"हिरोशिमा और नागासाकी की राख आज भी पूछ रही है—क्या सत्ता ने इंसानियत सीखी ?" 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी सिर्फ़ बम से नहीं, सत्ता के फैसलों से जले थे। हिरोशिमा कोई पुरानी न्यूज़ नहीं, आज की वार्निंग है। जब सत्ता इंसान से बड़ी हो जाती है, तो शहर मैप पर नहीं, इतिहास में बचते हैं। आज हथियार बदल गए हैं, लेकिन पावर गेम अब भी जारी है। सबसे बड़ी कीमत आज भी आम लोग चुकाते हैं। याद रखना चाहिए कि —युद्ध किसी का "Win" नहीं, पूरी इंसानियत का "Loss" है। #NeverAgain सिर्फ़ हैशटैग नहीं, आने वाले कल की ज़िम्मेदारी है। अब तय हमें करना है—War Mode या Peace Mode? तो अपने आप से वादा करें - Power से पहले People. Weapons से पहले Welfare. War से पहले World.
मानवता की स्क्रीन पर हमेशा के लिए पिन हुई एक नोटिफ़िकेशन हैं—
"Warning: जब सत्ता इंसान से बड़ी हो जाती है, तब सभ्यता ख़तरे में पड़ जाती है।"
हिरोशिमा से आज तक: युद्ध, साम्राज्यवाद और शांति की खोज
हिरोशिमा फाइल: जब सत्ता ने इंसानियत 'डिलीट' कर दी। ~ केशव भट्टड़
महाविनाश का दिन 6 अगस्त 1945। सुबह के ठीक 8 बजकर 15 मिनट। जापान का हिरोशिमा शहर अन्य दिनों की तरह ही अपनी सामान्य दिनचर्या में जाग रहा था। ठीक उसी पल, अमेरिकी बी-29 बॉम्बर 'एनोला गे' से 'लिटिल बॉय' नाम का यूरेनियम-आधारित परमाणु बम गिराया गया। आकाश में एक अभूतपूर्व, आँखों को चौंधिया देने वाली रोशनी कौंधी, और कुछ ही क्षणों में 4,000 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान के साथ आग का एक विशाल गोला उत्पन्न हुआ। शहर का ढांचा, भवन और मनुष्य क्षण भर में वाष्पीकृत हो गए। तीन दिन बाद, 9 अगस्त को दोपहर 11 बजकर 2 मिनट पर नागासाकी भी 'फैट मैन' नामक प्लूटोनियम बम की चपेट में आकर इसी त्रासदी का शिकार बना।
वर्ष 1945 के अंत तक इन दोनों परमाणु हमलों में सीधे तौर पर 2,000,000 (दो लाख) से अधिक लोग मारे जा चुके थे। इनमें से लगभग 99% से अधिक निर्दोष नागरिक थे—बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग, अस्पताल के मरीज और मजदूर। जो जीवित बचे—जिन्हें जापानी भाषा में 'हिबाकुशा' (Hibakusha) कहा जाता है—वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकिरणजन्य कैंसर, आनुवंशिक विकृतियों, बांझपन और सामाजिक बहिष्कार की असह्य पीड़ा ढोते रहे।
हिरोशिमा और नागासाकी केवल दो जापानी शहरों का विनाश नहीं था। यह इतिहास का वह विभाजनकारी मोड़ था जहाँ मानव सभ्यता ने अपनी ही वैज्ञानिक मेधा के बाल पर अपने ही संपूर्ण विनाश का तंत्र विकसित कर लिया।
भू-राजनीति, अनैतिकता और इतिहास का द्वंद्व
इतिहास स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि इन परमाणु हमलों का निर्णय तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन और उनके सैन्य सलाहकारों द्वारा लिया गया था। अमेरिका ने इसे आधिकारिक तौर पर यह कहकर उचित ठहराया कि ऑपरेशन डाउनफॉल (जापान पर पैदल सेना का आक्रमण) को रोककर मित्र राष्ट्रों के लाखों सैनिकों के जीवन की रक्षा करना अनिवार्य था। हालाँकि, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अमेरिकी और वैश्विक इतिहासकारों की शोध-सामग्री (जैसे गार एल्परोविट्ज़ का ऐतिहासिक विश्लेषण) एक अलग दृश्य दिखाती है :
जापान का समर्पण: अगस्त 1945 तक जापान की नौसेना पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी, उसके तेल संसाधन खत्म हो चुके थे, और चीन-जापान युद्ध में सोवियत संघ के प्रवेश से जापान का पराजय-चक्र पूरा हो चुका था। हमले के बिना भी जापान का सरेंडर कर देना निश्चित था।
सोवियत संघ को संदेश: कई आधुनिक इतिहासकारों और विश्लेषणों का मानना है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराने का प्राथमिक उद्देश्य केवल जापान को हराना नहीं था, बल्कि उभरते शीत युद्ध में सोवियत संघ (USSR) के समक्ष अपनी सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करना (Atomic Diplomacy) था।
यहाँ से एक अनिवार्य नैतिक प्रश्न उठता है: 'क्या किसी साम्राज्यवादी या सैन्य लक्ष्य को पाने के लिए लाखों निर्दोष नागरिकों की सामूहिक बलि को किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून या मानवीय मापदंड पर न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?'
