'द हिंदू' की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि नया विकल्प शुरू होने से उस प्रक्रिया में बदलाव आया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने इससे पहले बताया था कि पोर्टल में आवश्यक लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) लाने के लिए इसे अपग्रेड किया गया है।
परिणामस्वरूप, एक तरफ आयोग की आईटी शाखा की फाइलों की निगरानी पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति, और दूसरी तरफ एसआईआर के दौरान मतदाता सूची प्रबंधन की तकनीकी व्यवस्था में बदलाव—इन दोनों घटनाओं ने चुनाव आयोग के प्रशासनिक ढांचे और निगरानी प्रणाली पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैंं।
हर दिन पता चल रहा है 'वोट चोरी'
दो आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद उसी अधिकारी के पास आईटी फाइल!

'वोट चोरी' की पूरी प्रक्रिया हर दिन और स्पष्ट होती जा रही है। चुनाव आयोग की आईटी शाखा की फाइलों की निगरानी को लेकर आयोग के दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद, संबंधित अधिकारी के पास ही अब भी वह जिम्मेदारी बनी हुई है। 'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के खिलाफ आरोप लगाते हुए जुलाई में कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पत्र लिखा था।
पत्र में आरोप लगाया गया था कि सीमा खन्ना की फाइल पहले उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के माध्यम से जांच होकर अगले स्तर पर जाती थी। गर्ग के फैसले से वह प्रक्रिया बदल गई। संधू और जोशी का कहना था कि इससे स्थापित निगरानी और सत्यापन का एक महत्वपूर्ण स्तर कमजोर हुआ है।
इस संदर्भ में कांग्रेस नेता जयराम रमेश का आरोप है कि उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, अब उन्हीं को चुनाव आयोग की विवादित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) शाखा की निगरानी का जिम्मा सौंप दिया गया है।
उनका दावा है कि उस अधिकारी के एक निर्देश के बाद ही आईटी शाखा से निगरानी की व्यवस्था हटा ली गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके परिणामस्वरूप शाखा को और अधिक अपारदर्शी तरीके से काम करने का मौका मिला। रमेश का दावा है कि अगस्त से उस अधिकारी को ही आईटी शाखा की देखरेख का अधिकार दिया गया है। उनका आरोप है कि 26 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने जो प्रेस नोट जारी किया था, उसमें वास्तविक तथ्य को छिपाने की कोशिश की गई थी।
रमेश का यह भी आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और प्रधानमंत्री उस अधिकारी को पद पर रखकर पूरी चुनावी व्यवस्था पर केंद्रीय नियंत्रण बनाए हुए हैं। उनके शब्दों में, 'वोट चोरी' की पूरी प्रक्रिया हर दिन और स्पष्ट होती जा रही है।
यह घटनाक्रम चुनाव आयोग के हालिया स्पष्टीकरण के बाद और महत्वपूर्ण हो गया है। आयोग ने बताया था कि गर्ग के काम के पुनर्वितरण का निर्देश वास्तव में लागू नहीं हुआ था और आईटी शाखा पर उप चुनाव आयुक्त की निगरानी भी वापस नहीं ली गई थी। लेकिन 'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट कहती है कि संजय कुमार के अगस्त में अपने काडर में लौटने के बाद उनका प्रभार गर्ग के पास आ गया। नतीजतन, सीमा खन्ना की फाइल अब गर्ग के माध्यम से ही आयुक्तों के पास जा रही है।
संजय कुमार पद से क्यों हटे, इस पर आयोग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि वे दिल्ली सरकार के काडर में वापस लौटना चाहते थे। इस पर उनका कोई वक्तव्य नहीं मिल सका है। संधू, जोशी, गर्ग और चुनाव आयोग को भी इस संबंध में सवाल भेजे गए थे, लेकिन रिपोर्ट के प्रकाशन तक कोई जवाब नहीं मिला।
इस विवाद से चुनाव आयोग की आईटी प्रणाली भी जुड़ी हुई है। 'इंडियन एक्सप्रेस' की जांच का हवाला देते हुए 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने बताया कि सीमा खन्ना के नेतृत्व में लागू नए आईटी प्रोटोकॉल के कारण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए जिम्मेदार इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ईआरओ) की डेटाबेस तक पहुंच (एक्सेस) पर सवाल उठे थे।
'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट में कहा गया है कि दो चुनाव आयुक्तों का पत्र व्यक्तिगत रूप से दिया गया था, आयोग की ओर से नहीं—इसी वजह से कैबिनेट सचिव सीधे तौर पर कोई कार्रवाई नहीं कर सके। आरोपों को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) भेज दिया गया। सरकार का रुख यह था कि पत्र मुख्य रूप से विषय से अवगत कराने के लिए थे; सीधे कार्रवाई के अनुरोध के रूप में नहीं।
दूसरी ओर, रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गर्ग ने दोनों चुनाव आयुक्तों से मुलाकात कर अपने फैसले की व्याख्या दी। उनका तर्क था कि सीमा खन्ना, संजय कुमार की तुलना में पद में वरिष्ठ थीं, इसलिए प्रशासनिक 'पदानुक्रम' (हायरारकी) से जुड़ी समस्या को सुलझाने के लिए फाइल का रूट बदला गया था। आयोग के अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि इस वर्ष खन्ना की पदोन्नति बढ़ाकर 14 से 15 कर दिया गया है।
इस बीच, एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग के पोर्टल को लेकर भी नए सवाल खड़े हो गए हैं। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में ईआरओ अब कुछ विशेष मामलों में बिना किसी दस्तावेज के और बिना सुनवाई तय किए भी किसी मतदाता को अंतिम सूची में योग्य के रूप में चिन्हित कर सकते हैं। हालांकि, ऐसे मामले में ईआरओ को सत्यापन पूरा होने का दर्शाने के लिए 'हियरिंग ऑर्डर' अपलोड करना होगा।
पहले नोटिस पाने वाले मतदाताओं के लिए दस्तावेज और सुनवाई की प्रक्रिया अधिक अनिवार्य थी। 'द हिंदू' की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि नया विकल्प शुरू होने से उस प्रक्रिया में बदलाव आया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने इससे पहले बताया था कि पोर्टल में आवश्यक लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) लाने के लिए इसे अपग्रेड किया गया है।
परिणामस्वरूप, एक तरफ आयोग की आईटी शाखा की फाइलों की निगरानी पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति, और दूसरी तरफ एसआईआर के दौरान मतदाता सूची प्रबंधन की तकनीकी व्यवस्था में बदलाव—इन दोनों घटनाओं ने चुनाव आयोग के प्रशासनिक ढांचे और निगरानी प्रणाली पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं।
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साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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