"जब कला और सिनेमा से सौहार्द को मिटाया जाएगा, तब प्रगतिशील संस्कृति ही फासीवाद के ख़िलाफ़ ढाल बनेगी।"
"संवैधानिक सिद्धांतों और वैचारिक संवाद के माध्यम से ही समावेशी संस्कृति को समृद्ध बनाया जा सकता है।"- सीपीआई(एम) पश्चिम बंगाल राज्य सचिव मोहम्मद सलीम
सीपीआई(एम) पश्चिम बंगाल राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने बहरामपुर में 'मार्क्सवादी पथ' के तत्वावधान में आयोजित तीसरा 'काजी नजरुल इस्लाम स्मारक व्याख्यान' में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी बात रखते हुए केंद्र सरकार और संघ परिवार की सांप्रदायिक राजनीति पर सीधी चोट की । उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री पर धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावादी ताने-बाने को मिटाने का दबाव बनाया जा रहा है। सत्ता कायम रखने के लिए आज सिनेमा, कला और साहित्य को हथियार बनाया जा रहा है तथा प्रगतिशील विचारकों को 'दिमागी नक्सल' कहकर डराने की कोशिश हो रही है। उन्होंने इप्टा (IPTA) और वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलनों की ऐतिहासिक भूमिका का ज़िक्र करते हुए जनपक्षधर संस्कृति के ज़रिए इस नफ़रती राजनीति का डटकर मुकाबला करने का आह्वान किया।
वक्ताओं ने भारतीय कला, साहित्य और सिनेमा के मौजूदा हालात पर गहरा रोष और चिंता व्यक्त की
'मार्क्सवादी पथ' के तीसरा काजी नजरुल इस्लाम स्मारक व्याख्यान में
बॉलीवुड और संस्कृति पर सांप्रदायिक हमलों के खिलाफ मोहम्मद सलीम
~"सत्ता कायम रखने के लिए कला-साहित्य को नफरत का हथियार बना रही है बीजेपी-आरएसएस"~
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बहरामपुर। पश्चिम बंगाल। सीपीआई(एम) के राज्य सचिव एवं 'मार्क्सवादी पथ' पत्रिका के संपादक मोहम्मद सलीम ने भारतीय सिनेमा, साहित्य और कला पर बढ़ रहे सांप्रदायिक हमलों को लेकर केंद्र की भाजपा सरकार और संघ परिवार को कठघरे में खड़ा किया है । उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज के दौर में सत्ताधारी वर्ग अपनी सांप्रदायिक राजनीति को बनाए रखने और जनविरोधी एजेंडे को थोपने के लिए संस्कृति के विविध माध्यमों को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। बुधवार को बहरामपुर स्थित रवींद्र सदन में 'मार्क्सवादी पथ' पत्रिका के तत्वावधान में आयोजित 'तीसरे काजी नजरुल इस्लाम स्मारक व्याख्यान' को संबोधित करते हुए मोहम्मद सलीम ने कला और सिनेमा जगत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का सामयिक विश्लेषण किया - देश के विभाजन के दौर और उसके बाद भी लंबे समय तक बॉलीवुड सिनेमा में धार्मिक सौहार्द, धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद की जो गहरी छाप दिखती थी, आज उस पर सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों का हमला हो रहा है। बहुलतावादी संस्कृति को किनारे धकेल कर उग्र सांप्रदायिक आक्रामकता को बढ़ावा दिया जा रहा है । वक्ताओं ने भारतीय कला, साहित्य और सिनेमा के मौजूदा हालात पर गहरा रोष और चिंता व्यक्त की।
बाबरी मस्जिद ध्वंश के बाद संघ ने सिनेमा पर थोपा सांप्रदायिक एजेंडा: ~मोहम्मद सलीम~
मोहम्मद सलीम ने ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में संघ परिवार ने बाकायदा निर्देश जारी किए थे। इसका मुख्य मकसद सिनेमा से धर्मनिरपेक्षता, आपसी भाईचारे और सौहार्द की धारणा को पूरी तरह खत्म करना था। उन्होंने कहा कि काजी नजरुल इस्लाम ने अपने साहित्य और संगीत का इस्तेमाल साम्राज्यवाद के खिलाफ और आजादी के साथ-साथ समानता के मूल्यों को स्थापित करने के लिए किया था। लेकिन आज के दौर में सत्ताधारी वर्ग अपने सांप्रदायिक और जनविरोधी राजनीतिक एजेंडे को थोपने के लिए कला, साहित्य और संस्कृति को सांप्रदायिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। आज आरएसएस और भाजपा रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम जैसी महान विभूतियों की विरासत को भी आपस में बांटने की विभाजनकारी राजनीति कर रहे हैं।
"सृजनशीलता से डरते हैं प्रधानमंत्री, इसलिए कहते हैं 'दिमागी नक्सल'"
मोहम्मद सलीम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए कहा कि आज सत्ता में बैठे लोग जनपक्षधरता और स्वतंत्र सृजनशीलता से घबराते हैं। उन्होंने कहा: "जो लोग साहित्य, कला और सिनेमा के माध्यम से प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाते हैं, उनसे सत्ता डरती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ऐसे स्वतंत्र विचारकों और कलाकारों को 'दिमागी नक्सल' कहकर बदनाम करने की कोशिश करते हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि भले ही एक तरफ सांप्रदायिक प्रचार का दबाव है, लेकिन दूसरी तरफ प्रगतिशील और जनपक्षधर संस्कृति की रचनात्मक धारा भी मजबूती से काम कर रही है।
आईपीटीए (IPTA) और वामपंथी आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका
भारतीय सिनेमा में 'विविधता में एकता' और 'गंगा-जमुनी तहजीब' के योगदान पर बात करते हुए सीपीआई(एम) नेता ने वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन को याद किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा में जो धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील मूल्य दिखे, उसका एक बड़ा कारण वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े कलाकारों का योगदान था। मोहम्मद सलीम ने बताया कि आईपीटीए (IPTA - इप्टा) से जुड़े कलाकारों ने गाँवों, मज़दूर बस्तियों और जन-आंदोलनों के बीच जाकर वास्तविक जमीनी अनुभव और प्रशिक्षण प्राप्त किया था। इसी जन-जुड़ाव की छाप बाद में भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर में साफ दिखाई दी। सआदत हसन मंटो से लेकर कलीम शराफी (उपमहाद्वीप के सर्वश्रेष्ठ रवींद्र संगीत गायकों में से एक) जैसे दिग्गजों ने इसी जन-संस्कृति को सिनेमा के पर्दे पर उतारा और भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर पेश की। सआदत हसन मंटो से लेकर कलीम शराफी तक के उदाहरण देते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि भारतीय सिनेमा में 'विविधता में एकता' की संस्कृति को स्थापित करने में वामपंथी आंदोलनों की ऐतिहासिक भूमिका रही है।
प्रो. उर्वी मुखर्जी का व्याख्यान: 'फिल्मों से गायब हो रहा सांप्रदायिक सौहार्द और बहुलतावाद'
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रोफेसर उर्वी मुखर्जी ने "भारतीय चलचित्र: सांप्रदायिकता, बाजार और लोकप्रियता" विषय पर अपना शोधपरक वक्तव्य रखा। उन्होंने कहा कि बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में सवाक (बोलती) फिल्मों के शुरुआती दौर से ही विविध संस्कृतियों का मेल-मिलाप दिखता था। एक ही गीत में हिंदी और उर्दू का साथ होना या 'मुगल-ए-आजम' से लेकर 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्मों में सामाजिक सौहार्द का संदेश देना इसकी पहचान थी। प्रो. मुखर्जी ने चिंता जताते हुए कहा कि आज 'कश्मीर फाइल्स', 'छावा' या 'धुरंधर' जैसी तथाकथित बॉक्स ऑफिस हिट फिल्मों के माध्यम से एक समुदाय को दूसरे समुदाय के दुश्मन के रूप में पेश किया जा रहा है, जो कि बेहद खतरनाक है।
सिनेमा को मासूम न समझें
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता प्रो. उर्वी मुखर्जी ने "भारतीय चलचित्र: सांप्रदायिकता, बाजार और लोकप्रियता" विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के बदलते स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने श्रोताओं का आह्वान करते हुए कहा, "सिनेमा को निष्पाप या मासूम मत मानिए। यह ध्यान से देखने और समझने की जरूरत है कि किस तरह सिनेमा का इस्तेमाल सांप्रदायिक मंसूबों और एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।"
अतीत का समावेशी स्वरूप और वर्तमान की चुनौतियाँ
प्रो. उर्वी मुखर्जी ने बताया कि बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में सवाक (बोलती) फिल्मों के शुरुआती दौर से ही विविध संस्कृतियों का मेल-मिलाप दिखता था। एक ही गीत या यहाँ तक कि एक ही वाक्य में हिंदी और उर्दू का सहज प्रयोग होता था। हालाँकि, यह सफर आसान नहीं था और इसमें कई सीमाएँ भी थीं - जैसे युसूफ खान को 'दिलीप कुमार' या मुमताज बेगम को 'मधुबाला' का नाम अपनाना पड़ा। फिर भी, विभाजनकारी प्रवृत्तियों के बावजूद सिनेमा में एक समावेशी संस्कृति जीवित थी। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने 1944 की फिल्मों के विज्ञापनों में हिंदू-मुस्लिम महिलाओं की एक साथ तस्वीरें, महबूब खान के प्रोडक्शन के लोगो में हँसिए और हथौड़े (कम्युनिस्ट प्रतीक) की मौजूदगी, और 'मुगल-ए-आजम' से लेकर 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्मों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने दिलीप कुमार से 'मुगल-ए-आजम' के बारे में पूछा था, तो दिलीप साहब ने कहा था: "वह कोई ऐतिहासिक या धार्मिक फिल्म नहीं, बल्कि पिता और पुत्र के मानवीय संबंधों पर आधारित एक सामाजिक फिल्म थी।"
बॉक्स ऑफिस हिट्स के नाम पर नफरत का प्रचार
90 के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से बॉलीवुड में शुरू हुए सांप्रदायिक दौर और हालिया रुझानों पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रो. उर्वी मुखर्जी ने कहा कि आजकल जिन्हें 'बॉक्स ऑफिस हिट' बताकर परोसा जा रहा है, उनमें से कई फिल्में खुले तौर पर उग्र सांप्रदायिक नफरत फैला रही हैं। 'द कश्मीर फाइल्स', 'छावा' या 'धुरंधर' जैसी फिल्में समाज के एक समुदाय को दूसरे समुदाय के दुश्मन के रूप में पेश करने का काम कर रही हैं। उन्होंने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 21वीं सदी की शुरुआत में भी मुस्लिम समुदाय समाज के हर क्षेत्र में पिछड़ापन झेल रहा है, और सिनेमा के माध्यम से उन्हें निशाना बनाना बेहद खतरनाक है।
पुस्तकों एवं विशेषांकों का विमोचन
इस गरिमामय आयोजन में 'मार्क्सवादी पथ' के सह-संपादक शांतनु दे और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता सुगत सेन ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों - पुस्तक 'अप्रकाशित काकाबाबू' , 'उत्था पटनायक एवं प्रभात पटनायक के निबंधों का संग्रह' और 'मुर्शिदाबाद वार्ता' के शरद विशेषांक का औपचारिक विमोचन भी किया गया।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति । 01.10.2026
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