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डीयू चुनाव ~ कैम्पस में 'दक्षिणपंथ' के खिलाफ गहरा असंतोष

केशव कुमार भट्टड़•21 सितंबर 20267 मिनट पठन117 बार पढ़ा गया

वोट बंटे तो फायदा एबीवीपी को पर 'वाम एकता' ने भी दिखाई कैम्पस में अपने दम पर खड़े रहने की ताकत! दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव के नतीजों में वामपंथी छात्र गठबंधन एसएफआई (SFI) और आइसा (AISA) ने कई प्रमुख कॉलेजों और हंसराज जैसे पारंपरिक गढ़ों में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड वोट हासिल किए। वहीं, उपाध्यक्ष पद पर पूर्व एनएसयूआई नेता दीपांशु शौकीन ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में सबसे बड़ी जीत दर्ज की। हालांकि विरोधी वोटों में हुए बिखराव का सीधा फायदा उठाकर एबीवीपी मुख्य चार केंद्रीय पदों में से तीन पर अपनी सीट बचाने में कामयाब रही। कुल मिलाकर, आंकड़ों से साफ जाहिर होता है कि विपक्षी वोटों का एकजुट न होना ही एबीवीपी की जीत की मुख्य वजह बना।

डीयू चुनाव ~ कैम्पस में 'दक्षिणपंथ' के खिलाफ गहरा असंतोष


दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव:

वाम उभरा:'एसएफआई-आइसा' का दमदार प्रदर्शन
एबीवीपी के खाते में गए मुख्य तीनों पदों पर 66% मतों की 'रिकार्ड' गिरावट


नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव के नतीजों ने इस बार छात्र राजनीति में एक नया और सशक्त संदेश दिया है। छात्र-छात्राओं के एक बड़े तबके ने दक्षिणपंथी छात्र संगठन एबीवीपी के विकल्प के तौर पर वामपंथी छात्र ऐक्य यानी एसएफआई (SFI) और आइसा (AISA) के गठबंधन पर अपना भरोसा जताया है। यद्यपि वोटों के विभाजन के चलते एबीवीपी मुख्य चार केंद्रीय पदों में से तीन पद बचाने में कामयाब रही, लेकिन पूरे परिसर में एसएफआई और आइसा के जनाधार और मत प्रतिशत ने सत्ताधारी गुट को करारा झटका दिया है।

वाम छात्र ऐक्य (SFI-AISA) की ऐतिहासिक बढ़त और कॉलेज स्तर पर शानदार जीत

यूनिवर्सिटी के विभिन्न विभागों और संबद्ध कॉलेजों में वामपंथी गठबंधन की ताकत में अभूतपूर्व इजाफा दर्ज किया गया है। पिछले चुनावों की तुलना में मुख्य चार पदों पर एसएफआई और आइसा के संयुक्त उम्मीदवारों को मिले वोटों में भारी बढ़ोतरी हुई है। कई ऐसे कॉलेज जो पारंपरिक रूप से एबीवीपी का गढ़ माने जाते थे, वहां वाम उम्मीदवारों को मिले रिकॉर्ड मतों ने सभी को चौंका दिया है।

भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज: यहाँ अध्यक्ष पद पर एसएफआई उम्मीदवार आर्चि विश्वास (SFI दिल्ली राज्य समिति की सदस्य हैं) ने शानदार जीत दर्ज की। इस जीत ने कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे को खत्म कर दिया। यह एक ऐतिहासिक बदलाव है।
ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज: यहाँ संयुक्त सचिव (Joint Secretary) पद पर एसएफआई उम्मीदवार जीतेंद्र विजयी रहे।

मिरांडा हाउस: यहाँ एसएफआई उम्मीदवार अध्याश्री सेंट्रल काउंसलर चुनी गईं।

हंसराज कॉलेज: एबीवीपी का मजबूत किला माने जाने वाले हंसराज कॉलेज में एसएफआई प्रत्याशी सृजन कश्यप ने 1100 वोट हासिल कर नया इतिहास रच दिया। आमतौर पर दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के दबदबे वाले हंसराज कॉलेज में SFI प्रत्याशी द्वारा इतनी बड़ी संख्या में वोट हासिल करना कैंपस की राजनीति में वामपंथी छात्र राजनीति के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
इसके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस, दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, बीआर आंबेडकर कॉलेज, ज़ाकिर हुसैन (संध्या), एल सेंटर-1, और आयुर्वेद एवं यूनानी तिब्बिया कॉलेज में भी एसएफआई समर्थित उम्मीदवारों ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है।

