सहारनपुर जिले के कचहरी परिसर स्थित एक मस्जिद, जिसे प्रशासन की मिलीभगत से 5 सितंबर 2026 को जमींदोज कर दिया गया, जब अधिकांश सहारनपुरवासी सोकर जागे भी नहीं थे। लोगों ने बताया कि सुबह साढ़े चार से पाँच बजे के बीच स्थानीय प्रशासन ने बिना कोई वैधानिक मौका दिए इसे आखिरकार तय समय-सीमा से 22 दिन पहले ही गिरा दिया।
साम्प्रदायिक नफरत की
भेंट चढ़तीं मस्जिदें
रविशंकर मिश्र

उत्तर प्रदेश एक बार फिर सुर्खियों में है। राजनीतिज्ञों, रद्द बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और यू-ट्यूबरों के बीच यह गम्भीर बहस का मुद्दा बना हुआ है। चर्चा किसी विकास के काम पर, बेतहाशा बढ़ी महंगाई पर, बेरोजगारों की बढ़ती संख्या पर, बढ़ते अपराध पर, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा और दलितों के खिलाफ बढ़ते अपराध को नियंत्रित करने पर नहीं हो रही है, क्योंकि ऐसा कुछ हो ही नहीं रहा है। बल्कि इसके उलट यहाँ हर दिन कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है, जिससे त्राहिमाम की स्थिति बनी हुई है। चर्चा जिस विषय पर हो रही है, वह है सहारनपुर जिले के कचहरी परिसर स्थित एक मस्जिद, जिसे प्रशासन की मिलीभगत से 5 सितंबर 2026 को जमींदोज कर दिया गया, जब अधिकांश सहारनपुरवासी सोकर जागे भी नहीं थे। लोगों ने बताया कि सुबह साढ़े चार से पाँच बजे के बीच स्थानीय प्रशासन ने बिना कोई वैधानिक मौका दिए इसे आखिरकार तय समय-सीमा से 22 दिन पहले ही गिरा दिया।
यह कोई पहली या अंतिम मस्जिद नहीं है, जिसे गिराया गया है। 6 दिसंबर 1992 को जिस तरह अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने की घटना का साजिशन सूत्रपात हुआ था, वह आज तक अनवरत जारी है और नहीं लगता कि निकट भविष्य में इस तरह के कृत्यों पर कोई नियंत्रण लगाया जा सकेगा। ऐसी घटनाएँ सुनियोजित तरीके से घट रही हैं। लोग अब खुलकर कहने लगे हैं कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद प्रशासन की मिलीभगत से गिराई गई है।
मस्जिद किसी पट्टे की भूमि, सरकारी भूमि, नजूल की भूमि आदि पर नहीं बनी थी, बल्कि यह खेवट सं. 10/1 के रिकॉर्ड के अनुसार वाहिद खाँ और याकूब खाँ के नाम पर दर्ज है। मस्जिद तो 1911 के आसपास की बनी है। इसमें लगी ईंट पर 1909 खुदा हुआ है। यह वक्फ बोर्ड में भी रजिस्टर्ड है। 1957 के नगर निगम के अभिलेखों में भी इसका उल्लेख है। कलेक्ट्रेट का पूरा परिसर भी उसी आराजी में स्थित है। याकूब के परपोते फिरोज खान के अनुसार, 1867 में तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट एच. डी. राबर्टशन ने दो रुपये पाँच पैसे प्रति बीघा की दर से 800 रुपये में इसे किराये पर लिया था। उसी भूखंड पर यह मस्जिद और आज का कलेक्ट्रेट भी स्थित है। मस्जिद भी 100 वर्ष से अधिक पुरानी है।
