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क्या 'चाणक्य' की चाल ही पड़ी उल्टी? जवाबदेही की ज़िम्मेदारी अब अमित शाह पर

अपराजिता•27 जुलाई 20267 मिनट पठन11 बार पढ़ा गया

भाजपा नेता इससे भी ज़्यादा हैरान इस बात पर हैं कि उनके 'चाणक्य' पूरे घटनाक्रम में बिल्कुल चुप हैं। किसी भी घटना में नरेंद्र मोदी के 'मुश्किल आसान' कहे जाने वाले अमित शाह के इस आचरण को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज़ हो गई हैं। दिल्ली के प्रशासनिक हलकों में चर्चा कुछ और ही चल रही है— कहा जा रहा है कि 'चाणक्य' की चाल के कारण ही इस बार 'साहब' को घुटनों पर आना पड़ा है।

क्या 'चाणक्य' की

चाल ही पड़ी उल्टी?

जवाबदेही की ज़िम्मेदारी

अब अमित शाह पर

नई दिल्ली:- मोदी सरकार के बारह-तेरह सालों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार की ज़िम्मेदारी लेते हुए किसी कैबिनेट मंत्री ने इससे पहले इस्तीफा नहीं दिया था। शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भाजपा नेता भी हैरान हैं। लेकिन भाजपा नेता इससे भी ज़्यादा हैरान इस बात पर हैं कि उनके 'चाणक्य' पूरे घटनाक्रम में बिल्कुल चुप हैं। किसी भी घटना में नरेंद्र मोदी के 'मुश्किल आसान' कहे जाने वाले अमित शाह के इस आचरण को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज़ हो गई हैं। दिल्ली के प्रशासनिक हलकों में चर्चा कुछ और ही चल रही है— कहा जा रहा है कि 'चाणक्य' की चाल के कारण ही इस बार 'साहब' को घुटनों पर आना पड़ा है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस आती है। यानी गृह मंत्री अमित शाह उस पुलिस के बॉस हैं। सोनम वांगचुक के अनशन और जंतर-मंतर पर लगातार धरने के बीच, 17 जुलाई को अचानक अमित शाह ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा को हटा दिया। उनकी जगह आईपीएस अनुराग कुमार को ज़िम्मेदारी दी गई। बारह घंटे के भीतर, 18 जुलाई की सुबह 6 बजे अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने उठा लिया। इसके बाद 20 जुलाई को छात्रों पर दिल्ली पुलिस ने बर्बरता की। यह दोनों काम अमित शाह की जानकारी के बिना हुए हैं, इस पर कोई यकीन नहीं करता। इन दोनों घटनाओं ने आखिरकार मोदी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया है। अमित शाह के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस ने जिस तरह से छात्रों की पिटाई की, लड़कियों से छेड़छाड़ की और अश्लील तरीके से हमला किया, उससे देशभर में भारी गुस्सा फैला है। सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास इस मुद्दे को उठाकर लगातार अमित शाह के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, अमित शाह 'सख्त' कदम उठाना चाहते थे ताकि इस आंदोलन की कमर तोड़ी जा सके। इसी मकसद से सबसे पहले सोनम वांगचुक को धरना स्थल से उठाया गया। उसके बाद उन्हें एक तरह से सफदरजंग अस्पताल में नज़रबंद करके रखा गया। 20 जुलाई को चारों तरफ बैरिकेडिंग करके बर्बर हमला किया गया। उससे पहले ही जंतर-मंतर इलाके में जैमर लगा दिए गए थे। डेढ़ किलोमीटर के दायरे में नेटवर्क बंद कर दिया गया था। स्वतंत्र पत्रकारों और यूट्यूबरों को भी बेरहमी से पीटा गया। कुल मिलाकर आंदोलन को दबाने की खबर बाहर न जा सके, इसके तमाम इंतज़ाम किए गए थे। लेकिन प्रदर्शनकारी मार खाते-खाते भी वीडियो बनाते रहे, तस्वीरें खींचते रहे। इसी से दुनिया के सामने अमित शाह की यह योजना उजागर हो गई।

छात्रों पर पुलिस बर्बरता के सबूत लगातार सामने आ रहे हैं और जवाबदेही की मांग बढ़ती जा रही है, फिर भी गृह मंत्री की चुप्पी कायम है। चूंकि इन बलों की सर्वोच्च प्रशासनिक ज़िम्मेदारी उन्हीं के मंत्रालय की है, इसलिए इस कार्रवाई पर उठे गंभीर सवालों के जवाब भी उन्हें ही देने होंगे। दिल्ली पुलिस के सोशल मीडिया पोस्ट या कुछ पत्रकारों द्वारा उद्धृत अज्ञात "सूत्रों" के ज़रिए इन सवालों के जवाब नहीं दिए जा सकते। आखिरकार ज़िम्मेदारी अमित शाह की है और उन्हें जवाब देना चाहिए।

जो गंभीर सवाल उठे हैं, उनमें सबसे मुख्य सवाल वाटर कैनन का इस्तेमाल न करना है। भारत में भीड़ नियंत्रण की स्थापित नीति के अनुसार, सबसे पहले सबसे कम नुकसान पहुंचाने वाले तरीके का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। वाटर कैनन एक गैर-घातक तरीका है, जिसका इस्तेमाल बल प्रयोग से पहले भीड़ को तितर-बितर करने के लिए किया जाता है। दिल्ली में ऐसा नहीं किया गया। इससे साफ है कि शांतिपूर्ण तरीके से स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं, बल्कि ताकत दिखाना ही मकसद था।

