राजनीति को कॉर्पोरेट में बदल रही है बीजेपी। इसलिए इस फासीवादी ताकत का प्रतिरोध करना ही होगा। हालाँकि, राज्य-दर-राज्य राजनीति में भिन्नता है क्योंकि भारत एक विविधतापूर्ण देश है। उसी तरह अलग-अलग रणनीति सोचनी होगी। दूसरों से भी बातचीत करनी होगी, क्योंकि यह हमला अब सर्वव्यापी है। अन्य वामपंथी व लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ मिलकर संयुक्त आंदोलन खड़ा करना होगा। कांग्रेस क्या कर रही है, यह भी देखना होगा। 'इंडिया' मंच पर हम सब साथ हैं। हालाँकि, सबसे पहले हमें अपनी पार्टी का स्वतंत्र विकास करना होगा। विभिन्न प्रकार के संगठन, व्यक्तिगत रूप से कई उदारवादी सोच वाले लोग इस लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जता रहे हैं। इस लड़ाई में बस्तीवासियों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं—सभी को साथ लेकर बीजेपी को अलग-थलग करना ही मुख्य लक्ष्य है
"जनता को साथ लेकर फासीवादी ताकतों को हराना ही अब मुख्य कर्तव्य" - एम ए बेबी

कल्याणी , 30 अगस्त।
भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति को नष्ट करने के लिए संघ परिवार आरएसएस कटिबद्ध है। राज्य सत्ता पर कब्ज़ा करने से बहुत पहले से ही संघ परिवार यह काम करता आ रहा है। वे मानते हैं कि सिर्फ़ राजनीतिक सत्ता या राज्य सत्ता हथियाने से स्थायी बदलाव नहीं लाया जा सकता। स्थायी बदलाव के लिए लोगों के मन, विचार और संस्कृति पर नियंत्रण पाना या प्रभाव बढ़ाना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। इसलिए ऐसी ताकतों का सामना करने के लिए वामपंथियों को जनता के साथ अपना संपर्क और गहरा करना होगा। सभी स्तरों के लोगों के साथ किस तरह संपर्क साधा जाए, उसी के अनुरूप खुद को संगठित करना ज़रूरी है। लोगों के वैचारिक जगत में प्रवेश करना होगा। फलस्वरूप, अब हमारा मुख्य कर्तव्य बीजेपी-आरएसएस जैसी फासीवादी ताकतों को हराना है।
रविवार को कल्याणी में सीपीआई(एम) पश्चिम बंगाल राज्य समिति के विस्तारित अधिवेशन में में पेश रिपोर्ट के मसौदे पर हुयी प्रतिनिधियों की बहस के आधार पर अपना पर्यवेक्षण रखते हुए पार्टी के महासचिव एम ए बेबी ने कहा।
देश में धर्म के नाम पर जिस तरह विभाजन की राजनीति चलाई जा रही है, उसका उल्लेख करते हुए बेबी ने कहा कि बीजेपी-आरएसएस के राज में न केवल अल्पसंख्यक समुदाय, बल्कि ख़तरा अब सभी पर है। कामकाजी लोगों की लड़ाई और आंदोलन भी आज चुनौतियों के दौर से गुज़र रहे हैं। विभाजन की राजनीति के ज़रिए कामकाजी लोगों की एकता को तोड़ने की निरंतर कोशिशें की जा रही हैं। ख़तरा अब देश के आम धर्मपरायण लोगों पर भी है।
इस संदर्भ में उन्होंने पश्चिम बंगाल के आगामी शारदोत्सव (दुर्गापूजा) को लेकर संघ परिवार की धमकियों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि हमारे देश के धर्म के साथ उत्सव अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। इस राज्य की तरह पूरे देश में आम लोग इसी तरह उत्सव मनाते हैं। लेकिन अब बीजेपी-आरएसएस ऐसे धार्मिक उत्सवों में राजनीति का प्रवेश कराना चाहती है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा कैसे होगी, क्या यह विश्व हिंदू परिषद तय करेगी?
