" फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है; यह यादों, प्रतिशोध, उम्मीदों और एक नया इतिहास लिखने का एक कभी न खत्म होने वाला नाटक है।"
शमीक लाहिड़ी
सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य
जन समाचार मंच
" फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है; यह यादों, प्रतिशोध, उम्मीदों और एक नया इतिहास लिखने का एक कभी न खत्म होने वाला नाटक है।"
सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य

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• शमीक लाहिड़ी विश्व कप के इतिहास में कुछ ड्रॉ ऐसे होते हैं जो हार की तरह चुभते हैं; वहीं कुछ ड्रॉ ऐसे भी होते हैं जिनका जश्न जीत की तरह मनाया जाता है। ह्यूस्टन की शाम पुर्तगाल और डीआर कांगो के बीच 1-1 की बराबरी ने ठीक ऐसी ही एक कहानी लिखी।
कागज़ पर दोनों टीमों के बीच का अंतर बहुत बड़ा था। एक तरफ यूरोप की महाशक्तियों में से एक पुर्तगाल था, जिसके नेतृत्व में क्रिस्टियानो रोनाल्डो विश्व कप के इतिहास में छठी बार मैदान पर उतरे थे। दूसरी तरफ 1974 के बाद पहली बार विश्व कप में वापसी कर रहा डीआर कांगो था — एक ऐसी टीम, जिसे बहुत कम लोगों ने नॉकआउट चरण के संभावित दावेदारों की सूची में रखा था। यह दोनों देशों के इतिहास का पहला अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला भी था।
मैच की शुरुआत में ऐसा लगा कि ताकत के सारे समीकरण सच साबित होंगे। खेल के केवल छठे मिनट में ही जोआओ नेवेस ने गोल करके पुर्तगाल को आगे कर दिया। लाल-हरे रंग की जर्सी वाले खिलाड़ियों के पास गेंद का नियंत्रण था, दीर्घाओं (गैलरी) में रोनाल्डो के नाम के नारे गूंज रहे थे, और मैदान पर यूरोपीय दबदबे की छाप साफ दिख रही थी। लेकिन फुटबॉल की खूबसूरती यही है — आंकड़े हमेशा कहानी का आखिरी सच नहीं होते। फुटबॉल बार-बार साबित करता है कि नाम का वजन और जर्सी का इतिहास हमेशा नतीजे तय नहीं करता।
धीरे-धीरे कांगो मैच में वापस लौटा। उन्होंने अपनी हिचकिचाहट को पीछे छोड़कर खुद को संगठित किया, पुर्तगाल की लय को तोड़ना शुरू किया और जवाबी हमलों में साहस दिखाया। पहले हाफ के इंजरी टाइम (अतिरिक्त समय) में योआने विसा के हेडर से बराबरी का गोल आया। इस गोल ने न सिर्फ स्कोरलाइन बदली, बल्कि यह कांगो के विश्व कप इतिहास का पहला गोल भी था। कुछ ही सेकंड में यह गोल एक पूरे देश की फुटबॉल यादों का हिस्सा बन गया। 1974 के बाद विश्व कप में यह उनकी पहली भागीदारी थी।
दूसरे हाफ में पुर्तगाल ने बार-बार जीत की राह तलाशने की कोशिश की, लेकिन कांगो का डिफेंस डिगा नहीं। रोनाल्डो को चारों तरफ से घेर कर रखा गया, आक्रमण के रास्ते बंद कर दिए गए और अफ्रीका के इन प्रतिनिधियों ने हर एक गेंद के लिए कड़ा संघर्ष किया। अंतिम सीटी बजने के बाद जहां पुर्तगाल के खिलाड़ियों के चेहरे पर निराशा थी, वहीं कांगो के खिलाड़ियों की आंखों में एक परम संतुष्टि की चमक थी।
