"विदेश में बहुलतावाद की दुहाई और देश में नफरत की वही पुरानी सच्चाई!"सदा हिन्दू राष्ट्र और अखंड भारत के गीत गानेवाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'विविधता में एकता' और बहुलतावाद का गीत गाया , लेकिन यह उनके वैचारिक बदलाव के बजाय अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय विरोध से बचने का एक पैंतरा मात्र दिखता है। एक तरफ वे प्रवासियों को अमेरिका के प्रति वफादार रहने और भारत में सभी समुदायों के साथ रहने की सीख दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर संघ परिवार का आचरण स्पष्ट रूप से बिल्कुल इसके उलट है। अहमदाबाद में ऐनी फ्रैंक और मलाला की किताबें पढ़ने के 'अपराध' में 'बजरंगियों' द्वारा बेरहमी से छात्रों की पिटाई, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भाजपा नेताओं के घनघोर सांप्रदायिक बयान , आईटी सेल के लगातार जहरीले नफरती अभियान और दलित नेताओं की सभा के बाद स्थल के 'शुद्धिकरण' जैसी घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित भारतीय सिद्धांतों की शरण लेना और विरोध प्रदर्शनों के सामने समर्थकों का तीखा आक्रामक रवैया यह साबित करता है कि संघ का यह 'बहुलतावाद' सिर्फ एक मुखौटा है।
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न्यूयॉर्क में लगातार विरोध प्रदर्शनों का असर?
अमेरिका में 'बहुलतावादी' बने भागवत
बोले - 'विविधता में एकता ही भारत का मूलमंत्र'
क्या यह वैचारिक बदलाव है या दबाव का असर?
हकीकत: संघ प्रमुख के दोहरे मापदंड-
विदेशी जमीन पर बहुलतावाद का ढोंग और देश में विभाजन की नीति
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न्यूयॉर्क, 30 अगस्त:
भारत के प्रति कर्तव्य निभाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन अमेरिका के प्रति वफादार रहना ही होगा! शनिवार को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में प्रवासी भारतीयों के लिए 'कर्मभूमि' के आचार-संहिता तय करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने यह बात कही। उन्होंने कहा, "कर्मभूमि अमेरिका के प्रति हमें वफादार रहना ही होगा। यदि आप जन्मभूमि भारत के लिए कुछ करना चाहते हैं तो कर सकते हैं—लेकिन यह किसी भी तरह से अनिवार्य नहीं है।"
खुद को 'राष्ट्रवादी' साबित करने में हमेशा तत्पर रहने वाले इस संगठन के प्रमुख की ऐसी टिप्पणी कई लोगों को हैरान कर सकती है। हालांकि, संघ प्रमुख की ओर से इस तरह का निर्देश कोई नया नहीं है। आठ दशक पहले आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने भी लगभग इसी सुर में कहा था, "हिंदुओं को अंग्रेजों के खिलाफ लड़कर अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करनी चाहिए, बल्कि मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट जैसे आंतरिक दुश्मनों से निपटना चाहिए।" यह स्पष्ट है कि भागवत उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, गोलवलकर के इस निर्देश के दूसरे हिस्से—यानी 'आंतरिक दुश्मनों' वाली टिप्पणी का 'बोझ'—आरएसएस को विदेशी धरती पर आज भी उठाना पड़ रहा है, और भागवत के भाषण का बाकी हिस्सा इसी का प्रमाण है।
न्यूयॉर्क में लगभग छह हजार दर्शकों के सामने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दावा करते हुए कहा-
विविधता में एकता ही भारत का मूलमंत्र है! यह विशेषता भारत के 'डीएनए' में है। मैं एक ऐसे देश से आता हूँ जिसके डीएनए में विविधता में एकता है। हम विविधता का जश्न मनाते हैं। विविधता का सम्मान और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए, और साथ ही हमारे भीतर एकता की भावना बनी रहनी चाहिए। विविधता प्रकृति का नियम है और एकता प्रकृति का मौलिक सत्य है।"
जो संगठन भारत में 'हिंदू राष्ट्र' के निर्माण को अपना वैचारिक लक्ष्य मानता है, उसके प्रमुख के मुंह से बहुलतावाद का जयघोष एक विरोधाभास जैसा लगता है। जमीनी हकीकत में आरएसएस या संघ परिवार की गतिविधियों से इसका कोई मेल नहीं दिखता:
भागवत के इस भाषण से कुछ घंटे पहले ही गुजरात के अहमदाबाद में आरएसएस की शाखा विश्व हिंदू परिषद के छात्र संगठन बजरंग दल के उपद्रवियों ने छात्र-छात्राओं के एक समूह को ऐनी फ्रैंक और मलाला की किताबें पढ़ने के 'अपराध' में बेरहमी से पीटा। कई लोगों ने सवाल उठाया है कि क्या भागवत द्वारा वर्णित बहुलतावाद की यही असली तस्वीर है? भागवत द्वारा बहुलतावाद को भारत का डीएनए बताए जाने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए रविवार को सांसद व वकील कपिल सिब्बल ने कहा, "यह समझना मुश्किल था कि मोहन भागवत बोल रहे थे या राहुल गांधी।" सोशल मीडिया पर कई लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिकी सरजमीं पर भागवत ने जो बातें कही हैं, यदि भारत में रहकर कोई ऐसी बातें कहता तो उसे अब तक 'दिमागी नक्सल' करार दे दिया गया होता। देश के अलग-अलग हिस्सों में उसके खिलाफ एक के बाद एक मुकदमे दर्ज हो जाते और बीजेपी-आरएसएस का कोई न कोई नेता उसके सिर पर इनाम तक घोषित कर चुका होता!
