1857 का महान जनविद्रोह और इसकी महान विरासत
(विद्रोह, बलिदान और विरासत: 1857 की महान जनक्रांति)
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- डॉ विक्रम सिंह
हरियाणा के शहर हांसी में एक सड़क का नाम लाल सड़क है। इस सड़क के नाम की कहानी बहुत ही दिलचस्प और कुर्बानियों की दास्तान है। वर्ष 1857 के विद्रोह में इस क्षेत्र की जनता ने भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। विद्रोह के दौरान रोहणत और आस-पास के इलाकों के ग्रामीणों ने हांसी और हिसार में ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला किया, जिसमें हांसी में 11 अधिकारियों की मौत हो गई। क्रांतिकारियों ने खजाना लूट लिया, कैदियों को आज़ाद किया था। इसके बाद विद्रोह करने वाले ग्रामीणों पर भारी दमन किया गया। यहां के वीर नागरिकों ने दिन-दहाड़े हिसार में डिप्टी कलेक्टर बेडर्नबर्न की कोर्ट रूम में गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में जनक्रांति की शुरुआत की, जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी।
अंग्रेजों ने प्रतिशोध में भयानक अत्याचार किए। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को निर्दयता से कुचलते हुए सड़क पर रोड रोलर चला दिया, जिससे कई क्रांतिकारियों का खून सड़क पर बह गया, और क्रांतिकारियों के खून से यह सड़क लाल हो गई। क्रांतिकारियों के लाल खून से ही इस सड़क का नाम 'लाल सड़क' हो गया। हांसी में विद्रोह का नेतृत्व करने वाले हुकमचन्द जैन, फकीर चन्द, मिर्जा मुनीर बेग और मुर्तजा बेग को मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को सहयोग देने के आरोप में अंग्रेजों ने राजद्रोह के तहत गिरफ्तार कर लिया। उन्हें उनके ही घर के सामने फांसी पर लटका दिया गया। हुकमचन्द जैन को अंग्रेजों ने दफनाया, जबकि मुनीर बेग को फांसी के बाद जला दिया गया था ।हांसी की लाल सड़क और इससे जुड़ी बलिदानों की गाथा उन अनगिनत कहानियों में से एक है, जिन्हें भारत की बहादुर जनता ने 1857 के महान विद्रोह के दौरान अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ अपने खून और साहस से लिखा।
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एक ऐतिहासिक और महान जनविद्रोह: 1857 का विद्रोह 19वीं सदी के महान उपनिवेशवाद विरोधी विद्रोहों में से सबसे बड़ा विद्रोह था। हालांकि 19वीं सदी में एशिया और अफ्रीका में साम्राज्यवादी देशों के खिलाफ कई विद्रोह हुए जिसमें किसानों, आदिवासियों और अपनी रियासतों से विस्थापित स्थानीय राजाओं ने हथियार उठाए। लेकिन चीन के ताइपिंग विद्रोह जो किंग साम्राज्य के बादशाह के खिलाफ था (इसमें भी चीन में तैनात अंग्रेज और फ्रांसीसी सेनाओं ने विद्रोह को दबाने के लिए बादशाह को काफी मदद की)आलावा इतने बड़े स्तर पर कोई और विद्रोह नहीं हुआ। 1857 का विद्रोह आज़ादी की पहली लड़ाई है क्योंकि इसका विस्तार एक बड़े क्षेत्र में था और बड़ी संख्या में लोगो ने इसमें भागीदारी की। यह विद्रोह बंगाल से लेकर पंजाब तक फैला हुआ था। गौरतलब है कि केवल बंगाल की आर्मी के कुल 135 हज़ार सैनिकों में से 128 हज़ार ने इस विद्रोह में भाग लिया। ब्रिटिश संसद में 1958 में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार बंगाल आर्मी में केवल 7 हज़ार सैनिक अंग्रेजो के वफादार बचे थे।