प्रतिनिधियों ने अपनी चर्चा में इस बात पर प्रकाश डाला कि राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद किस तरह हमले हो रहे हैं। वामपंथियों पर सीधे हमलों के साथ-साथ धार्मिक उकसावे की घटनाएँ किस प्रकार घट रही हैं, इसका भी चर्चा में उल्लेख किया गया। इस संदर्भ में बेबी ने कहा, इन सबका मुकाबला कैसे किया जाए, यह तय करना होगा। ऐसे भी विविधतापूर्ण संस्कृति वाले हमारे देश में राज्य-दर-राज्य भिन्नताएँ हैं। धार्मिक उत्सव मनाने में भी यह अंतर देखा जा सकता है। इसलिए हमें राज्य-स्तरीय सोच अपनानी होगी। उकसावे का सामना करते हुए लोग अपने तरीके से धार्मिक उत्सव कैसे मना सकते हैं, इसे भी हमें अपनी चर्चा में लाना होगा।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के शासन के अंत के बाद बीजेपी का राज कायम होने के संदर्भ में बेबी ने कहा, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी-आरएसएस किस तरह की ताकत है, इस गहराई को समझने में पार्टी कार्यकर्ताओं के एक हिस्से से चूक हुई थी। असल में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का भ्रष्टाचार, अत्याचार देखा था। वे सर्वग्राही हमले के शिकार हुए थे। अभी भी उन पर हमले हो रहे हैं, लेकिन इसका स्वरूप अलग है। जहाँ बीजेपी कभी नहीं थी, वहाँ भी वह पैर पसार रही है। पूर्वी भारत में उसका विस्तार हो रहा है। ओडिशा के बाद पश्चिम बंगाल में वह सत्ता में आई है। बिहार में दूसरों के साथ गठबंधन सरकार चलाने के बाद इस बार सीधे बीजेपी का मुख्यमंत्री बना है। यहाँ तक कि दक्षिण भारत के केरल में भी इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने तीन सीटें हासिल की हैं। यह एक बड़ा ख़तरा है। विशेष अधिवेशन में कई प्रतिनिधियों ने इस पर चर्चा की है। हम भी राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर इस पर चर्चा कर रहे हैं।
हम इस समय कैसे आगे बढ़ें, प्रतिनिधियों की चर्चा के आधार पर बेबी ने कहा, राजनीति को कॉर्पोरेट में बदल रही है बीजेपी। इसलिए इस फासीवादी ताकत का प्रतिरोध करना ही होगा। हालाँकि, राज्य-दर-राज्य राजनीति में भिन्नता है क्योंकि भारत एक विविधतापूर्ण देश है। उसी तरह अलग-अलग रणनीति सोचनी होगी। दूसरों से भी बातचीत करनी होगी, क्योंकि यह हमला अब सर्वव्यापी है। अन्य वामपंथी व लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ मिलकर संयुक्त आंदोलन खड़ा करना होगा। कांग्रेस क्या कर रही है, यह भी देखना होगा। 'इंडिया' मंच पर हम सब साथ हैं। हालाँकि, सबसे पहले हमें अपनी पार्टी का स्वतंत्र विकास करना होगा। विभिन्न प्रकार के संगठन, व्यक्तिगत रूप से कई उदारवादी सोच वाले लोग इस लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जता रहे हैं। इस लड़ाई में बस्तीवासियों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं—सभी को साथ लेकर बीजेपी को अलग-थलग करना ही मुख्य लक्ष्य है।
चर्चा में कई लोगों ने इस बात पर अफ़सोस जताया कि हमारे नारे और कार्यक्रम उस तरह से लोगों को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। लोग उत्साहित नहीं हो रहे हैं। बेबी ने इस संदर्भ में दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन का ज़िक्र करते हुए कहा कि उस आंदोलन ने केंद्र सरकार को हिलाकर रख दिया था। उस आंदोलन में बड़ी संख्या में वामपंथी छात्र-युवा शामिल थे। इसके साथ ही दिल्ली में हमारी महिला समिति की पहल पर संसद में महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर दिए गए लंबे धरने का भी उन्होंने उल्लेख किया।
एम ए बेबी ने कहा, छात्र 'स्कूल बचाओ' का नारा लेकर लड़ाई लड़ सकते हैं। देश के सरकारी स्कूलों में न्यूनतम सुविधाओं का अभाव है। कई स्कूलों में शिक्षक तक नहीं हैं। शौचालय नहीं हैं। इसके अलावा खस्ताहाल सड़कों, पुलों की हालत या स्थानीय समस्याओं को लेकर भी आप आंदोलन कर सकते हैं। इन सब लड़ाइयों से स्थानीय लोग उत्साहित होते हैं। हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि अब कई लोग हमारे साथ आ रहे हैं।
बेबी ने कहा, एक प्रतिनिधि ने सवाल किया कि क्या हम इस उग्र हिंदुत्व के मुकाबले कोई विकल्प पेश कर सकते हैं? मेरा जवाब है कि भारतीयता, भारत के अनुकूल समाजवाद की बात करना ही सबसे बड़ा विकल्प है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सिर्फ़ दस्तावेज़ तैयार करने से काम नहीं चलेगा, उसे ज़मीन पर उतारना होगा। वरना हम किसी के भी सामने स्वीकार्य नहीं हो सकेंगे।
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