गोलवलकर के उस 'आंतरिक दुश्मन' वाले संदर्भ पर भी भागवत के यू-टर्न से कई लोग अचंभित हैं। भारत में मुसलमानों के महत्व पर संघ प्रमुख ने कहा -
"अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में किसी मुस्लिम को नहीं रहना चाहिए, तो वह और चाहे जो हो, हिंदू नहीं है। अगर आप खुद को हिंदू कहना चाहते हैं, तो आपको 'जितने मत उतने पथ' के मंत्र में विश्वास करना ही होगा।"
भागवत की इस टिप्पणी पर आलोचकों ने विनय कटियार और गिरिराज सिंह जैसे बीजेपी के शीर्ष नेताओं के बयानों की याद दिलाई है। 2018 में कटियार ने कहा था, "मुसलमानों को इस देश में रहना ही नहीं चाहिए, उन्होंने जनसंख्या के आधार पर पाकिस्तान बनाया है।" 2020 में गिरिराज सिंह ने कहा था, "सभी मुसलमानों को एक ही बार में पाकिस्तान न भेजना हमारे पूर्वजों की एक बड़ी गलती थी।" यह तो बड़े नेताओं की बात हुई, बीजेपी आईटी सेल के कार्यकर्ता तो दिन-रात सोशल मीडिया पर हजारों मुस्लिम नागरिकों को देश छोड़ने के ताने देते रहते हैं! दूसरी ओर, देश का दलित समाज संघ परिवार के हाथों लगातार उत्पीड़न और अत्याचार का शिकार हो रहा है। 'दलित' पहचान के कारण उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की एक सभा के बाद स्थानीय हिंदूवादी संगठन द्वारा उस स्थान का 'शुद्धिकरण' किया गया।

रविवार को केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो सदस्य पिनराई विजयन ने इस घटना का जिक्र करते हुए कहा -
"न्यूयॉर्क में मोहन भागवत ने एकता, मानवता और समान दर्जे पर बहुत कुछ कहा। वहीं दूसरी तरफ देश में मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी सभा के बाद, उनकी दलित पहचान के कारण उस स्थान का शुद्धिकरण किया जा रहा है। दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें लगातार आ रही हैं। शनिवार को ही उत्तर प्रदेश में एक दलित व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत हो गई।"
इससे पहले 2018 में भागवत ने शिकागो में 'विश्व हिंदू कांग्रेस' में भाग लिया था। हालांकि, शनिवार को न्यूयॉर्क में दिए गए भाषण का शिकागो के भाषण से कोई मेल नहीं है। उस भाषण में हिंदुओं को एकजुट होने का आह्वान करते हुए भागवत ने कहा था, "अगर शेर अकेला हो तो जंगली कुत्तों का झुंड उस पर हमला करके उसे हरा सकता है।" इसमें कोई संदेह नहीं है कि यहाँ अन्य धर्मों के लोगों को 'जंगली कुत्ता' कहकर संबोधित किया गया था।
सवाल उठ रहा है कि अचानक भागवत के इन सुरों के बदलने की वजह क्या है?
उनके न्यूयॉर्क दौरे से पहले अमेरिका के कई मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता संगठनों ने भागवत का वीजा रद्द करने और आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा नियुक्त संस्था 'कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम' ने भी इस सप्ताह भागवत को अमेरिका में प्रवेश न देने की मांग उठाई थी। पिछले कुछ दिनों से भागवत की यात्रा के खिलाफ न्यूयॉर्क में कड़ा विरोध प्रदर्शन हो रहा है। न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने भी आरएसएस के इस कार्यक्रम के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाया है। विश्लेषकों के एक वर्ग का कहना है कि यह विचारधारा में बदलाव नहीं है; अंतरराष्ट्रीय छवि बचाने और विदेशी दौरों के दौरान अमेरिकी प्रशासन के प्रतिबंधों से बचने के लिए ही भागवत को मजबूरी में 'बहुलतावादी' का नकाब पहनना पड़ रहा है। अपनी छवि बचाने के लिए भागवत को गांधी-नेहरू के 'विविधता में एकता' के सिद्धांत पर लौटना पड़ा है। स्वतंत्र भारत के राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में गांधी और नेहरू ने जिस धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी और समावेशी भारत की अवधारणा को विश्व-मंच पर रखा था, अमेरिकी वीजा प्रतिबंध से बचने के लिए आरएसएस प्रमुख को उसी का सहारा लेना पड़ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गांधी-नेहरू द्वारा चित्रित भारत की प्रसिद्ध और सम्मानित छवि की शरण में ही आरएसएस को जाना पड़ रहा है।
हालांकि, मंच के बाहर का नजारा बिल्कुल अलग था। भागवत के दौरे के खिलाफ कई भारतीय-अमेरिकी नागरिकों और मानवाधिकार संगठनों ने मैडिसन स्क्वायर गार्डन के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। 'हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स', 'इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल' समेत विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं ने इस विरोध रैली में हिस्सा लिया।
.... और उस विरोध का सामना करते हुए कार्यक्रम स्थल पर मौजूद भागवत के समर्थकों के एक वर्ग का आचरण भी काफी अहम था। प्रत्यक्षदर्शियों के बड़े हिस्से के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के प्रति उनका आक्रामक रुख, तीखी बहस और विरोध को दबाने का प्रयास किसी भी तरह से बहुलतावाद या मत भिन्नता के प्रति सम्मान का संकेत नहीं देता।
साभार
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