1857 से पहले भी भारत में विद्रोहों की एक मज़बूत परंपरा रही है। ईस्ट इंडिया कंपनी यहां आने के बाद से ही शायद ही कोई साल ऐसा गुज़रा होगा जब कंपनी शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह और प्रतिरोध नहीं हुआ होगा। ऐसे विद्रोह लगभग देश के हर हिस्से में हुए जिसमे समाज के लगभग हर वर्ग ने हिस्सा लिया। किसान, आदिवासी, बेदखल ज़मींदार, पूर्व शासक, सभी ब्रिटिश शासन को मज़बूत होने से रोकने की लड़ाई में शामिल थे जैसे टीपू सुल्तान ने अंत तक अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। पूरे देश में आदिवासी और किसान विरोध प्रदर्शन हुए थे। यहां तक कि सैनिकों ने भी इससे पहले विद्रोह किये थे जैसे 1764 में बंगाल में, 1806 में वेल्लोर में, 1824 में बैरकपुर में। इन सब विद्रोहों को अंग्रेजों ने सबसे क्रूरतम रूप में बेरहमी से दंडित किया था।
इसका मतलब है कि जनता के एक बहुत बड़े वर्ग में विदेशी शासन के प्रति व्यापक घृणा थी और 1857 में जो हुआ उसकी संभावनाएं पहले से मौजूद थीं।यह बात 1858 में बंगाल के लेफ़्टिनेंट-गवर्नर फ़्रेडरिक हैलिडे के वक्तव्य से भी स्पष्ट होती है जिन्होंने कहा था कि यह विद्रोह किसी भी समय और किसी भी स्थान पर शुरू हो सकता था, ‘जैसे ही उकसावे का अवसर के साथ मेल हो जाए’ । जैसा कि हम जानते है कि यह मेल हुआ ‘चर्बी लगे कारतूसों’ की घटना के उकसावे के कारण।
फैलता गया विद्रोह (संघर्ष के प्रमुख केन्द्र): जनवरी 1857 में बैरकपुर (बंगाल) में एक नई एनफील्ड राइफल शुरू की गई जिसमे कारतूस को दांतों से काटकर खोलना पड़ता था। चर्बी लगे कारतूसों की घटनाओं और जनवरी 1857 में दमदम में सैनिकों के विद्रोह के बाद 29 मार्च को बैरकपुर में एक और विद्रोह हुआ, जिसके दौरान मंगल पांडे ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर बहुत साहस के साथ हमला किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 8 अप्रैल को फांसी दे दी गई। उनकी रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। इसके बाद कई अन्य स्थानों पर भी चर्बी लगे कारतूस स्वीकार करने से इंकार किया गया, और सैनिकों द्वारा हिंसक कार्यवाहियां हुईं, जिसको आसपास की नागरिक आबादी की सहानुभूति और एकजुटतामिली। बंगाल सेना ने विद्रोह की आग को निर्णायक रूप से प्रज्वलित कर दिया था।
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24 अप्रैल को मेरठ में 99 सिपाहियों ने नए कारतूसों का उपयोग करने से इनकार कर दिया। उनमे से 85 को कोर्ट-मार्शल करके 10 वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई। 9 और 10 मई को विद्रोह तेजी से आगे बड़ा। भारतीय सैनिकों ने जेल तोड़कर अपने साथियों को छुड़ाया, अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला और दिल्ली की ओर कूच कर गए। यहीं से संगठित विद्रोह की शुरुआत हुई। विद्रोह की लपटें शीघ्र ही उत्तरी और मध्य भारत के बड़े हिस्से में फैल गईं।
मेरठ से विद्रोही सैनिक मार्च करते हुए 11 मई को दिल्ली पहुँचे जहां स्थानीय सेना ने उनका स्वागत किया, इसके साथ ही दिल्ली की नागरिक आबादी और किसान विद्रोह पर उतर आए। दिल्ली तो 1857 के विद्रोह की आत्मा बन गई थी। विद्रोही दैनिकों ने बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित कर दिया। इसके साथ ही तीन बातें घोषित हो गई: पहली वे अब भी मुगल बादशाह को वैध शासक और सत्ता के प्रतीक के रूप में मानते थे; दूसरी विदेशी लोग (अंग्रेज) हड़पने वाले थे और उन्हें न केवल पराजित करना था, बल्कि खदेड़ना भी था; तीसरी, हालांकि उन्हें अभी तक आधुनिक अर्थों में एक राष्ट्र की समझ नहीं थी लेकिन वे अपने भाग्य के निर्माता और कर्ता-धर्ता बनने के लिए दृढ़ संकप थे। दिल्ली पर कब्ज़ा कर लेने के बाद, विद्रोही सेना ने अंग्रेजों को चुनौती दी। दिल्ली की लड़ाइयां बहुत ही कठिन रहीं। दिल्ली की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां पर भारत का औपचारिक शाही केंद्र था, और मुग़ल सम्राट का नाम विद्रोह को वैधता प्रदान करता था।
