2017 में गौरी लंकेश की हत्या के समय वे स्कूल की छात्रा थी। उनके अनुसार, उसी हत्या ने उन्हें समझाया था कि देश में बढ़ती हिंदुत्ववादी उग्रता के खिलाफ बोलने की कीमत कितनी भयानक हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि गौरी लंकेश 'फासीवादी' और 'उग्रवादी-आतंकवादी' ताकतों के खिलाफ मुखर थीं, इसीलिए उन्हें निशाना बनाया गया था।
'गौरी लंकेश के हत्यारों का दोस्त नहीं हूँ'
मोदी के 'फ्रेंड्स' वाले संदेश पर युवाओं का जवाब
बेंगलुरु,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के युवा पीढ़ी को 'फ्रेंड्स' के रूप में सम्बोधित करने के प्रयास को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की संयुक्त सचिव दानिश अली ने सीधे तौर पर खारिज कर दिया। बेंगलुरु में गौरी लंकेश मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित 'गौरी डे' कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने तंज कसा, "जो लोग गौरी लंकेश जैसे लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, हम उन लोगों के दोस्त नहीं हैं।"

इस वर्ष गौरी लंकेश के स्मरण कार्यक्रम को 'जेन जेड डे' के रूप में मनाया गया। वहां दानिश ने कहा कि वर्तमान बीजेपी सरकार के साथ देश की युवा पीढ़ी का राजनीतिक संघर्ष जारी है। उन्होंने कहा, "हम आपके खिलाफ लड़ाई में हैं। यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हम अपनी जीत वापस हासिल नहीं कर लेते, जब तक इस देश को वास्तव में लोकतांत्रिक नहीं बना देते।"
दानिश ने बताया कि 2017 में गौरी लंकेश की हत्या के समय वे स्कूल की छात्रा थी। उनके अनुसार, उसी हत्या ने उन्हें समझाया था कि देश में बढ़ती हिंदुत्ववादी उग्रता के खिलाफ बोलने की कीमत कितनी भयानक हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि गौरी लंकेश 'फासीवादी' और 'उग्रवादी-आतंकवादी' ताकतों के खिलाफ मुखर थीं, इसीलिए उन्हें निशाना बनाया गया था।
दानिश ने गौरी की हत्या को एक अलग-थलग घटना के रूप में न देखकर, उसी विचारधारा के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्य व्यक्तियों पर हुए हमलों और दमन की घटनाओं से जोड़कर देखने का आह्वान किया। महात्मा गांधी की हत्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे भी उसी वैचारिक धारा से जुड़े व्यक्ति के हाथों मारे गए थे। उन्होंने कहा, "इस समय हमें उसी विचारधारा के खिलाफ लड़ना होगा।"
दानिश ने गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी, जी एन साईबाबा और फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु का मुद्दा भी उठाया। इसके साथ ही छात्र आंदोलन के कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम की लंबी जेल की सजा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवाल पर लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
कार्यक्रम में एसएफआई (SFI) की अखिल भारतीय संयुक्त सचिव आइशी घोष ने कहा कि अन्याय के खिलाफ बोलने के महत्व की जीती-जागती मिसाल गौरी लंकेश हैं। वे न केवल अपने राजनीतिक विश्वासों के बारे में लिखती थीं, बल्कि अपने जीवन में भी उन विश्वासों को जीती थीं। आइशी ने कहा कि अभिव्यक्ति, बहस और असहमति के अधिकार को स्थापित करने में युवाओं के लिए गौरी का जीवन आज भी ऊर्जा का स्रोत है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 2014 के बाद उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले युवाओं, विशेषकर हाशिए पर पड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के मुद्दों पर बोलना लगातार कठिन होता जा रहा है। उनका दावा है कि जो लोग सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के अधिकारों के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं, उन्हीं को निशाना बनाया जा रहा है। साथ ही सत्ताधारियों की पसंद की राजनीतिक लाइन से अलग हटने पर खतरा हो सकता है—यह धारणा युवाओं के मन में पैदा की जा रही है।

आइशी के अनुसार, इसी वजह से कई युवा 'तटस्थता' का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति से दूर रहकर ही सुरक्षित रहा जा सकता है—ऐसी धारणा फैलाई जा रही है। इसके साथ ही वक्ताओं ने देश में बढ़ती घोर सांप्रदायिकता और शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायीकरण व निजीकरण की प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की।
कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सह-संयोजक आशुतोष रांका ने कहा कि अगर गौरी लंकेश जीवित होतीं तो वह एक "गौरवान्वित कॉकरोच" होतीं। सरकारी स्कूलों की बदहाली के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इसके लिए सिर्फ पैसों की कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि इसके पीछे "राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी" है। उन्होंने सवाल किया कि जब कई राजनीतिक नेताओं के अपने खुद के निजी स्कूल हैं, तो वे सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सुधार की चिंता क्यों करेंगे?
रांका ने आगे कहा कि जन-शिक्षा के अधिकार और जवाबदेही की मांग को लेकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता है। उन्होंने वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर कम से कम सरकारी शिक्षा में जवाबदेही और सभी की पहुँच की मांग को आगे लाने का आह्वान किया। संविधान को 'छोटी लाल किताब' के रूप में संदर्भित करते हुए उनके संबोधन के अंत में 'जय संविधान', 'जय भीम' और 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगे।
आइशी घोष ने कहा, "गौरी अपने मन की बात कहने के लिए शहीद हुईं। आज अगर आप हाशिए के लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं या विश्वविद्यालय में राज्य-समर्थित विचारों के खिलाफ सवाल उठाते हैं, तो आपको भी निशाना बनाया जाता है।" उन्होंने आरोप लगाया कि प्रश्नपत्र लीक होने से लेकर मिड-डे मील के आवंटन में कमी तक—विभिन्न घटनाओं से शिक्षा व्यवस्था में ढांचागत विफलता स्पष्ट है। उन्होंने दावा किया कि हालिया छात्र आंदोलन 'तटस्थता' के नाम पर चुप रहने के खिलाफ सीधे विरोध प्रदर्शन हैं।
गौरी की भतीजी ईशा लंकेश ने कहा, "इस साल एक पूरी नई पीढ़ी हमें उम्मीद दे रही है।"
कार्यक्रम में स्थानीय छात्र एवं युवा आंदोलन के प्रतिनिधियों ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्नाटक में सरकारी स्कूलों को बंद करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की प्रवृत्ति बन गई है। उन्होंने दावा किया कि ज़मीनी स्तर पर छात्र-युवा आंदोलनों के लगातार विरोध के कारण ही इस प्रक्रिया को कुछ हद तक रोका जा सका है।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में गौरी की भतीजी ईशा लंकेश ने कहा कि गौरी को खोने के नौ साल बाद भी उनकी मौत केवल परिवार का व्यक्तिगत शोक बनकर नहीं रह गई है। उन्होंने कहा, "हर साल मैं देखती हूँ कि नई पीढ़ी इस कार्यक्रम में शामिल हो रही है। जिस तरह गौरी चाहती थीं, ठीक उसी तरह एक पीढ़ी बड़ी हो रही है।" ईशा ने टिप्पणी की कि जवाबदेही, समानता और न्याय के लिए लड़ रही यह नई पीढ़ी ही उन्हें उम्मीद दे रही है।
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साभार : बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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