उत्तर प्रदेश के पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा सामने आया है, जहां एक ही पहचान संख्या पर 13 हजार से अधिक प्रविष्टियां दर्ज पाई गईं। चुनाव आयोग के निर्देश पर एफआईआर दर्ज होने के बावजूद, योगी सरकार द्वारा आरोपी अधिकारियों को निलंबित करने की बजाय पहले नई तैनाती देना और फिर किरकिरी होने पर प्रतीक्षारत करना गंभीर मिलीभगत की ओर इशारा करता है। पिछले चुनाव में जीत का मामूली अंतर और प्रभावित मतदाताओं का बहुसंख्यक अल्पसंख्यक होना इस सुनियोजित खेल के राजनीतिक निहितार्थों को साफ उजागर करता है। वोटर सूची में बड़े पैमाने पर धांधली और आरोपियों पर सरकारी मेहरबानी ने उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश सीपीआई(एम) राज्य समिती के सदस्य नवाबउद्दीन ने इस रिपोर्ट के जरिए प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग और लोकतंत्र पर मंडराते खतरे को बेनकाब किया है।
मतदाता सूची में फर्जीवाड़ा
13 हजार वोटरों की पहचान से छेड़छाड़ पर गरमाई सियासत
दोनों आरोपी अधिकारियों पर मेहरबान योगी सरकार!
~नवाब उद्दीन~
उत्तर प्रदेश, पीलीभीत। पीलीभीत की सदर विधानसभा सीट से मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर धांधली का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां एक ही पहचान संख्या (EPIC नंबर) पर अलग-अलग नाम और पिता के नाम दर्ज करके करीब 13 हजार से ज्यादा मतदाताओं की प्रविष्टियों के साथ खिलवाड़ किया गया। जब यह गंभीर मामला उजागर हुआ, तो राजनीतिक दलों ने इस पर कड़ा एतराज जताते हुए चुनाव आयोग से निष्पक्ष जांच की मांग की।
आकड़ों की जुबानी: फर्जीवाड़े की पूरी दास्तान
रिपोर्ट्स के मुताबिक, गत 31 मई से 29 अगस्त के बीच कुल 13,779 फॉर्म-8 दर्ज किए गए थे। इनमें से 10,470 फॉर्म मंजूर कर लिए गए और 3,309 अस्वीकार किए गए। हैरानी की बात यह है कि जांच के दौरान मंजूर किए गए सभी 10,470 आवेदनों में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि निर्वाचन कार्यालय में इन आवेदनों के मूल फॉर्म और उनसे जुड़े जरूरी दस्तावेज तक गायब मिले।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इसे कोई आम मानवीय भूल या तकनीकी खराबी मानने से साफ इनकार करते हुए इसे जानबूझकर किया गया गंभीर अपराध करार दिया है। उनके अनुसार, न तो चुनाव आयोग का सिस्टम हैक हुआ था और न ही कोई सर्वर की तकनीकी गड़बड़ी थी। कंप्यूटर ऑपरेटर ने बिना किसी वास्तविक आवेदन के ही फॉर्म-8 की एंट्री धड़ल्ले से दर्ज कर दीं और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) ने बिना जांचे-परखे उन्हें स्वीकार भी कर लिया।
कानूनी कार्रवाई के बाद भी अधिकारियों पर मेहरबानी
इस गंभीर मामले में गत 22 अक्टूबर को पूर्व SDM हेमंत कुमार चौधरी, मयंक गोस्वामी और कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 और भारतीय न्याय संहिता की धारा 201 के तहत FIR दर्ज की गई। कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवा तुरंत समाप्त कर दी गई और दोनों अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए गए।
लेकिन, इसके बाद योगी सरकार की भूमिका पर सबसे बड़े और गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं:
निलंबन के बजाय नई तैनाती: इतनी बड़ी गड़बड़ी और आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के बावजूद दोनों SDM को निलंबित करने के बजाय मलाईदार नई पोस्टिंग दे दी गई। 30 अक्टूबर को जारी PCS तबादला सूची में हेमंत कुमार चौधरी को राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में OSD और मयंक गोस्वामी को चकबंदी मुख्यालय, लखनऊ में बंदोबस्त अधिकारी बना दिया गया।
चौतरफा घिरने के बाद एक्शन: जब इस पक्षपातपूर्ण रवैये को लेकर सरकार की चारों तरफ किरकिरी होने लगी, तब मजबूरन दोनों अधिकारियों को 'प्रतीक्षारत' (वेटिंग लिस्ट) करना पड़ा।
जिलाधिकारियों से जवाब-तलब और कंप्यूटर ऑपरेटरों की आईडी निरस्त
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए पीलीभीत के वर्तमान जिला निर्वाचन अधिकारी आलोक कुमार और पूर्व जिला निर्वाचन अधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह से भी मतदाता सूची के प्रबंधन व निगरानी को लेकर स्पष्टीकरण तलब किया है।
बढ़ती आलोचना के बीच मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिलों में तैनात कंप्यूटर ऑपरेटरों की लॉगिन आईडी को भी तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है और सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। हालांकि, जमीन पर इनका कितना असर होगा, यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि उत्तर प्रदेश में निचले स्तर के प्रशासनिक अमले का सत्ताधारी दल द्वारा खुलकर राजनीतिक दुरुपयोग होना एक आम बात बन चुकी है।
लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता पर बड़ा खतरा
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की मतदाता सूचियों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता की पोल खोलता है। मतदाताओं के नाम और उनकी पहचान के साथ इस तरह की छेड़छाड़ सीधे तौर पर उनके मताधिकार पर हमला है। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोकतंत्र की सेहत के लिए एक बड़ा खतरा है। इस सुनियोजित फर्जीवाड़े के पीछे किसी बड़े संगठित षड्यंत्र की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
चुनावी नफा-नुकसान का गणित
इस पूरे मामले का एक बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है: पिछले विधानसभा चुनाव में पीलीभीत सदर सीट पर भाजपा की जीत का अंतर महज 6,970 वोट था। दूसरी ओर, मौजूदा फर्जीवाड़े की जद में 13 हजार से अधिक मतदाता प्रविष्टियां आई हैं। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि प्रभावित होने वाले इन मतदाताओं में एक बहुत बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखता है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मतदाताओं के नाम और पहचान में इस तरह के फेरबदल से आखिरकार किसे राजनीतिक फायदा पहुँचाने की कोशिश की जा रही थी? जीत का यह मामूली अंतर और प्रभावित मतदाताओं की भारी संख्या इस पूरे घोटाले की असल मंशा को समझने के लिए काफी है।
न्याय की उम्मीद कहाँ से हो?
अब सवाल यह उठता है कि क्या योगी सरकार इन दोनों SDM, साथ ही वर्तमान और पूर्व जिला निर्वाचन अधिकारियों की जवाबदेही तय करेगी? क्या इस 'वोट चोरी' के असली चेहरों को बेनकाब कर निष्पक्ष जांच कराई जाएगी, या फिर लीपापोती कर के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
लेकिन जब लोकतंत्र के इस पावन पर्व और वोट की सुरक्षा में ही सत्ताधारी दल की संलिप्तता के गंभीर आरोप लग रहे हों, तो आम जनता आखिरकार निष्पक्ष न्याय की उम्मीद किससे करे?
लेखक उत्तर प्रदेश सीपीआई(एम) राज्य समिती के सदस्य हैं।
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