
[व्लादिमीर लेनिन (व्लादिमीर इलीइच उल्यानोव - 22 अप्रैल 1870- 21 जनवरी 1924)
प्रमुख रूसी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, राजनीतिज्ञ और राजनीतिक सिद्धांतकार थे, जिन्होंने 1917 की रूसी क्रांति (अक्टूबर क्रांति) का सफल नेतृत्व किया था। वह 1917 से 1924 तक सोवियत रूस के और 1922 से 1924 तक सोवियत संघ (USSR) के पहले और संस्थापक शासन प्रमुख (Head of Government) रहे।]
भारत के बारे में लेनिन
~बुद्धदेव भट्टाचार्य~
"जब काबुल में भारतीय कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आयोजित एक सभा में एक शुभकामना संदेश पारित किया गया, तो उसके उत्तर में रूस के महान नेता लेनिन ने 'भारत के क्रांतिकारी एसोसिएशन’ के नाम एक अभिनंदन संदेश भेजा। यह संदेश रेडियो के माध्यम से प्रसारित हुआ था, जिसमें उन्होंने घोषणा की थी: 'हम भारत में मुस्लिम और गैर-मुस्लिम जनता की एकता का स्वागत करते हैं। पूर्वी दुनिया के सभी देशों में ऐसी एकता फैलनी चाहिए। जब भारत, चीन, कोरिया, जापान, ईरान और तुर्की के मजदूर व किसान हाथ से हाथ मिलाकर अपनी आजादी के एक ही लक्ष्य की ओर आगे बढ़ेंगे, तभी शोषकों के खिलाफ पक्की जीत हासिल होगी। आजाद एशिया दीर्घायु रहे।'”
मार्क्सवाद और लेनिन
मार्क्सवाद को विकसित करने का ऐतिहासिक काम लेनिन ने किया। 'लेनिनवाद' असल में साम्राज्यवाद और मजदूर वर्ग (सर्वहारा) की क्रांति के दौर का मार्क्सवाद है। लेनिन केवल दुनिया की पहली सफल मजदूर क्रांति के रचनाकार ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने पूरी दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलनों की कार्यनीति और रणनीतिक दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने यह समझाया कि बड़े-बड़े साम्राज्यवादी देश कमजोर देशों को कैसे गुलाम बनाते हैं और उनसे आजादी पाने का सही तरीका क्या होना चाहिए।
इसी सिलसिले में लेनिन ने उपनिवेशों और गुलाम देशों के मुक्ति-संग्राम पर बार-बार अपना दृष्टिकोण सामने रखा। भारत के बारे में भी उनके विचार उनकी ढेरों रचनाओं में बिखरे हुए हैं। इस निबंध में भारत को लेकर लेनिन के अलग-अलग लेखों और विचारों का तारीखवार एक सहज परिचय प्रस्तुत किया गया है। यह लेख कोई विश्लेषण न होकर, समय के साथ लिखे गए उनके विचारों का एक संकलन है।
(एक) वर्ष 1900 का लेख: 'द वॉर इन चाइना'
वर्ष 1900 में लिखे गए लेख 'द वॉर इन चाइना' (चीन में युद्ध) में साम्राज्यवाद और पराधीन देशों की स्थिति को लेकर एक स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आता है। साम्राज्यवाद पर अपनी विस्तृत थीसिस लिखने से बहुत पहले ही लेनिन ने इस रचना में यह टिप्पणी कर दी थी कि तेजी से विकसित होने वाले पूंजीवादी देश भारी मुनाफा कमाने के लिए नए उपनिवेशों की तलाश कर रहे हैं और पिछड़े देशों को अपने अधीन बना रहे हैं। इसी लालच और साम्राज्यवादी भूख के कारण ये पूंजीवादी देश उपनिवेशों में अपनी सेनाएँ भेज रहे हैं और युद्ध करवा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ बगावत और मौतें लगातार बढ़ रही हैं। इसी महत्वपूर्ण निबंध में लेनिन ने पहली बार भारतीय जनता के विद्रोह और दक्षिण अफ्रीका के 'बोअर युद्ध' का विशेष रूप से स्मरण किया था।
[द वॉर इन चाइना (The War in China): 1900 में लेनिन द्वारा लिखित लेख, जिसमें चीन में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की आलोचना की गई थी।]