युद्ध का अर्थशास्त्र: पूँजीवाद, साम्राज्यवाद और सैन्य-औद्योगिक परिसर
एक प्रगतिशील विश्लेषण केवल सतह पर होने वाली सैन्य झड़पों को नहीं देखता; वह उन अंतर्निहित परिस्थितियों की पड़ताल करता है जो युद्ध को अनिवार्य बना देती हैं। मार्क्सवादी चिंतक व्लादिमीर लेनिन ने अपनी ऐतिहासिक कृति 'Imperialism, the Highest Stage of Capitalism' में रेखांकित किया था कि पूँजीवाद जब अपने एकाधिकारवादी (मोनोपॉली) चरण में पहुँचता है, तो राष्ट्रीय बाज़ार उसके लिए छोटे पड़ जाते हैं। इसके बाद शुरू होती है—संसाधनों, कच्चे माल, सस्ते श्रम और भू-राजनीतिक प्रभुत्व वाले बाज़ारों के पुनर्गठन की प्रतिस्पर्धी होड़। पूँजीवादी एकाधिकार के लिए वैश्विक बाज़ारों व संसाधनों पर कब्ज़ा करना जरूरी हो जाता है और तब शुरू होती है साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा । प्रतिस्पर्धा सघन होते ही सैन्य टकराव / युद्ध अनिवार्य हो उठता है। इस प्रकार विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व युद्ध और उसके बाद के क्षेत्रीय युद्ध केवल विचारधाराओं का संघर्ष नहीं , बल्कि वे वैश्वीकृत पूँजी के हितों और संसाधनों के बँटवारे के लिए लड़े गए युद्ध ही हैं, जिसमे जीते कोई भी , आम आदमी हर तरह से हारता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने अपने विदाई भाषण में 'सैन्य-औद्योगिक परिसर' (Military-Industrial Complex) के प्रति चेतावनी दी थी। जब हथियार निर्माण एक बहु-अरब डॉलर का उद्योग बन जाता है, तो उस उद्योग का अस्तित्व और उसका मुनाफा ही इस बात पर निर्भर करता है कि दुनिया में लगातार युद्ध, तनाव और असुरक्षा का माहौल बना रहे।
आज का विरोधाभास: हथियारों की अंधी दौड़ बनाम जन कल्याण
हिरोशिमा के 80 से अधिक वर्षों बाद भी मानव जाति ने इस त्रासदी से कोई ठोस सीख नहीं ली है। आज भी वैश्विक स्तर पर हथियारों का जमावड़ा अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर है। एक ओर वैश्विक स्तर पर सैन्य खर्च 2,400 अरब डॉलर (2.4 ट्रिलियन USD) से अधिक हो चुका है, जिसके कारण हथियारों के शोध, उत्पादन और खरीद पर सार्वजनिक धन की निरंतर बर्बादी हो रही है। इसके साथ ही, दुनिया भर में 12,100 से अधिक सक्रिय और आरक्षित परमाणु हथियार मौजूद हैं, जिनकी विनाशकारी क्षमता पूरी पृथ्वी की सभ्यता को कई बार नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। दूसरी ओर, जन संकट की स्थिति यह है कि दुनिया भर में लगभग 700 मिलियन (70 करोड़) लोग अत्यधिक भुखमरी में जीने को मजबूर हैं, जबकि मात्र कुछ सौ अरब डॉलर के आवंटन से ही दुनिया से भुखमरी और प्राथमिक शिक्षा की आधारभूत कमी को पूरी तरह सुधारा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक तापमान में वृद्धि और पारिस्थितिकी विनाश के रूप में गंभीर जलवायु संकट खड़ा हो रहा है, जिसमें विभिन्न सैन्य अभियानों और रक्षा गतिविधियों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन इस संकट को और अधिक तीव्र कर रहा है। यह विरोधाभास केवल आर्थिक कुप्रबंधन का विषय नहीं है, बल्कि एक गंभीर नैतिक विफलता है। यदि मानवता के पास आधुनिक मिसाइलों, परमाणु पनडुब्बियों और स्टील्थ विमानों के निर्माण के लिए असीमित संसाधन उपलब्ध हैं, तो हर बच्चे के लिए स्कूल, हर परिवार के लिए स्वच्छ पेयजल और हर नागरिक के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं (Universal Healthcare) के संसाधन क्यों नहीं हैं?
