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शबाना आजमी: "युवाओं का यह आक्रोश देश का रुख बदलने वाला ऐतिहासिक मोड़ है "

केशव कुमार भट्टड़•03 अगस्त 20267 मिनट पठन120 बार पढ़ा गया

वरिष्ठ अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने जंतर-मंतर पर नीट (NEET) धांधली व शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ जारी छात्र आंदोलन को देश का रुख मोड़ने वाला ऐतिहासिक अध्याय बताया है। उनका मानना है कि सरकार युवाओं के इस स्वतःस्फूर्त आंदोलन को दबा नहीं सकती, क्योंकि इसने पूरे देश के जन-मन को झकझोर दिया है। एक साक्षात्कार में उन्होंने पीएम को पत्र लिखने, आंदोलन पर पुलिस की बर्बरता और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर गहरा आक्रोश जताया।

शबाना आजमी: "युवाओं का यह आक्रोश देश का रुख बदलने वाला ऐतिहासिक मोड़ है "

"युवाओं का यह आक्रोश देश का रुख बदलने वाला ऐतिहासिक मोड़ है"

दमन से नहीं दबेगी युवाओं की आवाज़; शिक्षा और भविष्य बचाने की यह लड़ाई अब हर घर की लड़ाई है! - शबाना आजमी

नई दिल्ली, 2 अगस्त- जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन भारत के इतिहास का एक मोड़ बदलने वाला अध्याय बनने जा रहा है। प्रसिद्ध अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने यह बात कही। दिल्ली में छात्रों के आंदोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त करने के लिए वे स्वयं उपस्थित हुई थीं। बाद में संसद मार्च में भी छात्रों के साथ शामिल हुई थीं। वहाँ आंसू गैस के धुएँ के कारण यह वरिष्ठ नेत्री बीमार भी पड़ गई थीं। 'द वायर' पर सिद्धार्थ भाटिया को दिए एक साक्षात्कार में शबाना आजमी ने छात्रों के आंदोलन और देश पर इसके प्रभाव के बारे में बात की।

उन्होंने कहा, छात्र तो आंदोलन चला ही रहे हैं, लेकिन अगर सरकार में जवाबदेह शासन की न्यूनतम लज्जा या सौजन्य भी न हो, तो फिर क्या ही कहा जाए? क्या सरकार सोचती है कि वह इसे दबा सकती है? ऐसा कभी नहीं होगा। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि यह मामला अब पूरी तरह से विपक्ष के हाथों में है। यह देखना बाकी है कि विपक्षी दल सरकार को बहस और चर्चा के लिए कैसे मजबूर करते हैं। सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना होगा, अपने छोटे-मोटे मतभेदों को किनारे रखकर एक व्यापक सहमति पर पहुँचना होगा।

वरिष्ठ अभिनेत्री ने कहा, मुझे जो सबसे अजीब लगता है वह यह है कि सालों से हम कहते आ रहे हैं कि देश की प्रगति को मापने के लिए हमें जनस्वास्थ्य, शिक्षा और महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में निवेश करना होगा, जबकि हम देख रहे हैं कि शिक्षा के बजट में कटौती करके उसे न्यूनतम स्तर पर कैसे लाया जा रहा है। जहाँ हम 6 प्रतिशत आवंटन की मांग कर रहे हैं, वहीं उन्होंने इसे घटाकर 3 प्रतिशत या उससे भी नीचे ला दिया है, क्यों? क्या यह किसी भी तरह से तर्कसंगत है ?

इस आंदोलन का समर्थन क्यों किया और इसमें हिस्सा क्यों लिया?

"सोशल मीडिया पर जो कुछ देख रही थी, उससे मैं बेहद व्यथित हो गई थी। बच्चों में जो वास्तविक दर्द, गुस्सा और आक्रोश झलका रहा था, उस पर ज़रा सा भी ध्यान नहीं दिया जा रहा था। इसलिए सोशल मीडिया पर कुछ टिप्पणियाँ करने के साथ-साथ मुझे लगा कि वहाँ व्यक्तिगत और शारीरिक रूप से उपस्थित होना बहुत ज़रूरी है। इसलिए बहुत संवेदनशीलता के साथ, मैंने और जावेद अख्तर ने 15 जुलाई को सीधे प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा। हमने बताया था कि इस पत्र को लेकर मीडिया के सामने जाने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है। हम केवल चिंतित नागरिक और राज्यसभा के पूर्व सदस्य के रूप में आपसे अपील कर रहे हैं - कृपया इनके साथ बातचीत की पहल करें। मैंने इसे ईमेल, व्यक्तिगत रूप से और फैक्स के माध्यम से भेजा था। ठीक दो घंटे के भीतर हमें एक प्राप्ति रसीद मिली, जिसमें बताया गया कि दो दिनों के भीतर हमें सूचित किया जाएगा। इसके बाद मैंने दो दिन, तीन दिन, चार दिन इंतज़ार किया। पाँचवें दिन जब मैंने देखा कि आंदोलन और तीव्र रूप ले रहा है, तो मैं और अनिश्चितकाल तक इंतज़ार नहीं कर सकी। मैं वहाँ चली गई।"-शबाना आजमी ने बताया।