[बोअर युद्ध (Boer War): दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य और बोअर (डच/हॉलेन्ड मूल के निवासियों) के बीच लड़ा गया भीषण युद्ध। 'बोअर युद्ध' दो चरणों में लड़ा गया था: प्रथम बोअर युद्ध (16 दिसंबर 1880 – 23 मार्च 1881) और द्वितीय बोअर युद्ध (11 अक्टूबर 1899 – 31 मई 1902) । मुख्य रूप से यह लड़ाई दक्षिण अफ्रीका की धरती, राजनीतिक वर्चस्व और वहां मिले सोने व हीरे के विशाल भंडारों पर नियंत्रण हासिल करने के लिए लड़ी गई थी। ]
(दो) क्रांति से पहले के विचार
रूस की महान नवंबर क्रांति (1917) से बहुत पहले और साम्राज्यवाद पर अपना मूल सिद्धांत गढ़ने से पूर्व ही लेनिन उपनिवेशों और गुलाम देशों में घट रही घटनाओं से पूरी तरह अवगत थे। इन देशों के मुक्ति-संग्राम के लिए रणनीतिक दिशा-निर्देश उनकी क्रांति से पहले की रचनाओं में भी मिलते हैं। लेनिन ने यूरोप के विकसित पूंजीवादी और साम्राज्यवादी देशों के मजदूरों को यह समझाया कि गुलाम देशों की आजादी के आंदोलन का समर्थन करना उनका अनिवार्य फर्ज है। उनका स्पष्ट मानना था कि भले ही वह आंदोलन राष्ट्रवाद से प्रेरित हो, लेकिन जब कोई गुलाम देश अपनी गुलामी के खिलाफ लड़ता है, तो उसका मूल स्वभाव लोकतांत्रिक और न्यायसंगत होता है - और इसीलिए हमें उसका बिना शर्त समर्थन करना चाहिए। (संग्रहित रचनावली, खंड 20, पृष्ठ 412)
(तीन) अंग्रेजों की चालबाजी और भारत का शोषण
ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) के साम्राज्यवादी हथकंडों और ब्रिटिश मजदूर वर्ग को गुमराह करने की उनकी रणनीतियों के खिलाफ लेनिन ने बार-बार गंभीर चेतावनियाँ दी थीं। इस विषय पर उनकी दो महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं - 'द इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस इन स्टुटगार्ट' और 'कॉन्फ्रेंस ऑफ द ब्रिटिश सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी'। 18 से 24 अगस्त 1907 तक आयोजित स्टुटगार्ट कांग्रेस का एक प्रमुख एजेंडा औपनिवेशिक प्रश्न था। इस कांग्रेस को संबोधित करते हुए लेनिन ने कहा था - "ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग अंग्रेजी मजदूरों की तुलना में भारत और अन्य उपनिवेशों के लाखों लोगों से कहीं अधिक मुनाफा कमा रहा है।" इसी भारी मुनाफे के बल पर ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग अपने देश के मजदूरों को झूठे और अंधे राष्ट्रवाद में डुबोकर रखता है। वर्ष 1908 में लिखे गए दूसरे निबंध ('कॉन्फ्रेंस ऑफ द ब्रिटिश सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी') में लेनिन ने आगे लिखा कि ब्रिटिश नौसेना का बजट असीम रूप से बढ़ता जा रहा है क्योंकि वे अपने उस साम्राज्य की रक्षा कर रहे हैं जिसमें भारत भी शामिल है। तीस करोड़ की आबादी वाले इस देश को ब्रिटिश नौकरशाही बेरहमी से लूट रही है और तबाह कर रही है। स्थिति यह है कि ब्रिटेन के तथाकथित 'ज्ञानदीप्त' और उदारवादी नेता या 'रैडिकल' मोर्ले जैसे लोग भी, भारत के लोगों को राजनीतिक अपराधों के झूठे आरोप में देश निकाला दे रहे हैं या गंभीर सजाएँ दे रहे हैं।
[स्टुटगार्ट (Stuttgart): जर्मनी का एक शहर, जहाँ 1907 में 'अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस' आयोजित हुई थी।]
(चार) एशिया की जागृति ('द अवेकनिंग ऑफ एशिया')
नवंबर 1905 से 'द्वितीय इंटरनेशनल' के सोशलिस्ट ब्यूरो के सदस्य के रूप में लेनिन ने औपनिवेशिक देशों और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अपना दृष्टिकोण एक प्रमुख निबंध 'द अवेकनिंग ऑफ एशिया' (एशिया की जागृति) में व्यक्त किया। इस लेख में उन्होंने 1905 की रूसी क्रांति के प्रभावों का गहरा विश्लेषण करते हुए यह दर्शाया कि इस क्रांति का एशिया के पराधीन (गुलाम) देशों और उनके मुक्ति-संघर्षों पर कितना व्यापक व सकारात्मक असर पड़ा था।
