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जादवपुर की रात: कैंपस के दरवाजे पर फासीवाद की दस्तक? - शमीक लाहिड़ी

अपराजिता•21 अगस्त 20267 मिनट पठन44 बार पढ़ा गया

इतिहास हूबहू खुद को नहीं दोहराता, लेकिन इतिहास की चेतावनियां जरूर लौट कर आती हैं। इसलिए जादवपुर की रात को सिर्फ छात्रों की आपसी झड़प मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि आज अगर विश्वविद्यालय में बाहरी राजनीतिक वाहिनी का प्रवेश सामान्य हो गया, तो कल वे दूसरे विश्वविद्यालयों में जाएंगे।

आज अगर तोड़फोड़ को राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन मान लिया गया, तो कल यह और बड़ा रूप लेगा।

आज अगर छात्रों की आवाज को ईंट, पत्थर और आग से खामोश किया जा सकता है, तो कल नागरिकों की आवाज भी बंद करा दी जाएगी।

जादवपुर की रात: कैंपस के

दरवाजे पर फासीवाद की दस्तक?

शमीक लाहिड़ी

रात के अँधेरे में विश्वविद्यालय में कौन दाखिल होता है ?

उनके हाथों में किताबें नहीं- तोड़ने के लिए हथौड़े हैं।

उनकी ज़ुबान पर तर्क नहीं - हिंसा की हुंकार है।

उनकी आंखों में सपने नहीं - कब्जे का नशा है।

जादवपुर विश्वविद्यालय सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं है। यह बंगाल की स्वतंत्र चिंतन की एक लम्बी परंपरा का नाम है। यहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं है, मतभेद होना दुश्मनी नहीं है और बहस का मतलब युद्ध नहीं है। यहाँ छात्र तर्क से लड़ते हैं, विचारों से लड़ते हैं, और प्रतिवाद से लड़ते हैं।

लेकिन अगर उसी विश्वविद्यालय का दरवाजा रात के अंधेरे में आरएसएस (RSS) के राजनीतिक कैडरों के लिए खोल दिया जाए; अगर छात्रों की जगह बाहरी 'गेस्टापो' (गुंडा) वाहिनी कब्जा कर ले; और अगर तर्क की जगह ईंट-पत्थर और तोड़फोड़ बोलने लगे — तो फिर यह सवाल सिर्फ जादवपुर का नहीं रह जाता।

सवाल यह बन जाता है — हमारा लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है?

19 अगस्त की देर रात जादवपुर में हुए जिस उपद्रव का आरोप लगा है, उसका पूरा सच सामने लाने के लिए एक निष्पक्ष जाँच बेहद जरूरी है। कौन अंदर घुसा था, किसने तोड़फोड़ की, कहाँ आग लगाने की कोशिश हुई और कौन-कौन घायल हुए — हर बात की जाँच होनी चाहिए।

लेकिन जाँच की मांग करना और सवाल उठाना एक बात नहीं है।

आज सवाल पूछना ही होगा:

• विश्वविद्यालय के दरवाजे से बाहरी लोग अंदर कैसे घुसे?

• उन्हें किसने बुलाया?

• उनका नेतृत्व कौन कर रहा था?

• किस राजनीतिक संरक्षण में वे इतने बेखौफ हुए?

• पुलिस उन्हें रोक क्यों नहीं पाई, या फिर उसने रोका क्यों नहीं?

इन सभी सवालों के जवाब चाहिए।

क्योंकि,

• विश्वविद्यालय किसी राजनीतिक दल का शाखा कार्यालय नहीं है।

• विश्वविद्यालय किसी पार्टी के गुंडे बनाने की फैक्टरी नहीं है।

• विश्वविद्यालय किसी वाहिनी का कब्जा करने वाला मैदान नहीं है।

जादवपुर नागपुर के निर्देशों पर नहीं चलेगा।

जादवपुर की जमीन पर छात्र ही अपनी बात रखेंगे।

और इस घटना के साथ जो नाम सामने आया है, उस नाम के साथ 2014 के एक गम्भीर आरोप का इतिहास जुड़ा हुआ है। अखबारों के दस्तावेजों के मुताबिक, उस समय जादवपुर विश्वविद्यालय के तृतीय वर्ष के छात्र निखिल दास को एक छात्रा के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तत्कालीन जाँच में भी आरोपों के प्राथमिक आधार सामने आए थे।

यहाँ एक बात साफ होनी चाहिए — आरोप का मतलब अदालत द्वारा सिद्ध किया गया अपराध नहीं होता। उस मामले के अंतिम कानूनी नतीजे के विश्वसनीय दस्तावेजों के बिना किसी को अपराधी नहीं कहा जा सकता।

लेकिन सवाल दूसरी जगह है:

• इतने गम्भीर आरोप में कभी गिरफ्तार हुआ व्यक्ति आज एबीवीपी (ABVP) के नेतृत्व तक कैसे पहुँचा?

• यह किस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति बनाई जा रही है?

• किन नैतिक मूल्यों को सामने रखकर नेतृत्व का चुनाव किया जा रहा है?

