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ब्लैकबोर्ड :हूबनाथ

राजीव कुमार पाण्डेय•07 सितंबर 20262 मिनट पठन13 बार पढ़ा गया

मानव सभ्यता ने

जब से

मनुष्य को नौकर 

बनाने की शुरुआत की

तब से

जब तक सभ्यता 

मर नहीं जाती

तब तक

यह औरत 

इसी तरह

सभ्य लोगों की

गंदगी ढोती रहेगी

ब्लैकबोर्ड :हूबनाथ

मुंह अंधेरे निकलती है

कुछ घरों में

झाड़ू पोंछा

कहीं बरतन

कहीं शौचालय 

इतनी ख़ूबसूरती से

साफ़ करती है

कि एकदम 

नया कोरा लगे

फिर नहा धोकर 

दूसरे घरों में

रोटी चौका बरतन 

जो मिला खाकर

घर लौटती है

और वही सब कुछ

यहां भी

आधी रात बीते

थककर 

ढह जाती है

या बिछ जाती है

ज़मीन पर पड़ी

चटाई पर

इसकी अपनी ज़िंदगी में

कोई छुट्टी नहीं 

कोई पर्व त्यौहार नहीं 

व्रत उपवास नहीं 

देवी देवता ईश्वर नहीं 

रोज़ा नमाज़ आरती नहीं 

न कभी मुंह से ही

निकला किसी 

परमात्मा का नाम

मानव सभ्यता ने

जब से

मनुष्य को नौकर 

बनाने की शुरुआत की

तब से

जब तक सभ्यता 

मर नहीं जाती

तब तक

यह औरत 

इसी तरह

सभ्य लोगों की

गंदगी ढोती रहेगी

उनकी सुविधाओं के लिए 

अगरबत्ती की तरह

जलती रहेगी

और राख बनकर

बिखरती रहेगी

यहां तक तो

ज़िंदगी थी

कविता

अब शुरू होती है

बिना धर्म

बिना ईश्वर 

बिना नर्क के डर

और स्वर्ग के लोभ के

जीनेवाली इस महिला के

जीवन की सार्थकता 

जीवन का उद्देश्य 

जीवन की चरितार्थता

क्या है

जब यह नहीं होगी

तो किस तरह 

याद की जाएगी

या नहीं की जाएगी

न साहित्य में

न संस्कृति में

न कला में

कहीं भी तो

इसकी जगह नहीं है

न यह बीमार होती है

न इसे डिप्रेशन होता है

न यह आत्महत्या करती है

न यह युद्ध करती है

न यह बहस करती है

ब्लैकबोर्ड की 

कालिख की तरह 

वह सिर्फ़ होती है

जिससे उसपर

रंग-बिरंगी 

इबारतें

तस्वीरें

ज़िंदा हो सकें

रंग धूसर होते ही

थोड़ी और कालिख

मल दी जाती है

हरामखोर सभ्यता

इसी की राख पर

चमचमाती 

दमदमाती

इतराती

इठलाती

नज़र आती है

और शातिर सभ्यता के

ख़ूबसूरत परिधानों पर

आंसू और लहू का 

एक छोटा-सा धब्बा 

सुई की नोक बराबर

कालिख भी 

नज़र नहीं आती

 सारे धर्म 

और सारे ईश्वर 

सारी राजनीति 

सारी सभ्यता 

सारी संस्कृति 

सारा विज्ञान 

सारी तकनीक 

सब कुछ 

कुछ ही लोगों के लिए 

बाकी सब

राख और कालिख

सभ्य ब्लैकबोर्ड के लिए!

- हूबनाथ

लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]

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ब्लैकबोर्ड :हूबनाथ

अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 07 सितंबर 2026 • 2 मिनट पठन

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