[द्वितीय इंटरनेशनल (Second International): 1889 से 1916 तक सक्रिय समाजवादी और श्रमिक पार्टियों का संगठन।]

(पांच) बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी और बंबई की हड़ताल (1908)
सन 1908 में जब अंग्रेजों ने भारत की आवाज दबाने के लिए 'समाचार पत्र कानून' बनाया और राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधर तिलक को गिरफ्तार करके छह साल की कड़ी सजा दी, तो पूरे देश में गुस्सा फैल गया। इसके विरोध में बंबई (मुंबई) के मजदूरों ने लगातार छह दिन तक ऐतिहासिक हड़ताल की थी। इन घटनाओं के महत्व का विश्लेषण करते हुए लेनिन ने लिखा था।
वर्ष 1908 में ब्रिटिश सरकार ने देश के उभरते जन-आंदोलन को कुचलने के लिए 'समाचार पत्र अधिनियम' पारित किया। चारों तरफ दमनचक्र शुरू हो गया। इस कानून के तहत राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधर तिलक को गिरफ्तार किया गया। अपनी पक्ष में सफाई देते हुए तिलक ने जो बयान दिया, उसने देश-विदेश में भारी हलचल मचा दी। इसके बावजूद तिलक को जुर्माने के साथ छह साल की सजा सुनाई गई। इसके विरोध में 23 जुलाई से राजनीतिक हड़ताल शुरू हुई। बंबई के मजदूर वर्ग ने इसमें भारी हिस्सा लिया। छह दिनों तक हड़ताल चली। सभी स्तरों के लोग आगे आए। इन घटनाओं के महत्व का विश्लेषण करते हुए लेनिन ने लिखा - “स्वतंत्र ब्रिटेन के सर्वश्रेष्ठ उदारवादी और रैडिकल प्रतिनिधि, रूसी और गैर रूसी कैडेटों के आदर्श, 'प्रगतिशील' पत्रकारिता के प्रकाशपुंज (वास्तव में पूंजीवाद के पिट्ठू) जॉन मोर्ले (भारत के तत्कालीन राज्य सचिव - लेखक) जैसे लोग भी जब भारत पर शासन करने की कमान संभालते हैं तो वे ठीक-ठाक चंगेज खान बन जाते हैं। अपनी अधीन जनता को शांत करने के लिए वे किसी भी संभावित तरीके, यहाँ तक कि राजनीतिक विरोधियों को कोड़े मारने की अनुमति देने में भी संकोच नहीं करते।” यह स्थिति का एक पहलू था, और दूसरे पहलू को लेकर भी लेनिन पूरी तरह आशावादी थे। उन्होंने लिखा - “भारतीय लोकतंत्रवादी तिलक के खिलाफ ब्रिटिश लोमड़ियों ने जो जघण्य सजा सुनाई - उन्हें लंबी अवधि के देश निकाला की सजा दी गई - और अभी हाल ही में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के एक सवाल से यह उजागर हुआ कि भारतीय जूरी सदस्य रिहाई के पक्ष में थे और सजा ब्रिटिश जूरी सदस्यों के वोटों से पारित हुई। लोकतंत्रवादियों पर धनपतियों के नौकरों के इस प्रतिशोध ने बंबई में जुलूस और हड़ताल को जन्म दिया। भारत में भी सर्वहारा वर्ग पहले से ही एक जागरूक राजनीतिक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है और इस पृष्ठभूमि में भारत की रूसी शैली वाली ब्रिटिश सरकार का पतन निश्चित है।” ('इन्फ्लेमेटेबल मटेरियल इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स')
[समाचार पत्र अधिनियम, 1908 (Newspapers Act, 1908): भारतीय राष्ट्रवादी प्रेस का दमन करने के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कठोर कानून।]
[इन्फ्लेमेटेबल मटेरियल इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स (Inflammable Material in World Politics): 1908 में लेनिन द्वारा लिखित लेख, जिसमें तिलक की गिरफ्तारी और बंबई/बॉम्बे हड़ताल का उल्लेख है।]
[जॉन मोर्ले (John Morley): 1905 से 1910 तक भारत के तत्कालीन ब्रिटिश राज्य सचिव (Secretary of State for India)।]
(छह) प्रथम विश्व युद्ध और भारत का संघर्ष (1914–1918)
