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दूध का कटोरा, फहराता झंडा और 'देशप्रेम प्राइवेट लिमिटेड' - शमीक लाहिड़ी

अपराजिता•24 अगस्त 20266 मिनट पठन20 बार पढ़ा गया

यह देश कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं है। यह देश उस माँ का है, जो फुटपाथ की हवा में चूल्हे का धुआँ मिलाती है। यह देश उस छात्र का है, जो मंत्री की धमकियों को ठेंगा दिखाता है। यह देश उस मज़दूर का है, जिसकी रीढ़ की हड्डी पर इस शहर की इमारतें खड़ी हैं। यह देश उस किसान का है, जिसके हाथों में इस मिट्टी की महक लगी है।

दूध का कटोरा, फहराता झंडा और 'देशप्रेम प्राइवेट लिमिटेड' -

शमीक लाहिड़ी

कोलकाता। एक माँ फुटपाथ पर बैठी थीं। उनका अपराध बहुत संगीन था — वह गरीब थीं! और इस चमकदार दौर में गरीब का सबसे बड़ा अपराध यही है कि वह नंगी आँखों से दिखाई देता है! उसका टूटा हुआ चूल्हा दिखाई देता है, उसका नंगा बच्चा दिखाई देता है, और सबसे बढ़कर उसकी गरीबी की करुण पुकार दिखाई देती है। इसलिए, शहर के सौंदर्यीकरण का पहला नियम है — दृश्य को साफ करो। फुटपाथ काँच की तरह साफ होगा, शहर चमकता हुआ शीशमहल बनेगा — बस किरदार ही गायब हो जाएंगे।

उस दिन किसी बड़े पाँच सितारा ब्रांड के मंत्री जी की नज़र एक धुंएँ उठते स्टोव पर पड़ गई। राज्य की मशीनरी तुरंत हरकत में आई — ‘अवैध कब्जा!’ माँ ने धीमी आवाज़ में कहा — ‘थोड़ा सा दूध गरम कर रही हूँ।’ क्या अद्भुत मज़ाक है! आधुनिक राज्य के शब्दकोश में बच्चे के लिए ‘दूध गरम करने’ का नाम भी अब ‘ज़मीन पर कब्जा’ है। तो क्या बच्चे की भूख मिटाने के लिए भी आजकल महामहिम मंत्रियों की अनुमति लेनी पड़ेगी?

यही है हमारी नई शहरी सभ्यता! यहाँ बहुराष्ट्रीय ब्रांडों के होर्डिंग्स टंग सकते हैं, आलीशान महलों के कट-आउट खड़े हो सकते हैं, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के मुस्कुराते हुए विशाल फ्लेक्स सज सकते हैं — बस एक गरीब के बच्चे के लिए थोड़ा सा दूध उबालने का अधिकार एक माँ को नहीं मिल सकता!

फिर अचानक दृश्य बदलता है। कैमरा फुटपाथ से तेज़ी से हटकर जादवपुर कैंपस पहुँचता है। वहाँ कोई चूल्हा नहीं जल रहा। वहाँ कुछ बहसें चल रही हैं, खुली किताबें हैं और उग्र आँखों का एक झुंड है। कुछ युवक-युवतियाँ शायद आज भी यह विश्वास करते हैं कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री बनाने की फैक्ट्री नहीं, बल्कि राज्य को कटघरे में खड़ा करने वाली अदालत भी है!

बस, तुरंत मुख्यमंत्री का फरमान जारी हो गया — ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’! ‘देशद्रोही’! ‘जिहादी’! इसके साथ ही एक अनमोल ऐतिहासिक सत्य की खोज हुई — जादवपुर में तो कभी राष्ट्रीय ध्वज फहराया ही नहीं जाता!

जबकि विश्वविद्यालय के दस्तावेज़ कहते हैं — झंडा फहराया जाता है, स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है और राष्ट्रगान भी बजता है। लेकिन सत्ता के सामने सच का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता; सच को भी अब सत्ताधारी दल का बैज पहनकर घूमना पड़ता है। सरकार जो कहेगी वही इतिहास है, और दस्तावेज़ तो केवल रद्दी का कागज़ हैं!

देशभक्ति अब एक एकछत्र लाइसेंस-राज बन चुकी है। और यह लाइसेंस देने की अथॉरिटी कौन हैं? वे जो खुद को ‘देशभक्ति का इकलौता ठेकेदार’ कहते हैं। देश उनका है, झंडा उनका है, राष्ट्रवाद उनकी निजी संपत्ति है — यहाँ तक कि किसके खून में कितनी देशभक्ति है, इसका लैब-टेस्ट का ठप्पा भी उनकी जेब में है!