• और अगर आज उसी नेतृत्व के नाम को लेकर विश्वविद्यालय में फिर से हिंसा, बाहरी तत्वों के प्रवेश और तोड़फोड़ के आरोप उठते हैं, तो क्या सवाल पूछना अपराध है? नहीं। बल्कि सवाल न पूछना अपराध है।

क्योंकि फासीवाद सबसे पहले दरवाजे पर लात नहीं मारता। फासीवाद सबसे पहले इंसान के सवाल पूछने के अधिकार को कमजोर करता है। पहले कहा जाता है — 'वे दुश्मन हैं'। फिर कहा जाता है — 'दुश्मन के प्रति नफरत का जहर फैलाओ'। फिर दुश्मनों को डराने के लिए वाहिनी उतारी जाती है। फिर तर्क की जगह लाठी ले लेती है। और फिर विश्वविद्यालय के दरवाजे से खौफ दाखिल होता है।

और जब लोग डरना शुरू कर देते हैं — तभी फासीवाद जीतना शुरू करता है।

नब्बे साल पहले यूरोप ने यह अँधेरा देखा था। हिटलर के नाजी शासन में विश्वविद्यालय, मीडिया, संस्कृति, कला और नागरिक स्वतंत्रता — एक-एक करके आजादी के सभी दायरों को समेट दिया गया था। राजनीतिक हिंसा तब सिर्फ सड़कों पर नहीं थी; वह लोगों की सोच के भीतर दाखिल हो चुकी थी।

इतिहास हूबहू खुद को नहीं दोहराता, लेकिन इतिहास की चेतावनियां जरूर लौट कर आती हैं। इसलिए जादवपुर की रात को सिर्फ छात्रों की आपसी झड़प मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि आज अगर विश्वविद्यालय में बाहरी राजनीतिक वाहिनी का प्रवेश सामान्य हो गया, तो कल वे दूसरे विश्वविद्यालयों में जाएंगे।

आज अगर तोड़फोड़ को राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन मान लिया गया, तो कल यह और बड़ा रूप लेगा।

आज अगर छात्रों की आवाज को ईंट, पत्थर और आग से खामोश किया जा सकता है, तो कल नागरिकों की आवाज भी बंद करा दी जाएगी।

आज जादवपुर।

कल कहाँ?

आज विश्वविद्यालय का दरवाजा।

कल शायद आपके घर का दरवाजा।

आज छात्र की आवाज।

कल शायद आपकी आवाज।

इसलिए सवाल पूछिए। बिना डरे

सवाल पूछिए:

कौन आए थे?

उन्हें कौन लाया था?

तोड़फोड़ किसने की?

आग लगाने की कोशिश किसने की?

वे किस राजनीतिक छत्रछाया में आए थे?

पुलिस कहाँ थी?

प्रशासन क्या कर रहा था?

हर एक सवाल का जवाब चाहिए।

लेकिन सिर्फ सवाल पूछने से काम नहीं चलेगा। विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय के रूप में ही बचाना होगा। यहाँ विचारों की लड़ाई होगी — होने दीजिए। वामपंथी रहेंगे, दक्षिणपंथी रहेंगे, एबीवीपी रहेगी, एसएफआई रहेगी, अन्य वामपंथी रहेंगे, स्वतंत्र छात्र रहेंगे — सब रहेंगे।

लेकिन — लोकतांत्रिक राजनीति और राजनीतिक आतंकवाद दो अलग चीजें हैं। विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से किया जा सकता है। लेकिन ईंट-पत्थरों से तर्क को नहीं हराया जा सकता।

आग लगाकर विचारों को नहीं जलाया जा सकता। और बल प्रयोग करके इतिहास को नहीं रोका जा सकता।

इसलिए आज कुछ बातें साफ तौर पर कहनी होंगी:

यह विश्वविद्यालय किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं है।

किसी राजनीतिक दल का कब्जा किया हुआ इलाका नहीं है।

किसी गेस्टापो वाहिनी का युद्धक्षेत्र नहीं है।

यह छात्रों का विश्वविद्यालय है।

यह शिक्षकों का विश्वविद्यालय है।

यह स्वतंत्र चिंतन का विश्वविद्यालय है।

यह बंगाल की लोकतांत्रिक परम्परा का विश्वविद्यालय है।

​और इसी वजह से आज जादवपुर का सवाल दरअसल हममें से हर एक का सवाल है।

आप जादवपुर के छात्र नहीं हैं? फिर भी यह सवाल आपका है।

आप शिक्षक नहीं हैं? फिर भी यह सवाल आपका है।

आप किसी छात्र संगठन से नहीं जुड़े हैं? फिर भी यह सवाल आपका है।क्योंकि जब विश्वविद्यालय का दरवाजा तोड़कर राजनीतिक गुंडे दाखिल होते हैं, तो वे सिर्फ एक कैंपस में प्रवेश नहीं करते — वे हमारे भविष्य के दरवाजे पर दस्तक देते हैं।

​वह दरवाजा आज खोल देना है या डटकर बंद कर देना है — यह फैसला हमारा है। इतिहास का सबसे भयानक मोड़ तब आता है, जब लोग कहते हैं — "यह तो उनका मामला है।"नहीं। यह हमारा मामला है।​क्योंकि आज अगर दूसरे के विश्वविद्यालय में आग जलती है और हम चुप रहते हैं, तो कल वह आग हमारे घर के दरवाजे तक भी पहुँच सकती है।

​इसलिए आज जादवपुर के अनुभव से सिर्फ एक ही आवाज उठनी चाहिए:

​डर नहीं।

​खामोशी नहीं।

​कब्जा नहीं।

​वाहिनी की राजनीति नहीं।

​तर्क रहेगा।

विरोध रहेगा।

लोकतंत्र रहेगा।

विश्वविद्यालय रहेगा।

​और जो लोग सोच रहे हैं कि रात के अँधेरे में आकर वे जादवपुर को डरा देंगे — उन्हें याद रखना चाहिए:

रात जितनी भी गहरी हो — सवेरा आएगा ही।

जादवपुर डरेगा नहीं।

जादवपुर झुकेगा नहीं।

जादवपुर लड़ेगा।

.

.

लेखक जादवपुर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र, पूर्व सांसद और सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं।

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जादवपुर की रात: कैंपस के दरवाजे पर फासीवाद की दस्तक? - शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 21 अगस्त 2026 • 7 मिनट पठन

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