अवध क्षेत्र में किसानों, कारीगरों, दुकानदारों, दिहाड़ी मजदूरों और ज़मींदारों की विद्रोह में व्यापक भागीदारी देखी गई।अवध के विलय को सभी वर्गों ने अपने अपमान के रूप में देखा और इसे उन्होंने बिल्कुल स्वीकार नहीं किया। विस्थापित ज़मींदारों ने यहां एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और उन नए ज़मींदारों पर हमलों का नेतृत्व किया जिन्हें अंग्रेजों ने उनकी जगह लाया था। फ़ैज़ाबाद में भी विद्रोह तीखा था, और अवध की राजधानी लखनऊ विद्रोह का एक प्रमुख केंद्र था। यहां बेगम हजरत महल ने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कद्र को नवाब घोषित करके नेतृत्व संभाला। बेगम ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया और इस बीच लखनऊ पर भी कब्ज़ा कर लिया था। मार्च 1858 में अंग्रेजों ने लखनऊ पर फिर से कब्जा कर लिया, लेकिन बेगम महल लड़ती रहीं और अंततः नेपाल चली गईं।
हमारे बचपन की प्रसिद्ध और उद्वेलित करने वाली 'सुभद्रा कुमारी चौहान' की कविता 'चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी' खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी' विद्रोह के एक बड़े केंद्र झाँसी की नायिका ‘रानी लक्ष्मी बाई’ की गौरवशाली गाथा है। झांसी को हड़प नीति के तहत अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया था। विद्रोह शुरू होने पर रानी ने झांसी का नेतृत्व संभाला और सेना का गठन किया। सर ह्यूरोज के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने झांसी पर हमला किया। रानी ने वीरतापूर्वक मुकाबला किया और जब स्थिति निराशाजनक हो गई, तो वह किले से निकलकर कालपी चली गईं। वहां तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास ‘कोटा की सराय’ में अंग्रेजों से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुईं। इस क्षेत्र में सैनिक और किसान लड़ाई की रीढ़ थे। रानी लक्ष्मी बाई के आलावा खुदाबक्श, गौस खान और झलकारी बाई (जो वंचित जाति की एक प्रसिद्द लड़ाकी थी) यहां के कुछ नायक हैं।
मध्य भारत में झांसी की लड़ाई इस सन्दर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है कि महाराजा सिंधिया ने अंग्रेजों का साथ दिया। हालांकि सिंधिया की सेना में विघटन के बाद बनी बिद्रोहियों की ग्वालियर टुकड़ी ने 1857 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसमे निचली जातियों का एक बड़ा हिस्सा था। यहां तक कि उनके विद्रोह ने सिंधिया और बैजा बाई की सेनाओं के कुछ हिस्सों को भी विद्रोह में आकर्षित कर लिया था। इनायत खान और जहाँगीर खान यहां नेता के रूप में उभरे। इसके आलावा मध्य भारत में एक महत्वपूर्ण विद्रोह बिंघल नामक एक छोटी जनजाति का था, जिसका नेतृत्व वीर नारायण सिंह ने किया था। उधर पश्चिमी भारत में भीलों ने नियमित लूटपाट के माध्यम से अपना आक्रोश व्यक्त किया। 1857 के दौरान उनके विद्रोह की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उन्होंने इस महत्वपूर्ण मोड़ पर गैर-आदिवासियों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी। कानपुर (तब कन्नौज) भी एक महत्वपूर्ण केंद्र था। वहां की लड़ाई में प्रसिद्ध नाम नाना साहेब (परीक्षित) का है। नाना साहेब ने अपने सेनापति तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ दी और ब्रिटिश निवासियों और सैनिकों पर हमला किया। इलाहाबाद में एक रेलवे स्टोर को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया गया, जो पुनः औपनिवेशिक शक्ति का प्रतीक था।
