'पहाड़' की ताकत 'पहाड़' के हाथों में क्यों नहीं?! अफसरों के दम पर स्वायत्तता का नाटक बंद करो!" स्वायत्तता छीने जाने पर गरजे मोहम्मद सलीम!" - दार्जिलिंग के कलामंदिर हॉल में आयोजित कार्यकर्ताओं की सभा में सीपीआई(एम) पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने भाजपा और आरएसएस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार स्वायत्त निकाय जीटीए (GTA) में प्रतिनिधियों के चुनाव कराने के बजाय प्रशासक बिठाकर लोकतंत्र और पहाड़ के अधिकारों का हनन कर रही है। कश्मीर से लद्दाख और दार्जिलिंग तक क्षेत्रीय स्वायत्तता को खत्म करने की साजिश का दावा करते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि भाजपा न तो बहुलतावाद को मानती है और न ही विविधता का सम्मान करती है। पार्टी ने घोषणा की कि वे संविधान की छठी अनुसूची, भूमि अधिकार, चाय बागान श्रमिकों की बदहाली, पर्यावरण विनाश और नागरिकता के नाम पर हो रहे भेदभाव के मुद्दों को लेकर अक्टूबर-नवंबर में पहाड़ की जनता के बीच एक व्यापक जन-अभियान चलाएंगे।
पहाड़ की ताक़त पर 'दिल्ली' का ताला: स्वायत्तता छीने जाने पर गरजे मोहम्मद सलीम!
'पहाड़' की ताकत 'पहाड़' के हाथों में क्यों नहीं ?
मोहम्मद सलीम का सीधा सवाल
पश्चिम बंगाल। दार्जिलिंग: आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहाड़ की जनता को उनका संवैधानिक और निर्वाचित स्वायत्त अधिकार देने से भाग रही है। रविवार को दार्जिलिंग के ऐतिहासिक कलामंदिर हॉल में सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं की सभा को संबोधित करते हुए पार्टी के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने केंद्र की जनविरोधी नीतियों पर करारा प्रहार किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भाजपा सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं, बल्कि दिल्ली से चलने वाली एकाधिकारवादी व्यवस्था थोपना चाहती है। मोहम्मद सलीम ने कहा, "
भाजपा और आरएसएस न तो भारत की बहुलतावादी संस्कृति में विश्वास रखते हैं और न ही विविधता में एकता को स्वीकार करते हैं। यही वजह है कि जीटीए (GTA) में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की स्वायत्त संस्था बनाने के बजाय प्रशासनिक अफसर बिठाकर लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है।"

राहुल सांकृत्यायन को नमन और जनसभा में नेताओं का तांता
रविवार को दार्जिलिंग और कर्सियांग एरिया कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में दार्जिलिंग शहर स्थित कला मंदिर हॉल में एक प्रभावी कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में मोहम्मद सलीम ने महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस जनसभा में मंच पर प्रमुख नेताओं की मौजूदगी रही। मंच पर लगे मुख्य बैनर पर नेपाली/देवनागरी लिपि में ' भारतको कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)' का स्पष्ट उल्लेख है, जो पहाड़ के गोरखा समाज भाषाई भाषियों के साथ वामपंथ के आत्मीय जुड़ाव को दर्शाता है। मंच पर मोहम्मद सलीम के साथ सीपीआई(एम) के दार्जिलिंग जिला सचिव समन पाठक, वरिष्ठ नेता मयूख विश्वास, गौतम घोष, दिलीप सिंह, सचिन खाती और केबी वातार सहित कई प्रमुख नेता मुस्तैदी से डटे नजर आए।
क्षेत्रीय स्वायत्तता पर हमला: कश्मीर से लद्दाख और दार्जिलिंग तक एक ही साजिश
विकेंद्रीकरण और स्वायत्तता के प्रति भाजपा-आरएसएस के तानाशाही रवैये को उजागर करते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि किसी भी क्षेत्र की स्थानीय समस्याओं का सही और सटीक समाधान वहां की जनता ही कर सकती है। लेकिन भाजपा को जनता का यह अधिकार बर्दाश्त नहीं है। आजादी के बाद से देश के कई केंद्र शासित प्रदेशों को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया, लेकिन मोदी सरकार ने उल्टी गंगा बहाते हुए पूर्ण राज्य कश्मीर को तोड़कर दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया और पूरे क्षेत्र को अस्थिरता में धकेल दिया। आज लद्दाख की जनता जब अपने स्वायत्त अधिकारों के लिए सड़कों पर है, उनके प्रमुख नेता और जननायक सोनम वांगचुक को जेल की सलाखों के पीछे रखा गया। भाजपा न तो मानवाधिकार समझती है और न ही लोकतांत्रिक व भाषाई विविधता का सम्मान करती है; वह जबरन 'एक देश, एक सोच' का तानाशाही ढांचा थोप रही है।
अफसरों के दम पर स्वायत्तता नहीं चलती: नौकरशाही राज पर मोहम्मद सलीम का करारा तंज
कार्यकर्ता-सभा के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए मोहम्मद सलीम ने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा हाल ही में घोषित 'टास्क फोर्स' और जीटीए में प्रशासक की नियुक्ति पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि बिना वास्तविक और अधिकार-संपन्न स्वायत्तता के कोई भी स्वायत्त निकाय केवल सफेद हाथी साबित होता है। इसके लिए चुने हुए प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य है। इतिहास याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि ब्रिटिश हुकूमत के दौर में भी देशबंधु चित्तरंजन दास को स्वायत्त शासन के लिए अंग्रेजों को छह-छह बार चिट्ठियां लिखनी पड़ी थीं। प्रशासनिक अफसरों को बिठाकर कभी क्षेत्रीय स्वायत्तता नहीं दी जा सकती। सलीम ने चेतावनी दी कि जिस रफ्तार से हर जगह प्रशासक बिठाए जा रहे हैं, कल को विधानसभाओं में विधायकों के अधिकार भी छीन लिए जाएंगे और मुख्यमंत्री केवल दिल्ली के फरमानों का ऐलान करने वाले कठपुतली बनकर रह जाएंगे।
