कि जिनके पास
दिमाग़ है
उन्हें वे बरगला रहे हैं
जो अक्ल से पैदल हैं
जन समाचार मंच
कि जिनके पास
दिमाग़ है
उन्हें वे बरगला रहे हैं
जो अक्ल से पैदल हैं

शुक्रिया जहांपनाह !
दिल की गहराइयों से
शुक्रिया
कि आपने तस्लीम किया
कि नक्सल होने के लिए
दिमाग़ का होना
बेहद ज़रूरी है
नक्सल
वे ही हो सकते हैं
जिनके पास
दिमाग़ हो
जो सोचने
समझने
फ़ैसले लेने की
कूवत रखते हों
बजा फ़रमाया हुज़ूर
कि जिनके पास
दिमाग़ ही नहीं
वे तो सिर्फ़
कोरे भक्त हो सकते हैं
भक्ति के लिए
दिमाग़ की
क्या ज़रूरत!
लेकिन
एक बात खटक रही है
कि जिनके पास
दिमाग़ है
उन्हें वे बरगला रहे हैं
जो अक्ल से पैदल हैं
बात कुछ हज़म नहीं हुई
फिर भी
जिल्लेइलाही !
आपका लाख लाख
शुक्रिया!
*-हूबनाथ*
[लेखक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]
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प्रकाशित: 17 अगस्त 2026 • 1 मिनट पठन

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आंदोलन करना /
देशद्रोह /
हक़ मांगना /
राष्ट्रद्रोह /
बना दिया ।
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खिलाफत को /
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