निर्दलीय उम्मीदवार का ऐतिहासिक रिकॉर्ड

उपाध्यक्ष (Vice President) पद पर निर्दलीय प्रत्याशी दीपांशु शौकीन ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। उन्हें 30,615 वोट मिले, जो चारों मुख्य पदों पर जीतने वाले सभी उम्मीदवारों में सबसे अधिक हैं और सबसे अधिक अंतर की जीत है। वे पहले एनएसयूआई (NSUI) से जुड़े थे, लेकिन NSUI से टिकट न मिलने/टिकट विवाद के बाद आत्मविश्वास से भरे दीपांशु ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर यह ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया।


केंद्रीय पदों के आंकड़े: वोटों के बिखराव ने दिया एबीवीपी को मौका

एबीवीपी ने अध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव पदों पर जीत दर्ज की है, लेकिन उनके जीत का अंतर बहुत कम रहा। आंकड़ों से साफ झलकता है कि अगर विरोधी वोटों का विभाजन न होता, तो तस्वीर पूरी तरह अलग होती:

अध्यक्ष पद : एबीवीपी के उम्मीदवार यश डबास को 24576 वोट मिले। यहाँ एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा 22,523 वोट लेकर दूसरे स्थान पर और आइसा प्रत्याशी अनन्या रतुड़ी 5,377 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रही। एबीवीपी को 2053 वोट से जीत मिली।

विपक्ष के एनएसयूआई और आइसा के कुल वोट जोड़ दिए जाएं तो 27900 वोट होते हैं यानि उन्हे एबीवीपी के विजेता उम्मीदवार से 3,324 वोट अधिक मिले हैं।

उपाध्यक्ष पद : उपाध्यक्ष पद पर एक अनोखा समीकरण रहा, जहाँ कांग्रेस समर्थित NSUI से बगावत करके उतरे निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन को 30,615 वोट मिले और उन्होंने एकतरफा जीत दर्ज की। एबीवीपी के लिए यह एक बड़ा नुकसान रहा और एबीवीपी को इस पद से हाथ धोना पड़ा।

महासचिव पद : वाम छात्र ऐक्य के एसएफआई उम्मीदवार स्तानजिन देसक्यॉन्ग ने 8,734 वोट प्राप्त किए। महासचिव पद के लिए एबीवीपी को 21,650 मत (रिया छावड़ी) , एनएसयूआई को 14,869 मत (नम्रता चौधरी) मिले। यहाँ भी एनएसयूआई और एसएफआई के सम्मिलित वोट (23603 वोट) एबीवीपी के विजयी उम्मीदवार से 1,953 वोट अधिक रहे।

संयुक्त सचिव पद : यहाँ मुकाबला और भी दिलचस्प रहा! वोटों के बिखराव ने एबीवीपी की झोली में यह सीट डाल दी। इस पद के लिए एबीवीपी को 16,615 वोट (लक्ष्य राज), समाजवादी पार्टी समर्थित समाजवादी छात्र सभा (SCS) को 15,778 वोट (विशेष यादव) मिले। दूसरे स्थान पर रही समाजवादी छात्र सभा (SCS) के प्रत्याशी को जीत दर्ज करने वाले एबीवीपी उम्मीदवार से महज 837 वोट कम मिले। तीसरे स्थान पर एनएसयूआई को 15,206 वोट (गोपाल चौधरी) मिले और चौथे स्थान पर एसएफआई उम्मीदवार बी पारिजात को 5,837 वोट मिले। एससीएस, एनएसयूआई और एसएफआई का कुल वोट जोड़ें तो यह आंकड़ा 36821 वोट पहुंचता है, जो विजेता एबीवीपी प्रत्याशी के कुल वोटों से 20206 अधिक है, काफी ज्यादा है!

यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि अध्यक्ष पद के लिए 4,310 वोट, उपाध्यक्ष के लिए 4,359 वोट, सचिव के लिए 7,884 वोट और संयुक्त सचिव पद के लिए 7,389 वोट नोटा (NOTA) में दर्ज हुए।

वाम छात्र राजनीति को नई दिशा की जरूरत

विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा-आरएसएस विरोधी संगठनों के आपसी बिखराव का सीधा फायदा उठाकर ही एबीवीपी किसी तरह अपनी सीटें बचा पाई है।


छात्रों की बहुसंख्या सरकार विरोधी

डीयू के अधिकांश छात्र-छात्राएं वर्तमान सत्ता और नीतियों के खिलाफ हैं, लेकिन विपक्ष के आपस में बंटे होने के कारण सत्ताधारी गुट बाजी मार लेता है। जो लोग जीते हैं, उन्हें समझना होगा कि वे कोई 'राजा-रानी' नहीं हैं, क्योंकि छात्रों के बड़े बहुमत ने उन्हें वोट नहीं दिया है।

छात्र-समाज का झुकाव सत्ता के विरुद्ध है, विपक्ष के साथ है।

कुल मिलाकर इस बार मुख्य सीटों पर हुए मुकाबले में एबीवीपी(ABVP) की जीत का कुल मार्जिन पिछले वर्ष (2025) के 28243 वोटों की तुलना में घटकर 9,671 वोट रह गया है, यानि पिछले चुनाव की तुलना में लगभग 66% की रिकार्ड गिरावट हुई है। यह प्रमाणित करता है कि छात्र-समाज का झुकाव सत्ता के विरुद्ध है, विपक्ष के साथ है। यह 9,671 वोटों का मार्जिन एबीवीपी द्वारा जीती गई तीनों सीटों (अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव) का कुल मार्जिन है. इसमें उपाध्यक्ष पद शामिल नहीं है क्योंकि उस पद पर एबीवीपी को हार का सामना करना पड़ा है। इसका सटीक गणित इस प्रकार है: अध्यक्ष पद पर जीत का अंतर 2,053 वोट, सचिव पद पर जीत का अंतर 6,781 वोट, संयुक्त सचिव पद पर जीत का अंतर 837 वोट। प्रमुख पदों पर एबीवीपी की जीत का कुल मार्जिन रहा 9,671 वोट, यानि इन्ही पदों पर पिछले साल (2025) के 28243 वोटों की तुलना में मात्र 34%। यह गणितीय तथ्य संभावनाएं जगाता है और स्पष्ट करता है - 'प्रत्येक पद पर बिखरे विपक्ष के मत जिसका सीधा फायदा मिला एबीवीपी को । ' यह राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष के लिए छात्र-समाज का स्पष्ट संदेश है।


आत्ममंथन और एकजुटता की जरूरत

सिर्फ नारों या विचारधारा की शुद्धता (Ideological Purity) में बंधे रहने के बजाय वामपंथी और प्रगतिशील छात्र संगठनों को वास्तविक धरातल और जमीनी परिस्थितियों को समझना होगा। मिनिमम कॉमन एजेंडा के आधार पर जब तक एक मजबूत, एकजुट और व्यापक विरोधी मोर्चे का निर्माण नहीं होगा, तब तक छात्रों के अधिकारों की मुकम्मल लड़ाई को निर्णायक मोड़ पर पहुंचाना संभव नहीं होगा।

डीयू का यह जनादेश साफ संदेश देता है कि कैम्पस में दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ असंतोष गहरा है और वाम छात्र एकता (SFI-AISA) छात्रों की बुलंद आवाज बनकर अपने दम पर खड़ा है। जरूरत बस एक व्यापक और रणनीतिक एकता की है ताकि छात्र-युवा विरोधी ताकतों को करारी शिकस्त दी जा सके।



साभार स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। दिल्ली विश्वविद्यालय — DUSU Election 2026–27 आधिकारिक पेज। दिल्ली विश्वविद्यालय — 2025 DUSU आधिकारिक निर्वाचन परिणाम/अधिसूचना। Bhaskaracharya College of Applied Sciences — आधिकारिक चुनाव पेज। Mint — DUSU Election Results 2025 एवं परिणामों की पुष्टि के लिए मुख्य समाचार पत्र।

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डीयू चुनाव ~ कैम्पस में 'दक्षिणपंथ' के खिलाफ गहरा असंतोष

अपलोडर: VKA-FD9RRG • प्रकाशित: 21 सितंबर 2026 • 7 मिनट पठन

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सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

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केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

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