स्कोरबोर्ड कहेगा कि मैच ड्रॉ रहा। इतिहास शायद यह कहेगा कि 17 जून 2026 वह दिन था, जब डीआर कांगो ने विश्व कप के मंच पर पहली बार खुद को स्थापित किया था। और पुर्तगाल शायद यह सबक लेगा — विश्व कप में कोई भी प्रतिद्वंद्वी छोटा नहीं होता।
क्या पुर्तगाल के कोच रॉबर्टो मार्टिनेज बिना कोई होमवर्क किए मैदान पर आ गए थे? विश्वास नहीं होता। कांगो के कोच सेबेस्टियन देसाब्रे के बारे में उन्हें पता न हो, ऐसा मुमकिन नहीं है। वह यह कैसे भूल गए कि यह फ्रांसीसी कोच 2022 से कांगो टीम की कमान संभाल रहा है और 52 साल बाद इस देश को दोबारा विश्व कप में लेकर आया है। उन्हीं के मार्गदर्शन में कांगो 2024 अफ्रीकन नेशंस कप के सेमीफाइनल में भी पहुंचा था। जिस टीम में न्यूकैसल यूनाइटेड के नियमित स्ट्राइकर योआने विसा हों; एरॉन वैन-बिसाका, जो न केवल वेस्ट हैम यूनाइटेड के लिए खेल रहे हैं बल्कि एक समय इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के लिए भी खेल चुके हैं; मैनचेस्टर यूनाइटेड के पूर्व डिफेंडर एक्सेल तुआनज़ेबे और गेल ककुता जैसे चेल्सी के पूर्व खिलाड़ी शामिल हों — वह टीम किसी भी लिहाज से कमजोर नहीं है।
चांसल मबेंबा टीम के कप्तान और सबसे अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलने वाले खिलाड़ियों में से एक हैं। चांसल मबेंबा के नेतृत्व में कांगो के डिफेंस ने ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसके सामने क्रिस्टियानो रोनाल्डो, राफेल लियाओ, गोंसालो रामोस या ब्रूनो फर्नांडीस — कोई भी अपनी स्वाभाविक लय नहीं ढूंढ सका। कांगो के कप्तान ने पुर्तगाल के सितारों से सजे आक्रमण को पूरी तरह से बेअसर कर दिया था।
मैं खुद हैरान हूं कि पूरे मैच में रोनाल्डो के बारे में लिखने के लिए मुझे एक भी उल्लेखनीय वाक्य नहीं मिला। बस इतना ही कहा जा सकता है — रोनाल्डो के व्यक्तिगत खाते में एक और निराशाजनक शाम जुड़ गई। आगामी मैच में कोलंबिया के खिलाफ अगर कांगो को फिर से अंक मिल जाते हैं, तो ग्रुप 'के' (Group K) में पुर्तगाल के लिए राह काफी मुश्किल हो सकती है।
पुराने हिसाब का नया अध्याय: इंग्लैंड की शक्ति की घोषणा
इंग्लैंड और क्रोएशिया के बीच मुकाबला होने का मतलब है यादों के झरोखे का खुल जाना। याद है 2018 का विश्व कप? सेमीफाइनल में क्रोएशिया के हाथों हारकर इंग्लैंड का सपना टूटा था। बाद में यूरो 2020 में उसी क्रोएशिया को हराकर 'थ्री लायंस' ने अपना बदला लिया था। इसलिए डलास में 2026 विश्व कप का यह मुकाबला सिर्फ एक ग्रुप स्टेज का मैच नहीं था; यह दो पीढ़ियों, दो यादों और दो फुटबॉल संस्कृतियों का एक और नया अध्याय था। आठ साल पहले मॉस्को के लुज़्निकी स्टेडियम में इवान पेरिस्सिट्च और मारियो मांडज़ुकिक ने इंग्लैंड के विश्व कप के सपने को चकनाचूर कर दिया था। डलास की इस रात 'थ्री लायंस' ने उसी पुराने जख्म का करारा जवाब दिया!
