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दुनिया में हर 17 बच्चों में से एक बाल श्रमिक

डॉ. अशोक सिंह•13 जून 20263 मिनट पठन39 बार पढ़ा गया

दुनिया भर में बाल श्रमिकों का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र (खेती-बाड़ी) में कार्यरत है। कुल बाल श्रमिकों में से लगभग 60 प्रतिशत बच्चे कृषि कार्यों से जुड़े हैं। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) में लगभग 27 प्रतिशत और खनन (माइनिंग), निर्माण (कंस्ट्रक्शन) समेत अन्य उद्योगों में लगभग 13 प्रतिशत बच्चे काम करते हैं।

दुनिया में हर 17 बच्चों में से एक बाल श्रमिक

दुनिया भर से बाल श्रम को खत्म करने की प्रतिबद्धता के बावजूद, आज भी विश्व में हर 17 बच्चों में से एक बच्चा श्रम (मजदूरी) में लगा हुआ है। भारत में बाल श्रमिकों की संख्या 1 करोड़ को पार कर गई है। 'विश्व बाल श्रम निषेध दिवस' के अवसर पर विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार संस्थाओं द्वारा जारी रिपोर्टों में यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 5 से 14 वर्ष की आयु के बाल श्रमिकों की संख्या 1 करोड़ 1 लाख (10.1 मिलियन) थी। पिछले पंद्रह वर्षों से जनगणना न होने के कारण, वर्तमान में यह संख्या कहाँ तक पहुँच चुकी है, इसका कोई स्पष्ट संकेत नहीं है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में दुनिया भर में लगभग 13 करोड़ 80 लाख बच्चे बाल श्रम में लगे हुए हैं। इनमें से लगभग 5 करोड़ 40 लाख बच्चे बेहद जोखिम भरे और खतरनाक माहौल में काम करने को मजबूर हैं, जो उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा रहा है।

साल 2015 में संयुक्त राष्ट्र (UN) ने 2025 तक बाल श्रम को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य तय किया था। लेकिन वह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। इसके विपरीत, 2021 के आंकड़ों के अनुसार, बाल श्रमिकों की संख्या में 84 लाख की और बढ़ोतरी हुई है। कोविड-19 महामारी के बाद स्थिति और भी बदतर हो गई है।

भारत में कुल बाल श्रमिकों का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक गरीबी, शिक्षा के बुनियादी ढांचे की कमी और सामाजिक असमानता बाल श्रम बढ़ने के मुख्य कारण हैं।

दुनिया भर में बाल श्रमिकों का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र (खेती-बाड़ी) में कार्यरत है। कुल बाल श्रमिकों में से लगभग 60 प्रतिशत बच्चे कृषि कार्यों से जुड़े हैं। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) में लगभग 27 प्रतिशत और खनन (माइनिंग), निर्माण (कंस्ट्रक्शन) समेत अन्य उद्योगों में लगभग 13 प्रतिशत बच्चे काम करते हैं।

यूनिसेफ (UNICEF) के आंकड़ों के अनुसार, 5 से 11 वर्ष की आयु का कोई भी बच्चा यदि सप्ताह में कम से कम एक घंटा भी किसी आर्थिक गतिविधि (कमाई वाले काम) में शामिल रहता है, तो उसे बाल श्रमिक माना जाता है।

12 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए सप्ताह में 14 घंटे आर्थिक कार्य या 21 घंटे बिना वेतन के घरेलू काम की सीमा तय की गई है। वहीं, 15 से 17 वर्ष की आयु के किशोरों के मामले में यदि वे सप्ताह में 43 घंटे से अधिक काम करते हैं, तो उसे बाल श्रम माना जाता है।

दुनिया भर में कुल बाल श्रम का लगभग दो-तिहाई हिस्सा उप-सहारन अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) में केंद्रित है, जहाँ लगभग 8 करोड़ 70 लाख बच्चे बाल श्रम में फंसे हैं। हालाँकि, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि एशिया और प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों में 2020 के बाद बाल श्रम की दर में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट आई है।

आईएलओ (ILO) के महानिदेशक गिल्बर्ट एफ. होंगबो ने कहा, "यह स्थिति किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है। बाल श्रम को रोकने के लिए तुरंत और अधिक प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।"

मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि जब तक गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रसार, कड़े श्रम कानूनों को लागू करना और कमजोर परिवारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं की जाएगी, तब तक बाल श्रम को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति

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प्रकाशित: 13 जून 2026 • 3 मिनट पठन

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केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

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सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।

लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।


केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

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