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) की परिस्थितियों में साम्राज्यवादी युद्ध के विरोध के साथ-साथ पराधीन उपनिवेशों के न्यायसंगत युद्ध के समर्थन में लेनिन आगे आए। उन्होंने साम्राज्यवादी युद्ध और उपनिवेश के मुक्ति युद्ध के बीच न्यायसंगत सीमा रेखा भी खींची। इस दौरान कई लेखों जैसे 'द यूरोपियन वॉर एंड इंटरनेशनल सोशलिजम' (नोट्स), 'सोशलिजम एंड वॉर', 'ए कैरिकेचर ऑफ मार्क्सइज्म एंड इंपीरियलिस्ट इकोनॉमिज्म' आदि निबंधों और कई पत्रों में उन्होंने तुर्की, फारस, चीन और भारत के न्यायसंगत संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके महत्व का विश्लेषण किया। इस दौरान एक पत्र में (एलेक्जेंड्रा कोलोनताई / 1915) उन्होंने लिखा - “मुझे लगता है कि सैद्धांतिक रूप से यह भ्रमित करने वाला और व्यवहार में हानिकारक है कि दो प्रकार के युद्धों में अंतर न समझा जाए। राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों का विरोध करना हमारा काम नहीं है। वर्तमान युग की मुख्य घटना उपनिवेशों के बँटवारे के लिए और छोटी ताकतों को अपने वश में करने के लिए बड़ी ताकतों की लड़ाई है। भारत, फारस, चीन और अन्य देशों का संघर्ष क्या अंग्रेजों के खिलाफ, रूसियों के खिलाफ नहीं है? क्या हम अंग्रेजों के खिलाफ भारत के पक्ष में नहीं हैं?”
[अलेक्जेंड्रा कोलोनताई (Alexandra Kollontai): प्रमुख रूसी क्रांतिकारी, मार्क्सवादी और सोवियत संघ की प्रमुख कूटनीतिज्ञ। जून 1915 में नारीवादी एलेक्जेंड्रा कोलोनताई ने मेंशेविक पार्टी छोड़ दी और आधिकारिक तौर पर बोल्शेविक पार्टी में शामिल हो गईं।, क्योंकि बोल्शेविक युद्ध के सख्त खिलाफ थे। प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद से ही उन्होंने साम्राज्यवादी युद्ध की तीखी आलोचना की और इसके खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। 1915 में स्वीडन से निकाले जाने के बाद, वह नॉर्वे के ओस्लो चली गईं और वहां समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर युद्ध विरोधी अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने युद्ध और पूंजीवाद के खिलाफ कई राजनीतिक पर्चे और लेख लिखे (जैसे: "Who Needs the War?" यानी "युद्ध की जरूरत किसे है?")।]
(सात) आत्मनिर्णय का अधिकार
'इंपीरियलिज्म एंड द राइट ऑफ नेशंस टू सेल्फ डिटरमिनेशन' निबंध में लेनिन ने बार-बार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रसंगों को उठाया है। जिसमें गर्व के साथ उल्लेख किया गया था - “समाजवादियों को जनता के सामने यह स्पष्ट रूप से कहने की जरूरत है कि अंग्रेजी समाजवादी आयरलैंड या भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष नहीं करते, वे केवल जुबान से समाजवादी और अंतरराष्ट्रीयवादी हैं, असल में वे उग्र राष्ट्रवादी और दूसरे राज्यों को लूटने वाले हैं।”
(आठ) भारत की गरीबी का अध्ययन
'साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की सर्वोच्च अवस्था' नामक ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना की तैयारी में लेनिन ने बहुत ही कठिन और परिश्रमी तरीके से साम्राज्यवादी दुनिया की आर्थिक-राजनीतिक-वैचारिक स्थिति का विश्लेषण करने के लिए जर्मन, अंग्रेजी, रूसी आदि कई भाषाओं में लिखित संबंधित विषयों की पुस्तकों, निबंधों और पत्रिकाओं का अध्ययन किया था। (लगभग 148 पुस्तकें, 232 निबंध, 49 पत्रिकाएँ)। एक विज्ञान शोधकर्ता की तरह इस चरण में उनके नोट्स में से दो यहाँ उल्लेखनीय हैं: जे. ए. हॉब्सन द्वारा लिखित 'इंपीरियलिज्म' और जी. वैगनर द्वारा लिखित 'इंडिया टुडे'। पहले ग्रंथ से लेनिन ने भारत के किसानों की भीषण गरीबी के विषय में रुचि दिखाई। दूसरे निबंध में लेनिन ने साम्राज्यवादी शासन में भारत की सामान्य स्थिति का एक चित्र अपनी टिप्पणियों के साथ नोट किया। एक उदाहरण, भारत में अंग्रेजों द्वारा संचालित शिक्षा व्यवस्था के परिणाम के रूप में एक वर्ग के बुद्धिजीवियों के उभरने पर लेखक (वैगनर) की टिप्पणी— "बुद्धिजीवी वर्ग के ये सर्वहारा लोग बहुत ही घटिया किस्म के और राजनीतिक रूप से भी बहुत टेढ़े स्वभाव के हैं।" इस उद्धरण के ठीक बगल में लेनिन की टिप्पणी थी— “यह लेखक एक प्रतिक्रियावादी बदमाश है।”
[साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की सर्वोच्च अवस्था (Imperialism, the Highest Stage of Capitalism): लेनिन की 1917 की कालजयी पुस्तक, जिसमें साम्राज्यवाद के आर्थिक व राजनीतिक स्वरूप का विश्लेषण है।]
[जे. ए. हॉब्सन (J. A. Hobson): अंग्रेज अर्थशास्त्री और लेखक, जिन्होंने साम्राज्यवाद पर आलोचनात्मक अध्ययन किया। जी. वैगनर (G. Wegener): जर्मन लेखक/भूगोलवेत्ता, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत की सामाजिक स्थिति पर पुस्तकें लिखीं।]
(नौ) रूसी क्रांति के बाद भारतीय क्रांतिकारियों का रूस जाना
महान नवंबर क्रांति के नगाड़े ने सभी पराधीन जातियों को जगा दिया और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय कर दिया। भारत भी इसका अपवाद नहीं था। कॉमरेड लेनिन के साथ सीधे संपर्क और सलाह के लिए कई भारतीय क्रांतिकारी उस समय आगे आए थे। लेनिन ने भी पहली सर्वहारा क्रांति के नेता के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। 1917 के अंत में दिल्ली में आयोजित मुस्लिम राष्ट्रवादी सभा में रूसी क्रांति का अभिनंदन करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया और सत्तार तथा जब्बार नामक खैरी बंधु इस प्रस्ताव को लेकर मास्को गए। लेनिन ने इन प्रतिनिधियों का स्वागत किया। 1918 में अंतरिम भारत सरकार (काबुल) के राष्ट्रपति महेंद्र प्रताप और बाद में बरकतुल्लाह मास्को गए। लेनिन ने इस दल का भी स्वागत किया। इसके अलावा विभिन्न विचारों के भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, युद्ध से लौटे सैनिक, प्रवासी भारतीय उस समय रूस गए थे और लेनिन के नेतृत्व में पहले सर्वहारा राज्य के विशाल कार्यों को देखा था, जिसका प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर पड़ा था।
[राजा महेंद्र प्रताप (Raja Mahendra Pratap): भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और 1915 में काबुल में गठित भारत की पहली अस्थायी भारत सरकार (Provisional Government of India) के राष्ट्रपति। मौलवी बरकतुल्लाह (Maulana Barkatullah): स्वतंत्रता सेनानी और काबुल की अस्थायी भारत सरकार के प्रधानमंत्री।]
[मॉस्को (Moscow): रूस और तत्कालीन सोवियत संघ की राजधानी।]
(दस) एशिया के लोगों की एकता
सोवियत क्रांति के बाद लेनिन ने अपनी विभिन्न रचनाओं, भाषणों और साक्षात्कारों में एशिया के पराधीन देशों और भारत के आंदोलन के बारे में सोवियत कम्युनिस्टों के दृष्टिकोण का उल्लेख किया है। इस समय का एक महत्वपूर्ण भाषण है - 'एड्रेस टू द सेकंड ऑल रशिया कांग्रेस ऑफ कम्युनिस्ट ऑर्गेनाइजेशंस ऑफ पीपल्स ऑफ द ईस्ट'। जहाँ बिना किसी संकोच के घोषणा की गई - “सोवियत गणतंत्र पूर्व दुनिया की तमाम जागृत जनता के साथ एकनिष्ठ होकर अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करेगा।” और ठीक इसी समय में भारत में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आयोजित एक सभा में (काबुल में) पारित शुभकामना संदेश के उत्तर में लेनिन ने 'भारत के क्रांतिकारी