"विचारधाराओं का 'वध' नहीं होता; तानाशाह मिट जाते हैं, लाल झंडा लहराता रहता है!"कोलकाता में सीपीआई (एम) राज्य दफ़्तर के बाहर मुख्य सड़क पर टंगे 'वाम वध' और उसके जवाब में 'हिटलर' के संदर्भ वाले पोस्टर केवल चुनावी प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि नव-फासीवादी आक्रामकता और वैचारिक प्रतिरोध के सबसे बड़े द्वंद्व को दर्शाते हैं। लोकतंत्र में विरोधी को 'दानव' मानकर उसका समूल नाश करने की भाषा एक राजनीतिक-सांस्कृतिक बीमारी का लक्षण है। इतिहास गवाह है कि तानाशाही फरमानों से जन-आंदोलनों और प्रगतिशील चेतना को मिटाया नहीं जा सकता। संघी-भाजपा के इस नफ़रती आख्यान का स्थायी इलाज केवल वर्ग-एकजुटता, सांस्कृतिक चेतना और व्यापक जन-आंदोलन ही हैं।
'वाम वध' का फासीवादी उन्माद: एक बीमारी
~केशव कुमार भट्टड़~
पश्चिम बंगाल की क्रांतिकारी धरती और कोलकाता के ऐतिहासिक ए.जे.सी. बोस रोड स्थित मुज़फ़्फ़र अहमद भवन (सीपीआईएम राज्य मुख्यालय) के बाहर मुख्य सड़क के मुहाने पर हाल ही में उभरा दृश्य केवल एक चुनावी होर्डिंग का खेल नहीं है। संघ-भाजपा के कुनबे द्वारा लगाए गए 'वाम वध' के होर्डिंग और उसके प्रति-उत्तर में टंगे प्रतिरोध के पोस्टर - जिसमें हिटलर की तस्वीर के साथ लिखा है: "उसने भी यही कहा था, बाकी इतिहास है" - ने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े वैचारिक द्वंद्व को उजागर कर दिया है। संसदीय सीटों के गणित में वामपंथ की मौजूदा स्थिति को देखकर अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि आखिर जिस दल का विधानसभा में मात्र एक प्रतिनिधि हो, उसके खिलाफ संघ-भाजपा इकोसिस्टम इतना आक्रामक क्यों है? उत्तर स्पष्ट है: वाम विचारधारा, जन-आंदोलनों की विरासत और वर्ग-चेतना आज भी पूंजीवादी और फासीवादी ताकतों के लिए सबसे बड़ा दुःस्वप्न है।
'वाम वध' का संघी मनोविज्ञान और फासीवादी सनक
भाजपा का यह आचरण एक राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक विकृति ('पोलिटिकल साइकोपेथोलॉजी) का लक्षण है। इसके तीन मुख्य पहलू हैं:
(1) भाषा का दुष्टिकरण - अमानवीय करण
दुर्गा पूजा और बंगाली संस्कृति के पवित्र उत्सव के समय 'वध' जैसे धार्मिक-पौराणिक शब्दों का सहारा लेकर वामपंथियों को 'असुर' या 'अधर्म' के रूप में पेश करने की दुष्टता की जा रही है। जब किसी राजनीतिक विचार और उसके कार्यकर्ताओं का 'दानवीकरण' कर दिया जाता है, तो उनके दमन, हिंसा और शारीरिक विनाश को नैतिक रूप से उचित ठहराने की ज़मीन तैयार की जाती है। यह वही तकनीक है जिसका इस्तेमाल 1930 के दशक में जर्मनी में नाजियों ने कम्युनिस्टों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया था।
(2) भय से छूटती कंपकंपी
भाजपा जानती है कि बंगाल में उसकी मौजूदा ताकत केवल तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भ्रष्टाचार से उपजे जन-असंतोष और चुनाव आयोग की कारीगरी का अस्थायी प्रतिफल है। वह अंदर से डरी हुई है। उसे भय है कि वामपंथी कैडर, छात्र, युवा और मजदूर-किसान पुनः सड़कों पर हैं, तो उसे भय है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
(3) सांस्कृतिक व जन-स्थानों पर कब्जा करने की सनक
सार्वजनिक पूजा पंडालों, सांस्कृतिक मंचों और यहाँ तक कि कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर के मुहाने पर इस तरह की आक्रामकता दिखाना संघी 'प्रादेशिक प्रभुत्व' (टेरीटॉरियल डोमिनेंस) की उस कुंठा को दर्शाता है, जो बंगाल की बौद्धिक और 'भद्रलोक' परंपरा को अपनी नफ़रत की राजनीति में ढालने में विफल रही है।
ऐतिहासिक चेतावनी: "उसने भी यही कहा था..."
