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प्रकाशित: 10 अप्रैल 2026 • 3 मिनट पठन
1857 के विद्रोह में एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू है, हिंदू–मुस्लिम एकता। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही वर्गों पर ब्रिटिश शासन की नीतियां आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से प्रतिकूल थीं। दोनों समुदायों को कर, जमीन संबंधी दमन और धार्मिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा। इस साझा अनुभव ने एकता की आधारशिला रखी। यह भी महत्वपूर्ण था कि बंगाल की आर्मी में विभिन्न जातियों से सम्बंधित हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो के सैनिक थे। यह हिन्दू मुस्लिम एकता का आधार बना जो इससे पहले नहीं देखा गया था। जैसे हिन्दू और मुस्लिम सिपाही एक साथ मिल कर लड़े उसी तरह हिन्दू और मुस्लिम तालुकदार और राजा भी एकजुट हुए। सामान्य नागरिक, हिन्दू और मुस्लिम दोनों ने मिल कर बहादुरी के साथ अंग्रेजो के खिलाफ लड़े और अंग्रेजों के दमन का सामना लिया।
02 जुलाई 2026

" फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है; यह यादों, प्रतिशोध, उम्मीदों और एक नया इतिहास लिखने का एक कभी न खत्म होने वाला नाटक है।"
सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य
18 जून 2026

दुनिया भर में बाल श्रमिकों का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र (खेती-बाड़ी) में कार्यरत है। कुल बाल श्रमिकों में से लगभग 60 प्रतिशत बच्चे कृषि कार्यों से जुड़े हैं। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) में लगभग 27 प्रतिशत और खनन (माइनिंग), निर्माण (कंस्ट्रक्शन) समेत अन्य उद्योगों में लगभग 13 प्रतिशत बच्चे काम करते हैं।
13 जून 2026

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के दबे हुए पन्नों को जिंदा करने के लिए बनाई जाती हैं। निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम: घल्लूघारा / पंजाब '95) एक ऐसी ही फिल्म है। यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई अनुभव नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास और समकालीन भारतीय राजनीति का एक ऐसा विस्फोटक कोलाज है, जिसने सेंसरशिप से लेकर नेशनल सिक्योरिटी (राष्ट्रीय सुरक्षा) तक की कई बहसों को दोबारा जिंदा कर दिया है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 जुलाई 2026

फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है।
इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।
“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।
केशव कुमार भट्टड़ • 24 जून 2026

यह तथ्य अत्यंत दुखद और विचारणीय है कि इतने गहन शोध, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक और इरफ़ान ख़ान जैसे शानदार अभिनेता की कलात्मक निष्ठा से निर्मित यह ऐतिहासिक फिल्म धरोहर आज प्रसार भारती (दूरदर्शन) के अभिलेखागारों (Archives) में कहीं धूल फाँक रही है। अफसर ना सुनते हैं, ना सुध लेते हैं , यहाँ तक कि अनगिनत पत्राचार और सुझावों के बावजूद इसे किसी भी डिजिटल या प्रसारण माध्यम पर उपलब्ध कराया जाना तो दूर की बात , ई-मेल और पत्रों का जबाब तक नहीं मिलता- छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त , अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक गुलबहार सिंह ने दुखी मन से बताया - यह एक गहरे अनैतिक - प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक - अपराध के समान है।
आज के दौर में जब मुख्यधारा के मीडिया और फ़िल्मों का एक बड़ा वर्ग समाज में वैमनस्य, नफ़रत, शोर और विभाजन फैलाने का औजार बनता जा रहा है, डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रेमचंद – एक जीवन’ यह सिद्ध करती है कि धर्म, भाषा और संस्कृति कभी भी भारतीय जनमानस में नफ़रत का आधार नहीं रहे हैं। फ़िल्म का हर फ्रेम सादगी में भव्यता की कहानी कहता है और एक शांत, गंभीर, कल-कल बहती नदी की तरह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। निर्माण के दौरान निर्देशक गुलबहार सिंह को जिस सुकून और निर्झर आनंद की अनुभूति हुई होगी, वह इस फ़िल्म के एक-एक फ्रेम में छलकती है। यह फ़िल्म देश के प्रत्येक स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक मंचों पर अनिवार्य रूप से दिखाई जानी चाहिए। प्रसार भारती को अविलंब इस अमूल्य धरोहर को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि देश की नई पीढ़ी प्रेमचंद के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के सपने से जुड़ सके।
केशव कुमार भट्टड़ • 05 अगस्त 2026
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