बिहार में भोजपुरी लोकगीतों में प्रसिद्द नायक जगदीशपुर के 80 वर्षीय ज़मींदार कुंवर ने अंत तक अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। इन्ही लोकगीतों के अन्य नायकों के नाम जमीनी स्तर पर नेतृत्व की बहुलता को दर्शाते हैं। निशान सिंह, जुल्फिकार, रंजीत यादव, करमन बी, धरमन बी, बेनी माधो, मैकू मल्लाह, रजब अली, माधो सिंह, और अन्य कई नाम क्षेत्र में 1857 के संयुक्त नेतृत्व की गवाही देते हैं।
रांची और हजारीबाग में भी सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया था जो पलामू के आदिवासियों को भी लडाई खींच लाया हालांकि पलामू या रांची की सभी जनजातियां विद्रोह में पूरी तरह शामिल नहीं हुईं। चेरो और बोगटाहों ने कुंवर सिंह की सेनाओं और हजारीबाग के सैनिकों से संबंध बना लिए थे और नवंबर 1857 में उन्होंने रघुबर सिंह की ठकुराई, जो एक कोयला कंपनी का स्टेशन था, पर हमला कर दिया था। लेकिन वह लम्बे समय तक लड़ नहीं पाए और दिसंबर में उनके नेताओं नीलांबर और पीतांबर को पकड़ लिया गया और उन्हें फांसी दे दी गई। रांची में विद्रोह झारखंडी मुसलमानों द्वारा किया गया, जिसका नेता शेख भिखारी था। हालांकि संथालों में अब पहले की तरह संगठित आंदोलन नहीं था लेकिन हजारीबाग में कुछ जगह वह खुल कर बाहर आए। भुइया लोगों ने भी विद्रोह किया और खोई हुई ज़मीन वापस पाने की कोशिश की। इसी तरह बोगताहों का एक दल पीछे से आख़िर तक लड़ता रहा।
उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में भी विद्रोह फैला जैसे आजमगढ़, गोरखपुर, भागलपुर, हरियाणा, राजस्थान के कुछ भाग, पंजाब के सीमावर्ती हिस्से आदि। हालांकि पंजाब में विद्रोह कम हुआ क्योंकि वहां पहले ही अंग्रेजों का नियंत्रण मजबूत था। इन केंद्रों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि विद्रोह केवल एक या दो स्थानों पर सीमित न था, बल्कि मध्य व उत्तरी भारत के अनेक केंद्रों तक फैला था।
मेवात का आंदोलन: ऐसा ही एक विद्रोह का केंद्र मेवात का क्षेत्र था, जो वर्तमान हरियाणा और राजस्थान का हिस्सा है। गौरतलब है कि यह मुस्लिम बहुल इलाका देश की राजधानी के करीब होने के बावजूद भी बदहाली में है और विकास में पिछड़ा हुआ है, हिंदुत्व की वैचारिक नीति पर काम करने वाली वर्तमान केंद्र सरकार ने विशेष तौर पर इस क्षेत्र के खिलाफ रुख अपनाया है। इस क्षेत्र में हज़ारों लोगों ने कुर्बानियां दीं है जिससे विद्रोह के इस क्षेत्र में व्यापकता और समर्थन का पता अचलता है। उदाहरण के लिए 1857 के सिपाही विद्रोह के ख़त्म होने के बाद देश के अलग हिस्सों में अंग्रेजों ने दमन का चक्र चलाया। दरअसल यह एक तरह से प्रतिशोध जैसा ही था कि कैसे कोई ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर सकता है, लेकिन वहीं मेवात में यह दमन काफी लंबे समय तक जारी रहा। 8 नवम्बर 1857 से 7 दिसम्बर 1858 तक अंग्रेज़ों ने मेवात के एक-एक गांव को कुचल डाला और इस दौरान स्त्री, पुरुष और बच्चों की निर्मम हत्याएं कीं। अलग अलग अनुमानों के अनुसार मेवात में 10,000 देशभक्तों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। केवल एक ही दिन, 19 नवम्बर 1857, को रूपराका गांव में ही 425 मेवातियों की हत्या कर दी गई। क्रोधित अंग्रेज़ों ने 36 से अधिक गावों को आग के हवाले कर दिया और अन्य गावों से ज़मीन के अधिकार छीन लिए। आज भी इस क्षेत्र के गावों में शहीदों के प्रतीक दिख जाते हैं।