भूतपूर्व राज्यसभा सांसद शबाना आजमी ने उस दिन (20 जुलाई) की घटना पर बोलते हुए पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, जब भी पुलिस को किसी भीड़ को तितर-बितर करना होता है, तो उनका पालन करने के लिए एक सटीक प्रोटोकॉल या नियम होता है। पहले पुलिस को एक चेतावनी देनी होगी, फिर हवा में गोलियाँ चलानी होंगी, फिर वॉटर कैनन (पानी की बौछार) का उपयोग करना होगा, और फिर आंसू गैस का उपयोग करना होगा। और उसके बाद भी अगर लाठी चलानी पड़े, तो वह घुटने के नीचे ही होनी चाहिए। एक बहुत स्पष्ट प्रोटोकॉल मौजूद है। उस दिन दिल्ली में इसमें से किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया। स्पष्ट रूप से या तो उन्हें शीर्ष अधिकारियों से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए थे या फिर पुलिस को मनमानी करने की खुली छूट दे दी गई थी। यह समझने के लिए किसी रॉकेट वैज्ञानिक होने की आवश्यकता नहीं है।

कड़ा तंज कसते हुए शबाना आजमी ने कहा, लोगों का एक समूह छात्रों को सलाह दे रहा है कि राजनीति में शामिल न हों। इसका क्या अर्थ है, यह मेरी समझ से बाहर है! तो फिर बताइए कि हम किस विषय पर चर्चा करें, संसद में किस बात पर चर्चा होगी? क्या वे इस बात पर चर्चा करेंगे कि किस फ़िल्म का समर्थन करना है, या वे उन मुद्दों पर चर्चा करेंगे जो सीधे तौर पर इस देश के पर्यावरण, किसानों के अधिकारों, छात्रों के अधिकारों और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े हैं?

यह आंदोलन वास्तव में अब केवल नीट (NEET) के प्रश्नपत्र लीक से संबंधित नहीं रह गया है - सहमति जताते हुए शबाना आजमी ने कहा, छात्र अब पूरी शिक्षा प्रणाली के व्यापक और अमूल-चूल सुधार की मांग उठा रहे हैं। शबाना आजमी ने इस बात पर भी निराशा जताई कि बेरोजगारी पहले कभी इतने चरम पर नहीं पहुँची थी। उन्होंने इससे जुड़ा अपना एक अनुभव साझा किया: अर्थशास्त्र में डिस्टिंक्शन के साथ एमए पास करने वाला एक छात्र लंबे समय से नौकरी की तलाश कर रहा था, लेकिन उसे कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। हर जगह प्रयास करने के बाद भी जब उसे कुछ नहीं मिला, तो उसने मुझसे कहा, 'दीदी, मैं तो सफाई कर्मचारी बनने को भी तैयार हूँ, आप चाहें तो मुझसे गटर की सफाई करवा लीजिए, लेकिन मुझे एक नौकरी दिलवा दीजिए। मुझे बताया गया है कि अगर मैं 3 लाख रुपये रिश्वत दूँ, तभी मुझे नौकरी मिलेगी।'

आक्रोश के साथ समाज सेविका ने कहा, क्या आप समझ रहे हैं कि हम असल में क्या कर रहे हैं और हम समाज में किस तरह की हताशा पैदा कर रहे हैं? शबाना आजमी ने बताया कि मुंबई में भी वे इस तरह के आंदोलनों में भाग लेंगी। उन्होंने कहा, हम अपने आंदोलनकारियों का समूह और लोगों का दायरा तैयार कर रहे हैं—वे लोग जो लिखेंगे और इस तरह के सामाजिक संवादों में शामिल होंगे जो हम आमतौर पर करते हैं। मैंने किसी को पीछे हटते नहीं देखा। जो लोग इस स्थिति की गंभीरता को समझ रहे हैं, वे सभी अपना जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं। मैं कह रही हूँ कि इस बार कुछ ऐसा हुआ है जो पहले कभी नहीं हुआ। इसने हममें से हर एक के जीवन को छुआ है।

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि एक नागरिक और एक अभिभावक के रूप में वे इस आंदोलन में बनी रहेंगी। शबाना आजमी ने कहा, जो लोग जंतर-मंतर आए थे, यह केवल उनका मुद्दा नहीं है। पूरे भारत में जो कुछ भी हुआ है उसे देखने के बाद सरकार इतनी अंधी नहीं हो सकती कि वह सोचे कि जिस तरह से उसने शाहीन बाग आंदोलन या किसानों के आंदोलन को दबाया था, ठीक उसी तरह वह इसे भी नियंत्रित कर लेगी। क्योंकि युवा पीढ़ी का समाज पर बिल्कुल अलग प्रभाव पड़ता है; युवा ही हमारा भविष्य हैं। शबाना का मानना है कि जो मानवीय जुड़ाव दुर्भाग्य से अन्य बड़े आंदोलनों में नहीं हो पाया, वह इस बार हुआ है। अन्य आंदोलनों की भी वैसी ही गूँज होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस आंदोलन ने हर व्यक्ति के हृदय को छू लिया है।

शबाना आजमी ने कहा, मैं इस आंदोलन को लेकर आशावादी हूँ क्योंकि मुझे वास्तव में विश्वास है कि जनता की भागीदारी और नागरिकों का जुड़ाव एक जवाबदेह शासन पर पर्याप्त दबाव बना सकता है। और मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा होकर रहेगा। मुझे नहीं लगता कि इतना ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण आंदोलन बिना किसी परिणाम के समाप्त हो जाएगा।


साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 3 अगस्त 2026।

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प्रकाशित: 03 अगस्त 2026 • 7 मिनट पठन

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