लोकतंत्र, समाजवाद और मानवाधिकारों का वास्तविक अर्थ
लोकतंत्र का अर्थ केवल 4 या 5 साल में एक बार वोट डाल देना या चुनावी प्रक्रियाओं का संचालन करना भर नहीं है। लोकतंत्र की आत्मा निहित है - मानव जीवन के जीवन-अधिकार और गरिमा के संरक्षण में, राज्य की शक्ति पर नागरिक नियंत्रण और जवाबदेही स्थापित करने में, तथा युद्धोन्माद (Jingoism) के स्थान पर शांति और असहमति के अधिकार को स्थान देने में। इसी प्रकार, समाजवाद और साम्यवाद की मूल ऐतिहासिक प्रेरणा— उनके वैचारिक और दार्शनिक सिद्धांतों में—समानता, शोषण से मुक्ति, सामूहिक कल्याण और अंतरराष्ट्रीय मजदूर एकजुटता (Proletarian Internationalism) की रही है। यह विचार आज भी प्रासंगिक है कि मानव समाज का मुख्य चालक 'मुनाफा' नहीं, बल्कि 'मानवीय कल्याण' होना चाहिए।
गंभीरता से विचार करें। राजनीति का मूल केंद्र क्या होना चाहिए?
-बाज़ार-केंद्रित: लाभ की अधिकतम प्राप्ति, संसाधनों का निजीकरण और शक्ति के बल पर वैश्विक प्रभुत्व। या -जन-केंद्रित : सार्वजनिक स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक नवाचार, सांस्कृतिक समृद्धि और सार्वभौमिक (ग्लोबल) शांति।
"नेवर अगेन" ( (फिर कभी नहीं)) — एक राजनीतिक संकल्प
हिरोशिमा हमें सिखाता है कि नैतिकता से रहित विज्ञान केवल विनाशकारी हो सकता है—जैसे नाभिकीय भौतिकी का उपयोग बिजली बनाने के बजाय लाखों लोगों को भस्म करने में किया गया। नागासाकी हमें याद दिलाता है कि संवेदनाहीन सैन्य शक्ति किसी भी सभ्यता को मिनटों में राख के ढेर में बदल सकती है। आज, जब दुनिया एक बार फिर से बहु-ध्रुवीय तनावों, छद्म युद्धों (Proxy Wars) और नए परमाणु खतरों के मुहाने पर खड़ी है, तब 'हिरोशिमा दिवस' को केवल एक ऐतिहासिक शोक दिवस के रूप में नहीं मनाया जाना चाहिए। यह दिन एक प्रतिरोध (Resistance) का दिन है: साम्राज्यवादी वर्चस्ववादी नीतियों के विरुद्ध, सैन्य-औद्योगिक परिसर और हथियारों के व्यापारियों के विरुद्ध, और हर उस राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध जो मानव जीवन से ऊपर कॉर्पोरेट मुनाफे या राज्य की सैन्य शक्ति को रखती है। मानवता की वास्तविक महानता इस बात में नहीं है कि उसकी सत्ता पास कितनी विनाशकारी मिसाइलें हैं, बल्कि इसमें है कि वह सत्ता अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितना सुरक्षित, समृद्ध और सम्मानजनक जीवन प्रदान कर पाती है। जब तक दुनिया से हथियारों की यह अंधी दौड़ और मुनाफे की अंधाधुंध राजनीति समाप्त नहीं होती, तब तक हिरोशिमा का धुआँ हमारी सामूहिक चेतना पर एक चेतावनी बनकर मँडराता रहेगा। "नेवर अगेन" (फिर कभी नहीं) को केवल एक नारा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का बुनियादी संकल्प बनना ही होगा।
हिरोशिमा और नागासाकी सिर्फ़ जापान का इतिहास नहीं है। हिरोशिमा और नागासाकी सिर्फ़ दो तारीख़ों की कहानी भर नहीं है। वे दोनों आम जनों की, मानवता की स्क्रीन पर हमेशा के लिए पिन हुई एक नोटिफ़िकेशन हैं—
"चेतावनी : जब सत्ता इंसान से बड़ी हो जाती है, तब सभ्यता ख़तरे में पड़ जाती है।"
इस नोटिफ़िकेशन को "खारिज" ना किया जाए, हमेशा ध्यान में रखा जाए। अगर हिरोशिमा को सिर्फ़ एक चैप्टर समझकर बंद कर दिया...तो इतिहास किसी दिन फिर वही फ़ाइल खोल देगा। और तब शायद...पढ़ने वाला कोई नहीं बचेगा। अब एक मिनट का मौन उन निर्दोषों के लिए जो वर्चस्व की इस हिंसा-प्रतिहिंसा के शिकार हुए।
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