मानव सभ्यता ने
जब से
मनुष्य को नौकर
बनाने की शुरुआत की
तब से
जब तक सभ्यता
मर नहीं जाती
तब तक
यह औरत
इसी तरह
सभ्य लोगों की
गंदगी ढोती रहेगी
जन समाचार मंच
मानव सभ्यता ने
जब से
मनुष्य को नौकर
बनाने की शुरुआत की
तब से
जब तक सभ्यता
मर नहीं जाती
तब तक
यह औरत
इसी तरह
सभ्य लोगों की
गंदगी ढोती रहेगी

मुंह अंधेरे निकलती है
कुछ घरों में
झाड़ू पोंछा
कहीं बरतन
कहीं शौचालय
इतनी ख़ूबसूरती से
साफ़ करती है
कि एकदम
नया कोरा लगे
फिर नहा धोकर
दूसरे घरों में
रोटी चौका बरतन
जो मिला खाकर
घर लौटती है
और वही सब कुछ
यहां भी
आधी रात बीते
थककर
ढह जाती है
या बिछ जाती है
ज़मीन पर पड़ी
चटाई पर
इसकी अपनी ज़िंदगी में
कोई छुट्टी नहीं
कोई पर्व त्यौहार नहीं
व्रत उपवास नहीं
देवी देवता ईश्वर नहीं
रोज़ा नमाज़ आरती नहीं
न कभी मुंह से ही
निकला किसी
परमात्मा का नाम
मानव सभ्यता ने
जब से
मनुष्य को नौकर
बनाने की शुरुआत की
तब से
जब तक सभ्यता
मर नहीं जाती
तब तक
यह औरत
इसी तरह
सभ्य लोगों की
गंदगी ढोती रहेगी
उनकी सुविधाओं के लिए
अगरबत्ती की तरह
जलती रहेगी
और राख बनकर
बिखरती रहेगी
यहां तक तो
ज़िंदगी थी
कविता
अब शुरू होती है
बिना धर्म
बिना ईश्वर
बिना नर्क के डर
और स्वर्ग के लोभ के
जीनेवाली इस महिला के
जीवन की सार्थकता
जीवन का उद्देश्य
जीवन की चरितार्थता
क्या है
जब यह नहीं होगी
तो किस तरह
याद की जाएगी
या नहीं की जाएगी
न साहित्य में
न संस्कृति में
न कला में
कहीं भी तो
इसकी जगह नहीं है
न यह बीमार होती है
न इसे डिप्रेशन होता है
न यह आत्महत्या करती है
न यह युद्ध करती है
न यह बहस करती है
ब्लैकबोर्ड की
कालिख की तरह
वह सिर्फ़ होती है
जिससे उसपर
रंग-बिरंगी
इबारतें
तस्वीरें
ज़िंदा हो सकें
रंग धूसर होते ही
थोड़ी और कालिख
मल दी जाती है
हरामखोर सभ्यता
इसी की राख पर
चमचमाती
दमदमाती
इतराती
इठलाती
नज़र आती है
और शातिर सभ्यता के
ख़ूबसूरत परिधानों पर
आंसू और लहू का
एक छोटा-सा धब्बा
सुई की नोक बराबर
कालिख भी
नज़र नहीं आती
सारे धर्म
और सारे ईश्वर
सारी राजनीति
सारी सभ्यता
सारी संस्कृति
सारा विज्ञान
सारी तकनीक
सब कुछ
कुछ ही लोगों के लिए
बाकी सब
राख और कालिख
सभ्य ब्लैकबोर्ड के लिए!
- हूबनाथ

लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]
अपलोडर: VKA-N9LYCE
क्या यह लेख उपयोगी था?
अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 07 सितंबर 2026 • 2 मिनट पठन

प्रश्न करना /
राजद्रोह /
आंदोलन करना /
देशद्रोह /
हक़ मांगना /
राष्ट्रद्रोह /
बना दिया ।
इन सबके बावजूद /
लोग डर नहीं रहे /
छोटे-छोटे बच्चे /
खिलाफत को /
उतारू हैं ।
16 सितंबर 2026

मंगलवार दोपहर गड़वेता के अमलागोड़ा तिराहे पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने हथौड़े से लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। उससे पहले शनिवार रात शालबनी में हमला हुआ था। शालबनी बाजार के पास सीपीआई(एम) का पुराना कार्यालय 'तुलसी भवन' है। सोमवार आधी रात को सबल और बड़े सीमेंट के खंभों से गेट तोड़कर बीजेपी कार्यकर्ता अंदर घुसे। उन्होंने टीवी, कंप्यूटर, रसोई गैस, पंखे समेत अन्य सामान लूट लिया। इसके बाद तोड़फोड़ करके आग लगा दी।
16 सितंबर 2026

हम तो /
नारी शक्ति के समक्ष /
नतमस्तक हैं ।
हम सभी /
एक स्त्री से ही तो /
जनमे हैं ।
उसी के संरक्षण में /
हमारा स्वर्णिम /
बालपन बीता है ।
12 सितंबर 2026

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने स्पष्टत: कहा कि राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का उद्घाटन किया, आज के विश्वजनीन सहयोग के जमाने की मानवता में हमारी दीक्षा उन्होंने ही सम्पन्न किया।
श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

भक्ति-आन्दोलन का जनसाधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आन्दोलन का नहीं। पहली बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किये, अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किये। कबीर, रैदास, नाभा सिपी, सेना नाई, आदि-आदि महापुरुषों ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलन्द की। समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यम्भावी था , वह हुआ।
अपराजिता • 30 जुलाई 2026

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
राजीव कुमार पाण्डेय • 29 अगस्त 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...