जितेन्द्र रघुवंशी : एक आत्मीय साथी
13 सितंबर : 75 वें जन्मदिन पर स्मरण
नवाब उद्दीन
जितेन्द्र रघुवंशी, जितेन्द्र भाई, भाई साहब, बड़े भैया, कामरेड जितेन्द्र रघुवंशी, यही नाम थे, जिनसे हम आगरा वाले उन्हें पुकारते थे। अगर वे आज हमारे बीच होते तो 13 सितंबर को मैं उनका 75वाँ जन्मदिन मनाते हुए मिठाई खाता, जिस प्रकार उनके 62वें जन्मदिन पर खाई थी। अफसोस, वह मौका दोबारा नहीं आया।
7 मार्च 2015 को जब होली के रंग सूखे भी न थे, यह मनहूस खबर आई, "जितेन्द्र भाई नहीं रहे"। उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल में स्वाइन फ्लू के चलते हम लोगों को सिर्फ 63 साल की आयु में अलविदा कह दिया। जबकि वह सेवानिवृत्ति के बाद अपनी दूसरी पारी खेलने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने सांस्कृतिक मोर्चे और लेखन पर कई योजनाबद्ध काम की तैयारी शुरू की थी।

जितेन्द्र भाई को याद करना मेरे लिए केवल आगरा के एक महत्वपूर्ण रंगकर्मी, इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव, रूसी भाषा के विद्वान और जन सांस्कृतिक आंदोलन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता को याद करना नहीं है। मेरे लिए वे एक आत्मीय साथी थे, जिनसे मेरा संबंध वर्ष 1988 से रहा। इस तरह लगभग तीन दशक की इस साझी यात्रा में मुझे उनके साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कला जत्थों, साक्षरता अभियान, ज्ञान-विज्ञान समिति तथा जन सरोकारों से जुड़ी अनेक गतिविधियों में काम करने का अवसर मिला।
जितेन्द्र भाई का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे रूसी भाषा और साहित्य के विद्वान और शिक्षक थे, रंगकर्मी थे, लेखक थे और इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव रहे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता थे। लेकिन इन तमाम पहचानों के बीच उनकी सबसे बड़ी पहचान थी, एक बेहतर इंसान होना, संस्कृति के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता और लोगों को जोड़ने की अद्भुत क्षमता। यह क्षमता उन्हें अपने माता-पिता राजेन्द्र रघुवंशी और अरुणा रघुवंशी से विरासत में मिली थी।
जितेन्द्र भाई को मैं इप्टा के पुनर्जागरण के नायकों में मानता हूँ। 1980 के दशक के बाद जब देश में सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं और जन सांस्कृतिक आंदोलन को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था, उस समय उन्होंने इप्टा को फिर से सक्रिय और व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

देश के विभिन्न सांस्कृतिक अंचलों में काम कर रहे कलाकारों, रंगकर्मियों और सांस्कृतिक समूहों को जोड़ना उनकी विशेषता थी। अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक परंपराओं को जन संस्कृति की व्यापक धारा से जोड़ते हुए उन्होंने इप्टा को नई दिशा दी। उनकी कोशिश थी कि इप्टा केवल अतीत की गौरवशाली संस्था के रूप में याद न की जाए, बल्कि बदलते समय के सवालों के साथ जनता के बीच सक्रिय रहे और नई पीढ़ी के कलाकारों तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को लगातार अपने साथ जोड़े।
1988 में जब मेरा जितेन्द्र भाई के साथ संपर्क हुआ, तब आगरा में सांस्कृतिक गतिविधियों और सामाजिक अभियानों का एक जीवंत वातावरण था। हमने साथ मिलकर कई गतिविधियों में काम किया। 1990 में आगरा में कला जत्थों की शुरुआत हुई। इन कला जत्थों का मूल उद्देश्य साक्षरता अभियान के लिए वातावरण सृजन करना था।
गीत, नाटक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों के बीच जाकर साक्षरता अभियान के प्रति जागरूकता पैदा करना इसका उद्देश्य था। यह काम केवल कार्यक्रम प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं था। कलाकारों को जनता के बीच जाना होता था और उनकी भाषा, जीवन तथा समस्याओं को समझते हुए शिक्षा के महत्व का संदेश देना होता था। जितेन्द्र भाई इस पूरी प्रक्रिया में बेहद सक्रिय रहते थे।
साक्षरता अभियान के वातावरण सृजन के लिए शुरू हुए ये कला जत्थे धीरे-धीरे जन मुद्दों पर भी सक्रिय होने लगे। लोगों के बीच जाने पर उनके जीवन के सवाल हमारे सामने आते थे। बेरोजगारी, गरीबी, सामाजिक भेदभाव, साम्प्रदायिकता और दूसरे जन सरोकार हमारी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का हिस्सा बनने लगे।
जितेन्द्र भाई संस्कृति को किसी एक अभियान की सीमा में बाँधकर नहीं देखते थे। उनका विश्वास था कि सांस्कृतिक कार्यकर्ता को अपने समय और समाज के सवालों से जुड़ना चाहिए। उनके लिए गीत और नाटक केवल मनोरंजन नहीं थे। वे जनता से संवाद करने और सामाजिक चेतना को मजबूत करने के माध्यम थे।
सफदर हाशमी की हत्या ने देश के जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को गहरे तक झकझोर दिया था। उस घटना के बाद सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के सामने यह सवाल और तीखा हो गया कि जन संस्कृति की भूमिका क्या होनी चाहिए। सफदर हाशमी की शहादत ने हमें यह सोचने के लिए मजबूर किया कि कलाकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता अपने समय के अन्याय और सामाजिक सवालों का कैसे मुकाबला करें। इन परिस्थितियों में जितेन्द्र भाई के साथ काम करने के कई अवसर मिले। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि संस्कृति को जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