स्थायी राजनीतिक समाधान और संविधान की छठी अनुसूची ही एकमात्र रास्ता
पहाड़ के मुद्दों पर भाजपा के खोखले वादों की धज्जियां उड़ाते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि भाजपा ने आज तक पहाड़ के लोगों से किया एक भी वादा पूरा नहीं किया। वामपंथियों का रुख हमेशा साफ और अडिग रहा है- संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत पहाड़ में चुनी हुई स्वायत्त संस्था का गठन किया जाए और स्थायी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की जाए। उन्होंने कहा कि भाजपा हर चुनाव में अलग राग अलापती है; कभी राजनीतिक समाधान का झांसा देती है, तो अब 'टास्क फोर्स' का नाटक रच रही है। मोहम्मद सलीम ने याद दिलाया कि वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में ही पहाड़ की स्वायत्तता को सुरक्षित करने के लिए त्रिपक्षीय समझौते हुए थे। अगर उन नीतियों को ईमानदारी से लागू किया जाता, तो सत्ता के विकेंद्रीकरण के साथ-साथ पहाड़ को विकास के लिए पर्याप्त वित्तीय और प्राकृतिक संसाधनों का सीधा अधिकार मिलता।
वाममोर्चा का सुशासन बनाम तृणमूल-भाजपा का दमनकारी मॉडल
मोहम्मद सलीम ने जनता को वाममोर्चा सरकार के उस दौर की याद दिलाई जब पूरे पश्चिम बंगाल में त्रिस्तरीय पंचायत और नगर निकायों को संवैधानिक अधिकार देकर सत्ता का वास्तविक विकेंद्रीकरण किया गया था। त्रिपुरा की वाममोर्चा सरकार ने भी जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त जिला परिषद (ADC) का ऐतिहासिक गठन किया था। इसके विपरीत, बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार ने पंचायतों और नगर पालिकाओं के अधिकारों पर डकैती डाली, और केंद्र की भाजपा सरकार ने आकर पूरे लोकतंत्र को ही ठप कर दिया है। दार्जिलिंग में जीटीए का निर्माण जिस उद्देश्य और जन-आकांक्षाओं के लिए हुआ था, उसे पूरी तरह मलबे में तब्दील कर दिया गया है।
अक्टूबर-नवंबर में सीपीआई(एम) का 'पहाड़ बचाओ' व्यापक जन-अभियान
पत्रकार वार्ता में सीपीआई(एम) दार्जिलिंग जिला सचिव समन पाठक ने घोषणा की कि आगामी अक्टूबर और नवंबर के महीनों में पार्टी पहाड़ की ज्वलंत समस्याओं को लेकर सीधे जनता के दरवाजे तक जाएगी। समन पाठक ने कहा -
कॉर्पोरेट घरानों की गिद्ध दृष्टि और अंधाधुंध दोहन के कारण पहाड़ का पर्यावरण पूरी तरह तबाह हो रहा है, जिससे आए दिन भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं में आम मासूम लोगों की जान जा रही है। इसके साथ ही बंद पड़े चाय बागानों और श्रमिकों का भयावह आर्थिक संकट पहाड़ को निगल रहा है। सीपीआई(एम) इन तमाम मुद्दों पर आम जनता को एकजुट कर एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करेगी।
बुनियादी सवालों से ध्यान भटकाने के लिए नफरत और सीएए (CAA) का खतरनाक खेल
मोहम्मद सलीम ने पहाड़ के आम नागरिकों के मुख्य दर्द को रेखांकित करते हुए कहा कि आज पहाड़ की असली लड़ाई क्या है? लगातार आती प्राकृतिक आपदाएं, बाढ़ से बेघर होते परिवार, चाय बागान मजदूरों की घुटती सांसें, टूटी सड़कें, पीने के पानी का संकट, जमीन के मालिकाना हक का अभाव, बेरोजगारी, और बदहाल शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं! लेकिन भाजपा इन बुनियादी सवालों का जवाब देने के बजाय जाति और धर्म के नाम पर नफरत का जहर घोल रही है। भाजपा सरकार पूरी तरह से फासीवादी हथकंडे अपनाकर आम लोगों के मानवाधिकार, लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार छीन रही है। SIR (समरी रिवीजन) के नाम पर पहाड़ के मूल निवासियों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के नाम मतदाता सूचियों से गायब किए जा रहे हैं।
सीएए (CAA) पर पूछे गए सवाल का मुंहतोड़ जवाब देते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि इस कानून से आखिर कितने लोगों को नागरिकता मिली? यह कानून मूल रूप से देश के पश्चिमी छोर (राजस्थान, गुजरात, पंजाब) में पाकिस्तान से आए उन शरणार्थियों की कागजी समस्याओं को दूर करने के लिए था जो अपनी डिग्री या सर्टिफिकेट का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। लेकिन पूर्वी भारत में भाजपा ने इस कानून का इस्तेमाल सिर्फ समाज को बांटने के लिए किया है। कभी 'बांग्लादेशी' तो कभी 'रोहिंग्या' का डर दिखाकर अपनों को ही देश का दुश्मन ठहराया जा रहा है। मोहम्मद सलीम ने दो टूक कहा, "सीएए नागरिकता देने का कानून है ही नहीं, यह तो देश के वैध-नागरिकों को अवैध-नागरिक बनाने की एक गहरी और खतरनाक साजिश है।"
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 14.09.2026
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