प्रति-उत्तर में लगाए गए पोस्टर ने संघी ब्रिगेड को उनकी असली जगह दिखाई है। एडोल्फ़ हिटलर और नाजी जर्मनी ने भी यह दावा किया था कि वे लाल झंडे (कम्युनिस्टों) को धरती के सीने से मिटा देंगे। हिटलर के गुंडों ने सबसे पहले कम्युनिस्टों के दफ़्तरों को जलाया, ट्रेड यूनियनों पर ताले लगाए और कम्युनिस्टों को यातना शिविरों में भेजा।
इतिहास साक्षी है:
हिटलर का वह अहंकार बर्लिन में राइखस्टाग (Reichstag) की छत पर लाल सेना (Red Army) द्वारा फहराए गए लाल ध्वज के नीचे राख हो गया। हिटलर और उसके फासीवादी दस्तों का अंत इतिहास के कूड़ेदान में हुआ। इसलिए, जब आज के नव-फासीवादी 'वाम वध' की हुंकार भरते हैं, तो उन्हें यह याद दिलाना ऐतिहासिक दायित्व बन जाता है कि विचारधाराओं का 'वध' गोलियों, पोस्टरों या फासीवादी दस्तों से नहीं हो सकता।
बीमारी का इलाज: वामपंथ का रणनीतिक और ऐतिहासिक मार्ग
इस नव-फासीवादी बीमारी को पोस्टरों के जवाब के साथ-साथ व्यापक जन-आंदोलन और वैचारिक चेतना से ठीक किया जा सकता है। इसका स्थायी इलाज निम्नलिखित कदमों में निहित है:
(1) 'वर्ग चेतना' के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ध्वस्त करना
भाजपा की राजनीति धर्म और पहचान के आधार पर मजदूर वर्ग को बांटने पर टिकी है। इसका एकमात्र इलाज है - वर्ग-एकजुटता। महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल स्थिति, महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान , निजीकरण, न्यूनतम मजदूरी और किसानों की बेदखली जैसे वास्तविक मुद्दों पर हिंदू-मुस्लिम-दलित-आदिवासी मजदूरों को एक झंडे के नीचे आना होगा। जब पेट की भूख और रोजगार का सवाल सामने आता है, तो 'वध' का नफरती आख्यान बिखर जाता है।
(2) जनता के सांस्कृतिक और नागरिक स्थानों का पुनरुद्धार
बंगाल की सांस्कृतिक पहचान (रवींद्रनाथ, नजरुल, ऋत्विक घटक, सत्यजीत राय, मृणाल सेन, उत्पल दत्त आदि-आदि की विशाल विरासत) को संघी सांप्रदायिकता से बचाना होगा। दुर्गा पूजा जैसे लोक-उत्सवों को नफ़रत का अखाड़ा बनाने की साजिश के खिलाफ जनता के बीच प्रगतिशील साहित्य, नाटक और संगीत के माध्यम से वैचारिक हस्तक्षेप को निरंतर तेज होना होगा।
(3) 'टीएमसी बनाम बीजेपी' की बची-खुची प्रायोजित बाइनरी को ध्वस्त करना
बंगाल में सत्ताधारी टीएमसी का भ्रष्टाचार और भाजपा का उग्र सांप्रदायिकतावाद एक-दूसरे के पूरक हैं। वामपंथ को यह स्पष्ट करना होगा कि टीएमसी का विकल्प भाजपा नहीं हो सकती और न ही भाजपा का विकल्प टीएमसी है। वास्तविक विकल्प केवल और केवल जन-पक्षधर, जनवादी और धर्मनिरपेक्ष वामपंथ ही है।
'वाम वध' का पोस्टर लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि वामपंथ कोई व्यक्तिगत दुश्मन नहीं, बल्कि शोषण से मुक्ति की एक वैज्ञानिक विचारधारा है। जब तक दुनिया में पूंजीवादी शोषण रहेगा, जब तक किसान-मजदूर-गरीब के खून पसीना का हक मारा जाता रहेगा , लाल झंडा दमनकारी ताकतों को चुनौती देता रहेगा। संघी ब्रिगेड को सलाह है कि वे इतिहास की किताबों के पन्ने पलटें। और इतिहास इस बात का गवाह है कि फासीवाद का अंत हमेशा जन-क्रांति के हाथों हुआ है। 'वाम वध' की भाषा बोलने वाले इतिहास के पन्नों में विलीन हो जाएंगे, और वामपंथ जन-आंदोलनों की मशाल जलाकर लोकतंत्र और इंसानियत की रक्षा करता रहेगा।
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