लेकिन एक छोटी सी भूल हो रही है। यह देश कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं है। यह देश उस माँ का है, जो फुटपाथ की हवा में चूल्हे का धुआँ मिलाती है। यह देश उस छात्र का है, जो मंत्री की धमकियों को ठेंगा दिखाता है। यह देश उस मज़दूर का है, जिसकी रीढ़ की हड्डी पर इस शहर की इमारतें खड़ी हैं। यह देश उस किसान का है, जिसके हाथों में इस मिट्टी की महक लगी है।

इसलिए देशभक्ति के ठेकेदारों को यह बता देना अच्छा है — सरकार के प्रति अंधी भक्ति और देशभक्ति एक चीज़ नहीं हैं। सरकार की विफलताओं पर उंगली उठाना कोई देशद्रोह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पहली शर्त है। जो राज्य एक स्वतंत्र सवाल से डरता है, उसके झंडे की ऊँचाई चाहे जितनी हो, उसके आदर्शों की ऊँचाई वास्तव में बहुत छोटी है।

फुटपाथ की वह माँ और जादवपुर का वह छात्र — अलग-अलग कहानियों के पात्र नहीं हैं, एक ही कहानी के दो किरदार हैं। एक माँग रही है — ‘मेरे बच्चे के लिए एक बूँद दूध।’ दूसरा माँग रहा है — ‘मेरे देश के लिए एक साँस आज़ादी।’ राज्य का जवाब एक ही है — ‘नो स्पेस!’ एक के लिए फुटपाथ पर जगह नहीं है, दूसरे के लिए बहस की मेज पर जगह नहीं है।

लेकिन राज्य यह भूल रहा है कि अन्याय की इस आग को बहुत दिनों तक दबाकर नहीं रखा जा सकता। आंदोलन की वह नज़्म आज भी हवाओं में गूँजता है — ‘जिस बच्चे को दूध न मिला, उतरा हुआ चेहरा — तैयार हो जाओ!’

हाँ, इसी ‘तैयार होने’ का नाम तो छात्र का विरोध है, इसी ‘तैयार होने’ का नाम तो नागरिक के सवाल पूछने का साहस है। सत्ता के घमंड में अंधे शासक इतिहास नहीं पढ़ते। वे नहीं जानते कि जिस बच्चे को दूध नहीं मिलता, उसकी माँ के आँसुओं में एक दिन शासक के सिंहासन को बहा ले जाने की ताकत होती है। फुटपाथ साफ करके चूल्हा हटाया जा सकता है, लेकिन सड़कों के आक्रोश को किसी फरमान से रोका नहीं जा सकता।

उफ! क्या आँखें चौंधिया देने वाला विकास है! शहर जितना जगमगा रहा है, इंसान के जीने का अधिकार उतना ही सिमट रहा है। झंडा जितना आसमान में लहरा रहा है, सवाल पूछने का अधिकार उतना ही ज़मीन के नीचे दफनाया जा रहा है।

लेकिन पाँच सितारा संस्कृति के मंत्री और उनके सहयोगियों को याद रखना चाहिए — झाड़ू लगाकर फुटपाथ साफ किया जा सकता है, लेकिन चूल्हा उठा लेने से भूख खत्म नहीं हो जाती। और सवाल पूछने वाले को ‘देशद्रोही’ बना देने से सवाल का जवाब नहीं मिल जाता।

देशभक्ति की असली परीक्षा राष्ट्रीय ध्वज के नीचे खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाना नहीं है; झंडे की छाँव में खड़े हाड़-मांस के इंसान को ‘इंसान’ स्वीकार करना है। जिस माँ के हाथ में उबलते हुए दूध का कटोरा है — उसमें भी देश को खोजना है। जिस युवा के हाथ में एक किताब है — उसमें भी देश को पहचानना है।

उनके लिए देश का मतलब केवल एक कपड़ा और कुछ गर्जनाएं हैं। हमारे लिए देश का मतलब जीवित इंसान हैं। उनके लिए देशभक्ति का मतलब आज्ञाकारी नागरिक है। हमारे लिए देशभक्ति का मतलब मुक्ति है।

इतिहास जब एक दिन अपना अंतिम खाता खोलेगा, तो वह यह नहीं पूछेगा — किसकी माइक की आवाज़ कितनी तेज़ थी? वह केवल उस धुएँ भरे चूल्हे और सत्ता के नशे में धुत माइक की तस्वीरों को आमने-सामने रखकर न्याय करेगा।

इतिहास बहुत निर्दयी संपादक है — वह गंडेरीराम बाटपारिया जैसे लोगों द्वारा बनाए गए मंत्रियों के खोखले भाषणों को काटकर कचरे के डिब्बे में फेंक देता है, और धूल से सने इंसानों के चेहरों को अनंत काल के लिए अमर कर देता है।

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{लेखक सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य, पूर्व सांसद हैं}

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दूध का कटोरा, फहराता झंडा और 'देशप्रेम प्राइवेट लिमिटेड' - शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 24 अगस्त 2026 • 6 मिनट पठन

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