एसोसिएशन' के लिए एक अभिनंदन संदेश भेजा। वह रेडियो के माध्यम से प्रसारित किया गया था। जिसके बीच उन्होंने घोषणा की थी, “हम (भारत में) मुस्लिम और गैर-मुस्लिम जनता की एकता का अभिनंदन करते हैं। पूर्वी-दुनिया के सभी देशों में यह एकता विस्तारित हो। जब भारतीय, चीनी, कोरियाई, जापानी, फारसी और तुर्क मजदूर और किसान हाथ से हाथ मिलाकर मुक्ति के एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होंगे, तभी शोषकों के खिलाफ निश्चित विजय संभव होगी। मुक्त एशिया दीर्घजीवी हो।”
[काबुल (Kabul): अफ़गानिस्तान की राजधानी, जहाँ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय क्रांतिकारियों ने निर्वासित भारत सरकार और क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बनाया था।]
(ग्यारह) कम्युनिस्ट इंटरनेशनल और भारत
कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी कांग्रेस 19 जुलाई से 7 अगस्त 1920 तक आयोजित हुई थी। इस कांग्रेस के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक राष्ट्रीय और औपनिवेशिक प्रश्न था। इस से संबंधित आयोग की रिपोर्ट और पारित मूल दस्तावेज की रचना में लेनिन ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस कांग्रेस में भारत के प्रतिनिधि एम. एन. राय (मानवेन्द्रनाथ राय) के भाषण को लेकर विवाद पैदा हो गया। भारत के राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के चरित्र, उनकी विचारधारा (गांधीवाद), स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका और प्रभाव के बारे में राय का दृष्टिकोण एकतरफा और संकुचितता के दोष से दूषित था। लेनिन ने इस संकुचित दृष्टिकोण का विरोध किया और प्रतिनिधियों की मंजूरी से 'राय' की थीसिस में संशोधन करवा दिया। स्वतंत्र रूप से सर्वहारा पार्टी, सर्वहारा आंदोलन और सर्वहारा नेतृत्व के प्रयासों के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंच में भी भाग लेने की आवश्यकता की याद दिलाई। श्री 'राय' का एक और भ्रामक सिद्धांत यह था कि भारत में मुख्य संघर्ष भारत के बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ है क्योंकि भारत का बुर्जुआ वर्ग स्वतंत्र रूप से विकसित हो रहा है और होता रहेगा, जबकि दूसरी तरफ साम्राज्यवाद अपना औपनिवेशिक शासन इन्हीं के हाथों में सौंप देगा (डिकलोनाइजेशन)। लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने इस सिद्धांत के खिलाफ भी भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी मुक्तिसंग्राम के नेतृत्व को सही दिशा-निर्देश प्राप्त करने में मदद की, जिसके प्रमुख रचनाकार लेनिन थे। भारत के कम्युनिस्टों की स्वतंत्रता आंदोलन की कार्यनीति और कार्यकुशलता की रचना में इसने भारी प्रेरणा दी।
[कम्युनिस्ट इंटरनेशनल / कॉमिन्टर्न (Communist International / Comintern): लेनिन द्वारा 1919 में स्थापित विश्वभर की कम्युनिस्ट पार्टियों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन।]
[एम. एन. राय (Manabendra Nath Roy / मानवेन्द्रनाथ राय): भारतीय क्रांतिकारी, कम्युनिस्ट नेता और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के शुरुआती प्रमुख सदस्यों में से एक।]
(बारह) जालियाँवाला बाग और पंजाब का गुस्सा