विवाद तब उत्पन्न हुआ, जब देवबंद के बास्तम निवासी बजरंग दल के नेता विकास त्यागी ने तत्कालीन जिलाधिकारी मनीष बंशल को प्रार्थना-पत्र देकर इसे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके निर्मित बताया और ध्वस्तीकरण की मांग की। डी.एम. ने उसे ए.डी.एम. डॉ. अर्चना द्विवेदी के यहाँ ट्रांसफर कर दिया। फरवरी 2025 में तहसीलदार सदर से जाँच कराई गई। बाद में 24 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश लोक संपत्ति अधिनियम 1972 के तहत सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की कोर्ट में मामला पहुँचा। सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को 315 वर्गमीटर भूमि पर बनी उक्त मस्जिद को बेदखली की नोटिस दी तथा नहीं हटाने पर गिराने की सूचना भेजी थी। सरकार द्वारा गिराने पर तथा सरकारी भूमि पर बने होने के कारण छह करोड़ इकतालीस लाख रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया गया है।
मस्जिद पक्ष ने आदेश के खिलाफ जिला जज सहारनपुर की कोर्ट में चुनौती दी है। 24 जुलाई 2026 को मस्जिद को स्थगन आदेश भी मिला, जिसे बाद में मिलीभगत से निरस्त किया गया है। 2 सितंबर 2026 को जिला जज ने अपील को खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश को बरकरार रखा है। अंततः 5 सितंबर को यह ध्वस्त कर दी गई।
ठीक इसी से मिलती-जुलती घटना बाराबंकी (उ. प्र.) के राम सनेही घाट की गरीब नवाज मस्जिद के साथ घटी थी, जिसे 17 मई 2021 को गिराया गया था। वह मस्जिद पुराने गाटा सं. 558 पर बनी थी। बाद में वह नंबर 776-777 हो गया, जिसे चकबंदी के बाद 778 क तथा 778 ख किया गया। अभिलेख में बदलाव करते समय उसमें भूलवश मस्जिद के होने का उल्लेख नहीं था। इसी आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे सार्वजनिक जमीन पर कहकर ध्वस्त कराया था। खुद इलाहाबाद हाई कोर्ट के अंदर की मस्जिद, जिसे 13 मार्च 2023 को सुप्रीम कोर्ट के जजेज एम. आर. शाह और सी. टी. रविकुमार के आदेश पर गिराया गया, उसके बारे में कहा गया कि वह लीज की भूमि पर बनी थी।
ये सारी मस्जिदें प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 के प्रभाव में आने के बाद गिराई गईं। उनका स्वरूप बदला गया। यह सही है कि वहाँ कोई पूजा स्थल नहीं बना, लेकिन रूप तो बदला गया है। इस पर और विचार-मंथन की जरूरत है। वाराणसी की दालमंडी की मस्जिद को गिराने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय कि यहाँ मस्जिद का स्वरूप नहीं बदला, बल्कि इसका सार्वजनिक हित में अधिग्रहण किया गया, अधिक तार्किक नहीं लगता। मंदिर हो अथवा मस्जिद, ये भी सार्वजनिक स्वरूप के ही होते हैं। इन्हें हटाकर दूसरा रूप बदलना आखिर क्या कहलाएगा? इस पर बहस तो होगी। वास्तविकता यह है कि यह सब निर्णय कम नीयत पर निर्भर मामले थे।
सहारनपुर की मस्जिद के मामले में सवाल उठता है कि वाहिद खाँ और याकूब खाँ से किराये पर ली गई जमीन सरकार के कब्जे में जरूर थी, पर सरकार उसकी मालिक कैसे बनी? मालिक बनने का आधार क्या था? यदि कब्जे के आधार पर मालिकाना हक दिया गया, तो अब के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार कब्जेधारी का अधिकार स्वत्वधारी के सामने बौना होता है। नए रूल्स भी यही कहते हैं। फिर इसे टाइटिल केस की तरह क्यों नहीं हल किया गया है? बिना प्रॉपर पेपर्स के कलेक्ट्रेट मालिक का टाइटिल कभी हासिल कर सकता है क्या? अगर बैनामा अथवा वसीयत के आधार पर या दान के आधार पर उस पर कलेक्ट्रेट का निर्माण हुआ है, तो दौरान मुकदमा पेपर्स क्यों नहीं लगाए गए हैं?