दूसरा मुद्दा सुरक्षा बलों की कुछ लाठियों में कीलें लगे होने का है। पुलिस की साधारण लाठी को इस तरह जानलेवा हथियार में बदला जा सकता है। निहत्थे छात्रों, विशेषकर युवतियों पर ऐसे हथियार का इस्तेमाल बुनियादी मानवाधिकारों और पुलिस के नियमों का उल्लंघन है। इन लाठियों में कीलें लगाने की इजाज़त किसने दी, गृह मंत्री को इसकी व्याख्या करनी होगी।

पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी पहले ही तीखी आलोचना शुरू हो चुकी है। पुलिस पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार करती है। यह सच है कि पुलिस ने पेलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया, RAF ने किया। भले ही पहले इनकार किया गया, लेकिन कई युवकों के शरीर से पेलेट मिले हैं। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों ने भी इसकी पुष्टि की है। इनमें एक अंग्रेजी पत्रिका के पत्रकार भी पेलेट से घायल हुए हैं। यहां तक कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने अस्पताल जाकर पेलेट से घायल एक छात्र से मुलाकात भी की है। ऐसे में अब इनकार करने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

प्रदर्शन स्थल के कई वीडियो में दिख रहा है कि पुरुष पुलिसकर्मी छात्राओं और महिलाओं पर हमला कर रहे हैं। छात्रों के सिर पर अंधाधुंध लाठीचार्ज और कपड़े फाड़ने जैसी वीडियो सामने आई हैं। एक पुलिस अधिकारी बिना किसी उकसावे के एक छात्रा को गाल पर थप्पड़ मार रहा है। महिलाओं के गुप्त अंगों पर लाठी से वार किया जा रहा है, जो कल्पना से परे है। 'बेटी बचाओ' के नारों के बाद देश की राजधानी में पुलिस का यह चेहरा दिखा। अगर पुलिस यह दावा भी करे कि भीड़ उग्र हो गई थी, तब भी उनका रवैया जेंडर-सेंसिटिव (लैंगिक रूप से संवेदनशील) होना चाहिए था। वीडियो साक्ष्य इस घटना की त्वरित जवाबदेही की मांग करते हैं। वह जवाब अमित शाह को ही देना होगा। अमित शाह को यह बताना होगा कि उनके अधीन काम करने वाली पुलिस कानून का उल्लंघन करने में इतनी बेखौफ कैसे हो गई? इसी तरह यह भी स्पष्ट करना होगा कि सादे कपड़ों में लाठी लेकर छात्रों और पत्रकारों को पीटने वाले लोग कौन थे? अगर वे वास्तव में पुलिसकर्मी थे, तो उनकी पहचान उजागर होनी चाहिए।

सबसे गंभीर सवाल पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नाम की पट्टी (नेमप्लेट) न होने को लेकर उठा है। यहां तक कि RAF के जवानों के पास भी यह नहीं थी। पुलिस मैनुअल और अदालती आदेशों के अनुसार, जवाबदेही तय करने के लिए वर्दी पहने सभी पुलिसकर्मियों के लिए अपनी नेमप्लेट साफ तौर पर प्रदर्शित करना अनिवार्य है। पहचान छिपाना अत्यधिक बल प्रयोग और मानवाधिकारों के उल्लंघन की ज़िम्मेदारी से बचने की एक रणनीति है। इस जानबूझकर रखी गई गोपनीयता से लगता है कि कानूनी जवाबदेही के डर के बिना हिंसा की योजना बनाई गई थी। क्या इस बुनियादी नियम का उल्लंघन शीर्ष स्तर के आदेश पर हुआ, या यह उनके कार्यकाल में शुरू की गई कोई अनौपचारिक नीति है? इसका उत्तर गृह मंत्री को देना होगा।

कई लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस बैरिकेड्स पार करते समय उन्हें बिजली के झटके महसूस हुए। 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी रिपोर्ट में ऐसे आरोप प्रकाशित किए हैं कि कुछ पुलिस बैरिकेड्स में बिजली का प्रवाह हो सकता है। यहां तक कि पुलिस पर इलेक्ट्रिक शौक बटन का इस्तेमाल करने का भी आरोप लगा है। देशभर में हो रही भारी आलोचना के बावजूद गृह मंत्रालय की ओर से इस मामले में कोई बयान जारी नहीं किया गया है। जंतर-मंतर और पार्लियामेंट स्ट्रीट जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में कितना आंसू गैस इस्तेमाल किया गया, इसका कोई हिसाब नहीं है। सैकड़ों छात्रों को हिरासत में लेकर अलग-अलग जगहों पर ले जाया गया। कितने लोगों को हिरासत में लिया गया, कितने गिरफ्तार हुए, किसके खिलाफ क्या-क्या मामले दर्ज हैं—कोई जानकारी नहीं दी गई है। सिर की हड्डी टूटने और पेलेट की चोटों सहित कई गंभीर रूप से घायलों की घटनाओं के मद्देनज़र, एक स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कानूनी और नैतिक रूप से अनिवार्य है। पुलिस की आंतरिक जांच काफी नहीं है, क्योंकि निष्पक्ष जांच पुलिस खुद नहीं कर सकती। सच्चाई जानने के लिए मजिस्ट्रेट या न्यायिक जांच की ज़रूरत है। पुलिस बर्बरता के इन गंभीर आरोपों के बीच प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की चुप्पी को कई लोग इस कार्रवाई को उनका मौन समर्थन मान रहे हैं। ऐसे गंभीर संकट में सरकार के शीर्ष स्तर से तुरंत जवाबदेही तय की जानी चाहिए और जनता के सामने स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए।

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साभार:बांग्ला दैनिक गणशक्ति| 27 जुलाई,2026

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क्या 'चाणक्य' की चाल ही पड़ी उल्टी? जवाबदेही की ज़िम्मेदारी अब अमित शाह पर

प्रकाशित: 27 जुलाई 2026 • 7 मिनट पठन

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