आज़ादी के बाद के बदलते भारत में आधुनिक नागरिक बोध का सिनेमाई निर्माण।
महान अभिनेता उत्तम कुमार का जीवन भवानीपुर की गलियों और जन-आंदोलनों के अनुभवों से गढ़कर तैयार हुआ था। शुरुआती असफलताओं और भाषाई कमियों को अपनी कड़ी मेहनत से मात देकर उन्होंने बांग्ला सिनेमा में एक नए युग की शुरुआत की। वे केवल एक रोमांटिक स्टार नहीं थे, बल्कि उन्होंने बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच आम नागरिक के अकेलेपन, संघर्षों और विविध चरित्रों को पर्दे पर जीवंत किया। सुचित्रा सेन के साथ उनकी केमिस्ट्री और हेमंत कुमार की जादुई आवाज़ के साथ उनका तालमेल आज भी स्वतंत्रता के बाद के भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक अटूट हिस्सा बना हुआ है।
[वर्ष 2026 भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अत्यंत विशेष पड़ाव है। यह बांग्ला सिनेमा के अमर 'महानायक' उत्तम कुमार का जन्मशती वर्ष (3 सितंबर 1926 – 24 जुलाई 1980) है। इस अवसर पर उन्हें याद करना केवल एक अभिनेता को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि सिनेमा के उस स्वर्णिम काल का उत्सव मनाना है जहाँ अभिनय में सादगी, तरन्नुम और औदात्य हुआ करता था। कोलकाता की भवानीपुर की गलियों में 'अरुण कुमार चट्टोपाध्याय' के रूप में जन्मे इस कलाकार ने न केवल सिनेमाई पर्दे पर राज किया, बल्कि बंगाली मानस और भारतीय अभिनय परंपरा पर एक अमिट छाप छोड़ी। महानायक उत्तम कुमार अपनी अभिनीत कालजयी फिल्मों के जरिए हर पीढ़ी के दिल में हमेशा जीवंत रहेंगे। उत्तम कुमार को याद करते हुए प्रस्तुत है प्रमुख विचारक , जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो. 'मैनाक विश्वास' का आलेख ]
स्वतंत्रता के बाद नागरिक पहचान का निर्माण
'स्टार'की महिमा
- मैनाक विश्वास
गलियों के अनुभव से पर्दे का जादू: उत्तम कुमार यानी आम इंसान की अमर पहचान
उत्तम कुमार की आत्मकथा या उन्हें लेकर लिखी गई स्मृतियों को पढ़ें, तो लगता है कि बहुत सी चीज़ों की शुरुआत कोलकाता के भवानीपुर इलाके से हुई थी। गिरिश मुखर्जी स्ट्रीट स्थित उनके घर के आसपास से ही उत्तम कुमार के फ़िल्मी जीवन के तमाम तत्व आए। कई ऐसे कलाकार मिले, जिन्होंने मिलकर उनके अभिनय और व्यक्तित्व को पूर्ण बनाया। कुछ उदाहरणों से यह तस्वीर और साफ़ हो जाती है-
काबेरी बोस उनके पड़ोस की लड़की 'भुतू' थीं, जिन्हें 'रायकमल' (1955) फ़िल्म में लेने की बात खुद उत्तमकुमार ने कही थी। सुप्रिया चौधरी म्यांमार (बर्मा) से आईं, फ्रॉक पहनने वाली जानी-पहचानी पड़ोस की लड़की थीं। माला सिन्हा उसी इलाके के एक ईसाई परिवार की बेटी थीं, जिनके पिता को उत्तमकुमार और उनके साथी 'अल्बर्ट दा' कहकर पुकारते थे। शर्मिला टैगोर भी उसी भवानीपुर इलाके की लड़की थीं। प्रदीप कुमार भवानीपुर के 'शील दा' थे। मानू सेन (निर्देशक) उस 'घोटी' (पश्चिम बंगाल के मूल निवासी) बहुल इलाके के जाने-पहचाने 'बांगाल' (पूर्वी बंगाल/बांग्लादेश से आए व्यक्ति) थे। उत्तमकुमार ने खुद लिखा है कि महान गायक हेमंत मुखर्जी भी 'लगभग' पड़ोस में ही रहते थे- "मैं नाटक करता हूँ, हेमंत बाबू गाना गाते हैं, हम दोनों एक-दूसरे को जानते हैं...।" पड़ोस के साथ इस 'लगभग पड़ोस' को जोड़कर देखें, तो समझ आता है कि सिनेमा की पृष्ठभूमि में जान-पहचान का एक बड़ा दायरा था— आम और जाने-पहचाने चेहरों का एक आत्मीय समुदाय। इसी माहौल में उत्तम कुमार ने संगीत सीखा, थिएटर किया, अखाड़े में कसरत की और फ़िल्मों में आने के सपने देखे।
संघर्ष, आंदोलन और जन-जागृति का दौर