22 जून से 12 जुलाई 1921 तक कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की तीसरी कांग्रेस में भी लेनिन ने उपनिवेशों के संघर्ष के बारे में अपने भाषण में उल्लेख किया। भारत का प्रसंग भी वहाँ आया। तब यह देश जालियाँवाला बाग की नृशंस घटना से सुलग रहा था। लेनिन ने पंजाब की घटना का गहराई से अनुसरण करते हुए लिखा था - “ब्रिटिश भारत इन सभी देशों का सिरमौर है। जहाँ एक तरफ क्रांति परिपक्व हो रही है, उद्योग और सर्वहारा वर्ग की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ अंग्रेज बर्बर आतंक की मात्रा भी बढ़ा रहे हैं; वे हर बार की तुलना में बार-बार नरसंहार (अमृतसर) और जनता पर कोड़े बरसाने का सहारा ले रहे हैं।”
(तेरह) डॉ. भूपेंद्रनाथ दत्त और किसान आंदोलन
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रगतिशील नेता डॉ. भूपेंद्रनाथ दत्त ने एतद्देशीय स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित एक थीसिस 1921 में लेनिन को दी थी। लेनिन ने उसे पढ़ा और श्री दत्त को उसका उत्तर दिया। जिसमें लेनिन ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी कांग्रेस के निर्णयों का ही पालन करने का अनुरोध किया और भारत के किसान आंदोलन के महत्व के बारे में भी लेनिन के दृष्टिकोण का संकेत मिलता है। उन्होंने श्री दत्त से एतद्देशीय किसान संगठन की रिपोर्ट भेजने का अनुरोध किया।
[डॉ. भूपेंद्रनाथ दत्त (Dr. Bhupendranath Datta): भारतीय क्रांतिकारी, समाजशास्त्री तथा स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई।]
(चौदह) मालाबार का किसान विद्रोह
उस समय के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता अवनी मुखर्जी ने मालाबार क्षेत्र के किसान विद्रोह की घटना से युक्त एक निबंध 1921 में लेनिन को भेजा। लेनिन ने निबंध पढ़ा और कॉमरेड बुखारिन (प्रावदा के संपादक) को भेजा तथा भारत से इस तरह के और अधिक निबंध भेजने का आग्रह करने के लिए बुखारिन से अनुरोध किया। लेनिन का उद्देश्य भारत के बारे में अधिक खबरें जुटाना और भारत के कम्युनिस्टों को और अधिक प्रोत्साहित करना था।
[अवनी मुखर्जी (Abani Mukherji): भारतीय सह-क्रांतिकारी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1920, ताशकंद) के सह-संस्थापक।]
[निकोलाई बुखारिन (Nikolai Bukharin): प्रमुख सोवियत कम्युनिस्ट नेता, विचारक और सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक और प्रमुख सोवियत समाचार पत्र 'प्रावदा' (Pravda) के संपादक।]
[मालाबार (Malabar): केरल का तटीय क्षेत्र, जहाँ 1921 में प्रसिद्ध 'मोपला/मालाबार किसान विद्रोह' हुआ था।]
(पंद्रह) लेनिन के अंतिम विचार
जीवन के अंतिम चरण की विभिन्न रचनाओं में उन्होंने पराधीन देशों और भारत के बारे में कई उल्लेख और विश्लेषण किए हैं। 'प्रावदा' समाचार पत्र के दसवें वार्षिकोत्सव समारोह (मई 1922) का भाषण भी इसका गवाह है। इस संबंध में संभवतः उनकी अंतिम रचना 'कम में बेहतर' (मार्च 1923) नामक निबंध है। जहाँ उन्होंने उल्लेख किया था -
“रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा। पिछले कुछ वर्षों में यह बहुसंख्यक आबादी बहुत तेजी से मुक्तिसंग्राम की भागीदार बनने लगी है।”
[ 'कम में बेहतर' (Better Fewer, But Better): 1923 में प्रकाशित लेनिन के अंतिम महत्वपूर्ण निबंधों में से एक।]

स्रोत: मार्क्सवादी पथ (Marksbadi Path) बांग्ला में प्रकाशित होनेवाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की एक वैचारिक पत्रिका है। 'मार्क्सवादी पथ', वर्ष 1983, अगस्त में में यह आलेख प्रकाशित है। 'मार्क्सवादी पथ' का यह अंक आप मार्क्सवादी पथ वेबसाइट के आर्काइव सेक्शन से प्राप्त कर सकते हैं। पुनः प्रकाशित : 11 अक्टूबर 2026।.
[कमेंट्स] मूल बांग्ला-लेख का हिस्सा नहीं है। पाठकों के संदर्भ-संज्ञान के उद्येश्य से [कमेंट्स] जोड़े गए हैं। - वाम की आवाज
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