मैच की शुरुआत से ही इंग्लैंड ने यह साफ कर दिया कि वे इस बार सिर्फ हिस्सा लेने नहीं आए हैं, बल्कि वे इस विश्व कप के सबसे मजबूत दावेदारों में से एक हैं। हैरी केन के नेतृत्व में उनके हमले बेहद धारदार थे, और जूड बेलिंगहैम मिडफील्ड में एक अदम्य ताकत की तरह छाए रहे। हालांकि केन के गोल ने इंग्लैंड को बढ़त दिला दी थी, लेकिन क्रोएशिया आसानी से हार मानने वाली टीम नहीं थी। लुका मोड्रिक के अनुभव और क्रोएशई खिलाड़ियों के जुझारू जज्बे ने उन्हें एक बार फिर मैच में वापस ला खड़ा किया।
एक समय मैच 2-2 की बराबरी पर आ गया था। तब ऐसा लग रहा था कि शायद क्रोएशिया एक बार फिर किसी बड़े मंच पर इंग्लैंड के खिलाफ जीत दर्ज करने में सफल हो जाएगा। लेकिन इस बार की इंग्लैंड टीम कुछ अलग थी। वे न तो घबराए और न ही अपनी लय खोई। बल्कि, मैच जैसे-जैसे आगे बढ़ा, वे और अधिक आक्रामक होते गए।
बेलिंगहैम की दमदार मौजूदगी, रैशफोर्ड की रफ्तार और हैरी केन की सटीक फिनिशिंग ने क्रोएशिया के डिफेंस को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया। आखिरकार 4-2 की यह जीत इंग्लैंड के लिए सिर्फ तीन अंक लेकर नहीं आई; इसने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि — इंग्लैंड इस बार वास्तव में खिताब का हकदार है।
क्रोएशिया के लिए यह हार यकीनन निराशाजनक है। लेकिन इस हार के बावजूद उन्होंने दिखाया कि क्यों वे पिछले एक दशक में विश्व फुटबॉल की सबसे सम्मानित टीमों में से एक रहे हैं। और इंग्लैंड के लिए? यह एक खुली घोषणा (स्टेटमेंट) थी — 2018 का जख्म अब इतिहास बन चुका है, और 2026 का सपना अब हकीकत की राह पर चल पड़ा है।
उम्र को महज एक संख्या साबित करते हुए, चालीस साल की उम्र में भी लुका मोड्रिक मानो क्रोएशिया की धड़कन बने हुए हैं। पांच विश्व कप के विशाल अनुभव के साथ, वह आज भी मिडफील्ड में खड़े होकर टीम की लय तय करते हैं। हालांकि, इंग्लैंड की युवा ऊर्जा और रफ्तार के सामने इस बार उनका यह अनुभवी जादू पूरी तरह से बेअसर रहा।
विश्व कप के अपने पहले ही मैच में छह गोल का यह रोमांचक मुकाबला यह याद दिलाने के लिए काफी है कि फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है; यह यादों, प्रतिशोध, उम्मीदों और एक नया इतिहास लिखने का एक कभी न खत्म होने वाला नाटक है।
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शमीक लाहिड़ी
{लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं}
18 जून, 2026
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प्रकाशित: 18 जून 2026 • 7 मिनट पठन
1857 के विद्रोह में एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू है, हिंदू–मुस्लिम एकता। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही वर्गों पर ब्रिटिश शासन की नीतियां आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से प्रतिकूल थीं। दोनों समुदायों को कर, जमीन संबंधी दमन और धार्मिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा। इस साझा अनुभव ने एकता की आधारशिला रखी। यह भी महत्वपूर्ण था कि बंगाल की आर्मी में विभिन्न जातियों से सम्बंधित हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो के सैनिक थे। यह हिन्दू मुस्लिम एकता का आधार बना जो इससे पहले नहीं देखा गया था। जैसे हिन्दू और मुस्लिम सिपाही एक साथ मिल कर लड़े उसी तरह हिन्दू और मुस्लिम तालुकदार और राजा भी एकजुट हुए। सामान्य नागरिक, हिन्दू और मुस्लिम दोनों ने मिल कर बहादुरी के साथ अंग्रेजो के खिलाफ लड़े और अंग्रेजों के दमन का सामना लिया।
02 जुलाई 2026

दुनिया भर में बाल श्रमिकों का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र (खेती-बाड़ी) में कार्यरत है। कुल बाल श्रमिकों में से लगभग 60 प्रतिशत बच्चे कृषि कार्यों से जुड़े हैं। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) में लगभग 27 प्रतिशत और खनन (माइनिंग), निर्माण (कंस्ट्रक्शन) समेत अन्य उद्योगों में लगभग 13 प्रतिशत बच्चे काम करते हैं।
13 जून 2026
06 मई 2026

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026
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