
या राजा की
ग़ुलामी से बड़ा
अभिशाप
दूसरा कोई नहीं
ग़ुलामी और आज़ादी में
सिर्फ़
इतना ही फ़र्क है
ग़ुलामी में
आदमी रोज़ मरता है
आज़ादी में
कभी मौत आती ही नहीं
.
.
{लेखक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।}
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प्रकाशित: 27 जुलाई 2026 • 1 मिनट पठन

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12 अक्टूबर 2026

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11 अक्टूबर 2026

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10 अक्टूबर 2026

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श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

भक्ति-आन्दोलन का जनसाधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आन्दोलन का नहीं। पहली बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किये, अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किये। कबीर, रैदास, नाभा सिपी, सेना नाई, आदि-आदि महापुरुषों ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलन्द की। समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यम्भावी था , वह हुआ।
अपराजिता • 30 जुलाई 2026

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
राजीव कुमार पाण्डेय • 29 अगस्त 2026
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