यूँ तो हम अपनी और साथियों की निजी समस्याओं को साझा करते और उन्हें हल करने में सहयोग करते थे। मेरी स्मृतियों में एक प्रसंग व्यक्तिगत रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। एक समय मैं स्वयं एक निजी राजनीतिक संकट से गुजर रहा था। परिस्थितियाँ कठिन थीं और आगे का रास्ता स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा था। उस समय जितेन्द्र भाई से लंबी-लंबी बातचीत हुई। उन्होंने मेरी स्थिति को समझा और मुझे आगे का रास्ता दिखाया।
मुश्किल समय में किसी साथी का साथ देना और सही दिशा सुझाना बहुत बड़ी बात होती है। जितेन्द्र भाई ने उस समय यही किया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह केवल राजनीतिक सलाह नहीं थी। वह एक आत्मीय साथी की जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने पूरी संवेदनशीलता के साथ निभाया।
जितेन्द्र भाई ज्ञान-विज्ञान समिति से भी जुड़े रहे। वैज्ञानिक चेतना और तर्कशीलता के प्रसार का यह काम उनके व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के अनुरूप था।
साक्षरता, वैज्ञानिक चेतना और जन संस्कृति उनके लिए अलग-अलग गतिविधियाँ नहीं थीं। इन सबके केंद्र में जन चेतना थी। उनका विश्वास था कि समाज को अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है। इसलिए वे सामाजिक अभियानों को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने में विश्वास करते थे। उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ कई गीत लिखे।
जितेन्द्र भाई से मेरे रिश्ते की आत्मीयता का एक छोटा-सा प्रसंग आज भी मेरे मन में सुरक्षित है। मेरे बेटे के नाम को अंतिम रूप देने का काम उन्होंने और भाभी भावना रघुवंशी ने लंबे विचार-विमर्श के बाद किया। नाम का सुझाव मेरे मित्र नासिर एच. खान ने दिया था। लेकिन उसके आगे-पीछे क्या हो, यह चर्चा का विषय था और अंततः जितेन्द्र भाई और भाभी भावना की सहमति से उस नाम को अंतिम रूप दिया गया।
यह एक छोटी-सी घटना है, लेकिन मेरे लिए इसका भावनात्मक महत्व बहुत बड़ा है। इससे पता चलता है कि जितेन्द्र भाई से मेरा संबंध केवल राजनीतिक या सांस्कृतिक गतिविधियों में साथ रहने तक सीमित नहीं था। वे हमारे निजी जीवन में भी एक आत्मीय मित्र थे।
मैं जब लखनऊ आ गया तो वे जब भी लखनऊ आते, मेरे पास रुकते या बिना मिले वापस नहीं जाते। यही उनकी खूबी थी। वे लोगों से केवल संगठनात्मक रिश्ता नहीं बनाते थे, बल्कि आत्मीय रिश्ते बनाते थे।
जितेन्द्र भाई रूसी भाषा और साहित्य के गंभीर अध्येता थे। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन किया। लेकिन उनकी विद्वता उन्हें आम लोगों से दूर नहीं करती थी। इसके विपरीत, उनका ज्ञान उनकी जनपक्षधरता को और मजबूत करता था। वे एक साथ विद्वान, शिक्षक, रंगकर्मी, लेखक और संगठनकर्ता थे।
देश के विभिन्न सांस्कृतिक अंचलों को एक साझा जन सांस्कृतिक आंदोलन से जोड़ना आसान काम नहीं था। जितेन्द्र भाई ने इसे अपने जीवन के महत्वपूर्ण उद्देश्यों में शामिल किया और इसके लिए लगातार काम किया।
जितेन्द्र भाई को हमसे बिछड़े ग्यारह वर्ष से अधिक हो गए हैं, लेकिन मेरे लिए वे अतीत का कोई धुंधला नाम नहीं हैं। उनकी स्मृति आज भी उतनी ही जीवित है, जैसे वे कल ही हमारे बीच हों।
किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी विरासत केवल उसके लिखे हुए शब्द या उसके द्वारा निभाए गए पद नहीं होते। उसकी असली विरासत उन लोगों में होती है, जिनके जीवन को उसने प्रभावित किया और जिन्हें उसने आगे बढ़ने का हौसला दिया।
जितेन्द्र भाई ने बहुत से लोगों को जोड़ा, बहुत से कलाकारों को आगे बढ़ाया और यह विश्वास मजबूत किया कि संस्कृति समाज को बदलने की ताकत रखती है।
उनकी 75 वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए मेरे लिए यह श्रद्धांजलि किसी औपचारिक स्मरण से अधिक है। यह उस साथी को याद करना है, जिसके साथ लगभग तीन दशक का आत्मीय रिश्ता आज भी मेरे मन में जीवित है।
वे मेरे लिए केवल इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव, विद्वान रंगकर्मी या इप्टा के पुनर्जागरण के नायक नहीं थे।
वे मेरे और हम आगरा वालों के जितेन्द्र भाई थे।
साथी जितेन्द्र रघुवंशी को लाल सलाम।
कामरेड जितेन्द्र रघुवंशी अमर रहें।
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{लेखक नवाब उद्दीन सीपीआई(एम) उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी के सदस्य हैं। वर्तमान में वे पार्टी के राज्य कार्यालय सचिव के साथ-साथ सोशल मीडिया की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। आगरा के रहने वाले नवाब उद्दीन ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से की। वे जन विज्ञान आंदोलन और आगरा में चलाए गए साक्षरता अभियान में भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। वे डॉ. जितेंद्र रघुवंशी के पारिवारिक मित्र हैं।}
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