'सरकार डर गई है, वे डगमगा गए हैं। इसलिए वे फासीवादी तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाना चाहते हैं। उन्होंने लोगों के आंदोलन पर फासीवादी शैली में हमला बोला है। सरकार चाहती तो चर्चा के लिए बैठ सकती थी, बात कर सकती थी। कुछ माँगों को स्वीकार भी किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस रास्ते पर नहीं गई। असल में उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता है, इसलिए यह आक्रामकता है। पहले से ही ट्रेनें रद्द कर दी गईं, मेट्रो बंद कर दी गई, उड़ानों (एयरपोर्ट) से लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल के समय भी नहीं देखा।'
'आपातकाल के समय भी
ऐसा दृश्य नहीं देखा'
राज्य के फासीवाद-विरोधी वर्ग में लगातार विरोध के सुर गूँज रहे हैं
नेहा बोरा पर दिल्ली पुलिस की बर्बरता
निज प्रतिनिधि: कोलकाता, 11 अक्टूबर- "मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल (इमरजेंसी) के समय भी नहीं देखा।" कई राजनीतिक उतार-चढ़ावों के साक्षी रहे रवींद्र विशेषज्ञ पवित्र सरकार ने शनिवार को नई दिल्ली में हुई घटनाओं का विश्लेषण करते हुए यह बात कही।
जंतर-मंतर पर आइशी घोष के साथ पुलिसी बर्बरता
शनिवार को नई दिल्ली में भारी बवाल हुआ था। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे सहित अन्य संबंधित माँगों को लेकर छात्र, युवा और समाज के विभिन्न वर्गों के प्रदर्शनकारियों के आंदोलन को रोकने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने भारी अत्याचार किया है। कई लोगों को हिरासत में लिया गया है, और कई प्रदर्शनकारी लहूलुहान हुए हैं। रविवार को भी उनका विरोध प्रदर्शन जारी रहा।
मीनाक्षी मुखर्जी को हिरासत में लेती हुई दिल्ली पुलिस
नई दिल्ली में सत्ताधारी दल की इस हिंसक मानसिकता का असर पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला है। हमले के खिलाफ पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रगतिशील और फासीवाद-विरोधी हस्तियाँ खुलकर बोल रही हैं।

'सरकार डर गई है ...... पवित्र सरकार
रविवार को प्रोफेसर पवित्र सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, 'सरकार डर गई है, वे डगमगा गए हैं। इसलिए वे फासीवादी तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाना चाहते हैं। उन्होंने लोगों के आंदोलन पर फासीवादी शैली में हमला बोला है। सरकार चाहती तो चर्चा के लिए बैठ सकती थी, बात कर सकती थी। कुछ माँगों को स्वीकार भी किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस रास्ते पर नहीं गई। असल में उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता है, इसलिए यह आक्रामकता है। पहले से ही ट्रेनें रद्द कर दी गईं, मेट्रो बंद कर दी गई, उड़ानों (एयरपोर्ट) से लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल के समय भी नहीं देखा।'

फिल्म निर्देशक सौरव पाल चौधरी ने कहा, 'भाजपा जैसी गंदी, बर्बर और असभ्य पार्टी की सरकार के खिलाफ पूरा देश गरज रहा है, छात्र-युवा और आम जनता मुखर हो रही है।' उन्हें उम्मीद है कि इस विरोध प्रदर्शन का राजनीतिक असर भी देखने को मिलेगा। शनिवार को राज्य (सत्ता) ने जो किया, उसका जवाब मिलेगा। दिल्ली का यह संघर्ष एक नागरिक के रूप में मुझे बहुत उम्मीद दे रहा है। इतने सारे अभिनेता-अभिनेत्री और बुद्धिजीवी हस्तियाँ सड़कों पर उतर रही हैं।
इस देश के लोग लोकतंत्र की हत्या नहीं होने देंगे... प्रकाश राज
अभिनेता प्रकाश राज ने एक वीडियो संदेश में कहा कि सरकार ने देश के युवाओं को दबाकर उनके जीवन और यौवन को स्तब्ध करने की नीति अपनाई है। इस तरह सरकार पीछे की ओर चलने लगी है। आप याद रखिए, इस देश के लोग लोकतंत्र की हत्या नहीं होने देंगे—जिसकी शुरुआत आपने की है।

'स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोकतंत्र को इतने कीचड़ में डुबोने का कोई प्रयास भारत ने इससे पहले कभी नहीं देखा,' टिप्पणी करते हुए नाट्य व्यक्तित्व जयराज भट्टाचार्य ने आगे कहा, 'इंदिरा गांधी सरकार ने जो अर्ध-फासीवादी आतंक मचाया था, उसे ध्यान में रखते हुए भी कहा जा सकता है कि आज की सरकार उससे भी आगे निकल रही है। यह सरकार और भी क्रूर, अधिक घिनौनी और अधिक तानाशाही है। किसी भी तरह से विरोध की आवाज न उठने देना और उसे तुरंत दबाने की नीति का प्रतिबिंब हमने शनिवार को देखा।'
शनिवार की घटना के बाद रविवार सुबह से ही दिल्ली के आंदोलन का समर्थन करते हुए राज्य भर के लोग तानाशाही मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। कॉलेज प्रोफेसर शौभिक चटर्जी से लेकर स्कूल शिक्षक रतन पाल, कवि सप्तरषि बणिक से लेकर डॉक्टर डॉ. सैकत आली और निजी दफ्तर के कर्मचारी सुबीर मण्डल—सभी की राय एक ही है।
उनका कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक गुस्सा नहीं है, बल्कि यह आंदोलन एक गहन सांस्कृतिक जागरण भी है। नारे और बैनर सिर्फ शासक के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ भी हैं। सरकारी दमन वास्तव में शासक के खोखलेपन को दिखाता है और उनके डर को प्रदर्शित करता है। जेन-जी (Gen-Z) नए भारत के निर्माण की निर्मल उम्मीद जगा रहे हैं। तकनीक को हथियार बनाकर युवा पीढ़ी जिस तरह से जनआंदोलन संगठित कर रही है, वह सराहनीय है। ज्ञानेश कुमार ने जो अपराध किया है, उसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उनका तुरंत इस्तीफा देना जरूरी है।

उनमें से कई लोगों ने कहा, 'हम तो आम लोग हैं, हमारी समस्याओं का कोई समाधान नहीं हो रहा है। बचपन से हमने जिस लोकतंत्र के बारे में पढ़ा है, लोकतंत्र का जो मतलब समझा है, आज के समय में उसका प्रतिबिंब देखने को नहीं मिल रहा है। कई आम लोग ऐसे हैं जो वैध मतदाता होने के बावजूद वोट नहीं डाल सके। जो लोग इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।'
.
.
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...