चालीस का दशक बेहद अशांत था, और इसी दौर में उत्तम अपनी युवावस्था में पहुँचे। उनके भाई तरुण कुमार के संस्मरण बताते हैं कि अकाल और दंगों का सामना उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से किया था। मिलकर लंगर का आयोजन करना और देशभक्ति के गीत गाते हुए जुलूस निकालना— ये काम तो दोनों भाइयों ने किए ही, साथ ही वे शहर की सड़कों पर उभरी जन-जागृति के प्रत्यक्ष साक्षी भी बने। 12 फ़रवरी 1946 को उत्तम और तरुण 'मेट्रो सिनेमा' में फ़िल्म देखकर बाहर निकले। मध्य कोलकाता में उस दिन कैप्टन रशीद अली के मुकदमे के खिलाफ़ जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था। तरुण कुमार लिखते हैं कि मेट्रो के सामने वाले कोने पर खड़े होकर उन्होंने देखा कि उनके पड़ोस के 'नक्खू दा' को गोली लगी अवस्था में ले जाया जा रहा है। उसी दिन उस युवक की मृत्यु हो गई, जिसे इतिहास 'शहीद रामेश्वर' के नाम से याद रखता है।
सादगी से साधना तक: कमियों को हराकर बांग्ला सिनेमा पर दशकों तक राज
इसके एक साल बाद, 1947 में उत्तम फ़िल्मों में आए, हालाँकि वह फ़िल्म कभी रिलीज़ नहीं हो सकी। इसके बाद लगातार सात फ़िल्मों की असफलता झेलने के बाद 1952 में 'बसु परिवार' से उन्हें पहली सफलता मिली। उस फ़िल्म की पटकथा निर्देशक निर्मल दे ने भवानीपुर के ही एक मेस-हाउस में बैठकर लिखी थी। सुप्रिया चौधरी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एम.पी. प्रोडक्शंस के बराहनगर स्टूडियो में उस फ़िल्म के लिए उत्तम कुमार दिन-रात रिहर्सल करते थे। उस समय उत्तमकुमार में कई कमियाँ थीं, उच्चारण भी थोड़ा अस्पष्ट और हकलाता हुआ सा था— यह बात अभिनेत्री साबित्री देवी ने भी लिखी है। लेकिन सीखने की उनकी ज़िद देखकर सह-कलाकार हैरान रह जाते थे। 'दियेछि' (दिया है)— इस एक मामूली शब्द को दिन भर बोलने का अभ्यास करते देखकर सुप्रिया जैसी सह-कलाकार उनका मज़ाक भी उड़ाती थीं। लेकिन कुछ ही वर्षों में उत्तमकुमार ने बांग्ला भाषा को इस तरह से बोलना शुरू किया, जो उस दौर के बाकी अभिनेताओं से बिल्कुल अलग था। उनकी वह डायलॉग डिलीवरी आज भी न केवल आधुनिक लगती है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि हम अपनी भाषा बोलना कितना भूलते जा रहे हैं।
अभिनय में निखार और नई भूमिकाएँ
खुद को तराशने का यह सिलसिला लंबा चला, जो उनकी फ़िल्मों को सिलसिलेवार देखने पर साफ़ महसूस होता है। 1954 में 'अग्निपरीक्षा' के ज़रिए उन्हें पहली बड़ी सफलता मिली, स्टार के रूप में पहचान मिली और सुचित्रा सेन के साथ एक यादगार रोमांटिक जोड़ी स्थापित हुई। उस साल उत्तम की 11 फ़िल्में रिलीज़ हुईं और अगले साल 12 । दशक के अंत तक उन्हें केंद्र में रखकर भारतीय सिनेमा का एक नया अध्याय लिखा जाने लगा था। यदि 'अग्निपरीक्षा' के अभिनय की तुलना 1957-58 की 'पृथ्वी आमारे चाय' (दुनिया मुझे चाहती है) या 'इंद्राणी' से करें, तो दिखता है कि उत्तमकुमार नपे-तुले अभिनय, शारीरिक अभिव्यक्तियों और सहजता में कितने आगे बढ़ चुके थे। मानो उन्हें अहसास हो चुका था कि उन्हें केवल एक किरदार नहीं निभाना, बल्कि एक पूरे युग की प्रवृत्ति को गढ़ना है। पचास के दशक के अंत तक वे सिर्फ़ रोमांटिक हीरो तक सीमित नहीं रहे, बल्कि विविधतापूर्ण भूमिकाएँ अपनाने लगे- फिल्म 'अबाक पृथिवी' (1959) में एक जेबकतरे की भूमिका, कुहक (1960) में जात्रा (लोकनाट्य) के नायक के भेष में छिपे हत्यारे का किरदार, 'पिंजर' (1971) और 'जदुवंश' (1974) में जीवन के अंतिम पड़ाव में निभाई गई वरिष्ठ भूमिकाएँ। 'जदुवंश' में एक असफल तेल-साबुन व्यापारी के रूप में उत्तमकुमार ने ढलती उम्र और लाचारी का जो सजीव चित्र पेश किया, वह भारतीय सिनेमा में दुर्लभ है।