मस्जिद को हटाने की समय-सीमा से 22 दिन पहले ही उसे क्यों बुलडोज करना पड़ा? क्या प्रशासन को भय था कि वह इस मामले में कमजोर पक्ष है? गिराने का समय सुबह चार बजे क्यों चुना गया? यह दिन में भी तो गिराई जा सकती थी? वक्फ बोर्ड को पार्टी क्यों नहीं बनाया गया, जबकि मस्जिद वक्फ बोर्ड में भी रजिस्टर्ड है? अपील का समय क्यों नहीं दिया गया? यह ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर मिलना चाहिए।
सामान्यतः हमारे देश में आर्मी कैम्पस के अंदर, पुलिस लाइन्स के भीतर, कचहरियों के अंदर अथवा इस प्रकृति के दूसरे स्थानों पर हिंदू, मुस्लिम, ईसाई अथवा अन्य धर्मावलंबी जहाँ भी एकत्र होते हैं, वहाँ उनकी इबादत अथवा पूजा को ध्यान में रखते हुए ऐसे पूजा स्थलों के निर्माण सरकार की ओर से सुविधा हेतु कराए भी गए हैं। उ. प्र. की विभिन्न कचहरियों में कम से कम मंदिर और मस्जिद दोनों ही मिलेंगे। कई जिलों में आसपास ही चर्च की भी उपस्थिति मिलती है। यह हमारी परिपाटी भी रही है। ये घटनाएँ उस परम्परा को भी ठेंगा दिखाती प्रतीत हो रही हैं, क्यों?
जिस विरोध के भय से यह सब आनन-फानन में किया गया, वह विरोध मस्जिद के गिरने पर आसानी से समाप्त हो जाएगा, यह प्रशासन की भूल है। विरोध को कुचल दिया जाएगा, ऐसी समझ आत्मघाती समझ होती है, जो दीर्घकाल में सरकार को उखाड़ फेंकने का माहौल तैयार करती है। यहाँ मस्जिद के गिरने के बाद विरोध खत्म हो जाएगा, यह सोचना गलत था।
मस्जिद गिराने के बाद हमारी पार्टी माकपा के जिला सचिव स्वयं घटनास्थल पर गए और विरोध के स्वर में अपना स्वर मिलाया। हमारी उत्तर प्रदेश की कई जिला कमेटियों ने मस्जिद गिराने का विरोध किया और निंदा की। विपक्षी दलों की ओर से भी विरोध जारी है। मामले को रफा-दफा करने में लगा प्रशासन नेताओं को उनके घरों पर ही नजरबंद कर रहा है। विरोध को दबाने के लिए असंवैधानिक कार्य हो रहे हैं। ऐसा आखिर कब तक? यह गुबार कभी तो ज्वालामुखी बनकर फूटेगा, जिसमें वे सब दफन हो जाएँगे, जो अभी चैन की वंशी बजा रहे हैं। आज भले प्रशासन चैन की साँसें ले रहा है, किंतु एक न एक दिन यह प्रदूषण दमघोंटू साबित होगा।
नहीं लगता कि प्रशासन और सरकार की ओर से सकारात्मक पहल हो सकेगी। उम्मीद की आखिरी किरण भी ओझल प्रतीत हो रही है। अभी अभी सूचना मिली है कि मुरादाबाद में सहारनपुर रिपीट होने जा रहा है। आज के नवभारत टाइम्स ने मुरादाबाद के हवाले से लिखा है कि मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने मुस्तफा मस्जिद को भी नोटिस के जरीये अल्टीमेटम दिया है कि उक्त मुस्तफा मस्जिद, जो दिल्ली-लखनऊ हाई वे पर बनी है, अतिक्रमण करके बनाई गयी है। नवभारत टाइम्स के अनुसार मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने मस्जिद की प्रबंध समिति को निर्माण को हटाने के लिए 15 दिनों का समय दिया है। स्पष्ट है कि 6,दिसम्बर 1992 को आरम्भ हुआ सिलसिला थमने को नही है।
वोटबैंक की लालच में किस तरह सीमाएं लांघी जा रही हैं? क्या इनके माध्यम से किसी तूफान को हवा देने का काम नहीं किया जा रहा है? क्या यह हमारी व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने के लिए तो नहीं है? क्या यह देश के खिलाफ एक बडी साजिश नहीं है?
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·{लेखक सी पी आई (एम )उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव हैं।}
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