नागरिक पहचान और सिनेमा का नया दौर: सिर्फ़ एक प्रेमी नायक नहीं, बदलती सामाजिक चेतना का जीवंत प्रतीक
किसी स्टार का आकर्षण और उसकी महिमा एक जटिल विषय है। लेकिन जब कोई स्टार स्वतंत्रता के बाद हमारी नागरिक पहचान के निर्माण का हिस्सा बन जाता है- जब वह अपनी संवाद शैली, पहनावे, चाल-ढाल और आवाज़ से आम इंसान का नया ढाँचा रचता है- तब उसके निर्माण की प्रक्रिया को समझना ज़रूरी हो जाता है। पचास और साठ के दशक में पर्दे पर इस 'नागरिक व्यक्ति' को खोजने की एक गहरी चाहत थी, क्योंकि सामाजिक जीवन में उसकी स्थापना तब तक अधूरी थी। पर्दे और हक़ीक़त के इसी अंतराल के बीच स्टार की जगह बनती है।
उत्तमकुमार का उदय बांग्ला सिनेमा के बड़े बदलाव का समय था। 1954 में 'न्यू थिएटर्स' की अंतिम प्रस्तुति 'बकुल' ने पुराने स्टूडियो-युग के अंत की घोषणा की। फ़िल्म निर्माण का सांगठनिक ढाँचा बदल रहा था। 1955 में 'पथेर पांचाली' से जहाँ भारतीय सिनेमा का नया दौर शुरू हुआ, वहीं व्यावसायिक सिनेमा में भी बड़ा बदलाव आया। उत्तम कुमार के साथ सुचित्रा, सुप्रिया, साबित्री, अरुंधती, काबेरी और माधवी जैसी अभिनेत्रियों का एक पूरा दौर सामने आया, जिनके बिना उत्तमकुमार की उपस्थिति अधूरी लगती थी।
संगीत में भी रचनात्मक बदलाव आए। फ़िल्म 'चौरंगी' (1968) के गाने 'बड़ो एका लागे, एइ आँधारे' (इस अँधेरे में बहुत अकेलापन लगता है) को याद करें। कहानी की किसी खास ज़रूरत के बिना ही नायक उत्तमकुमार यह गाना गाते हैं। लेकिन इस गाने के बहाने होटल के जगमगाते माहौल को छोड़कर आधे अँधेरे में ढके रोशनी के प्रभाव से दृश्य रचे गए। मुख्य नायक से हटकर उत्तमकुमार के शरीर को रोशनी और अँधेरे के टुकड़ों में पिरोया गया। यहाँ अकेले होने का कारण बताना ज़रूरी नहीं था; क्षितिज को पीछे छोड़कर एक नागरिक के अकेलेपन की बात करना ही उस दौर के रोमांस की नई पहचान थी। बड़े परिवार या समुदाय से बाहर जाकर दो अकेले इंसानों का अपने प्यार के लिए एकांत तलाशना— यही इस रोमांस की शर्त थी। 'इंद्राणी' फ़िल्म का गाना 'नीड़ छोटा क्षति नेइ, आकाश तो बड़ो' (घोंसला छोटा है तो क्या, आसमान तो बड़ा है) इसी सोच को बयाँ करता है।
हेमंत दा का 'विशुद्ध स्वर' और उत्तमकुमार का अंदाज़— बंगाली मानस की अमर धड़कन।
लोग चालीस के दशक के फ़िल्मी गाने भले कम सुनें, लेकिन पचास-साठ के दशक के इन गानों को आज भी क्यों बार-बार सुनना चाहते हैं? अगर ये गाने अपने दौर की आकांक्षाओं और जन-भावनाओं को आवाज़ न देते, तो इतने लंबे समय तक प्रासंगिक न रहते। श्यामल मित्र या मन्ना डे के गाए कई बेहतरीन गाने उत्तम कुमार के अंदाज़ में रच-बस गए थे, लेकिन 'शापमोचन' (1955) के बाद से हेमंत मुखर्जी की आवाज़ उत्तम कुमार के साथ ऐसी घुली-मिली कि दशकों तक दर्शकों के दिलों पर छाई रही। दोनों की आवाज़ें इस कदर एक हो चुकी थीं कि हेमंत मुखर्जी कभी-कभी उत्तमकुमार के भावों को ध्यान में रखकर गाते थे। यह आवाज़ उस दौर की नागरिक पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई थी। जैसा कि दार्शनिक कहते हैं- शब्दों के उच्चारण से परे भी एक 'विशुद्ध स्वर' (Pure Voice) बचा रह जाता है, जो मन की गहराइयों में बहुत दूर तक उतर जाता है और हमेशा के लिए वहीं रच-बस जाता है।


प्रो. मैनाक विश्वास
प्रमुख विचारक जाधवपुर विश्वविद्यालय (कोलकाता)
(आलेख बांग्ला से अनूदित, स्रोत: आनंद बाजार पत्रिका, साभार)
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