हालांकि अंग्रेजों ने 20 सितम्बर 1857 को दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था लेकिन उनका दमनकारी अभियान 8 नवम्बर 1857 को मेवात में शुरू हुआ जब घसेड़ा के 157 निवासियों का नरसंहार किया गया। 1 जनवरी 1858 को अंग्रेज़ी सेना ने होडलगढ़ी में 85 लोगों की हत्या की, जिनमें स्वतंत्रता सेनानी किशन सिंह और किशनलाल जाट भी शामिल थे। 2 जनवरी 1858 को हसनपुर में हसन ख़ान और रहीम ख़ान को मारा गया; सहसोला में कम से कम 12 लोगों की हत्या की गई जिनमें फ़िरोज़ ख़ान मेव भी शामिल थे; बड़का में 30, जिनमें ख़ुशी ख़ान भी थे; नूह में 18, टौड में 19 और जनवरी 1858 में ही महून तिगांव गांव में कम से कम 73 लोगों को मौत के घाट उतारा गया। इसी प्रकार, 9 फरवरी 1858 को अंग्रेज़ों ने 52 लोगों को पेड़ों से लटकाकर फाँसी दी, जिनमें धानसिंह मेव भी शामिल थे। कुछ ही दिनों बाद, कोंडल, गहलाब और आहरवा गावों में 85 लोगों की हत्या कर दी गई। 16 फरवरी को अंग्रेज़ों ने मलूका नम्बरदार और उसके परिवार के 11 सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया, और 22 फरवरी को अकेड़ा गांव में हस्ती सहित 3 लोगों को शहीद किया गया।
दरअसल दिल्ली से मेवात की निकटता के कारण विद्रोह की ख़बर वहां लगभग तुरंत पहुँच गई। पहले से ही ब्रिटिश शासन से क्षुब्ध मेवाती ग्रामीण बिना किसी देर किए विद्रोह में शामिल हो गए। स्थानीय नेताओं और मेवाती निवासियों ने बहादुरशाह ज़फ़र को पत्र लिखकर ब्रिटिशों पर उनकी सत्ता को स्वीकार किया। इस क्षेत्र में विद्रोह की खबर के प्रसार का एक बहुत दिलचस्प प्रकरण प्रचलित है। विद्रोह की खबर इतनी तेजी से फैली कि अंग्रेज हुकूमत और स्थानीय प्रशासन को पता ही नहीं चला। इसका मुख्य कारण था विद्रोह की खबर फ़ैलाने का बहुत साधारण पर कारगार माध्यम। रात को पांच रोटी पर गोश्त का एक टुकड़ा और साबुत नमक की डली रख कर गांव में भेजी जाती। यह सन्देश होता था विद्रोह उस क्षेत्र में पहुँचाने का। अगर वह गांव इसमें शामिल होना चाहता तो रोटी, गोश्त का टुकड़ा और नमक की डली स्वीकार कर लेता और इसी तरह, पांच रोटी पर गोश्त का एक टुकड़ा और साबुत नमक की डली रख कर अगले पांच गंतव्यों पर भेज दी जाती। बेहतर कारगर तरीका था न ख़ुफ़िया एजेंसियों का डर न पुलिस का खौफ। इसमें भी गोश्त और नमक की डाली का चुनाव सचेत तरीके से किया गया था। इसका जिक्र तब की ब्रिटिश पार्लियामेंट्री कमेटी ने भी किया है।
अंतता अपनी बढ़िया सेना के दम पर अंग्रेजो ने विद्रोह को हरा दिया। अंग्रेजों ने सितंबर 1857 में दिल्ली पर फिर से कब्जा कर लिया और बहादुर शाह जफर को बंदी बना लिया और रंगून भेज दिया गया। इसके साथ ही मुगल साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया। नाना साहिब कानपुर में हार गए। तात्या टोपे ने अप्रैल 1859 तक विश्वासघात होने तक वीरतापूर्ण गुरिल्ला युद्ध जारी रखा, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई 17 जून 1858 को हाथ में तलवार लेकर मर गईं, बिहार के कुंवर सिंह, दिल्ली में नेता बने बख्त खान, बरेली के खान बहादुर खान और फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला शाह सभी तब तक मारे जा चुके थे।
अमानवीय साम्राज्वादी शोषण के खिलाफ गुस्सा: इस विद्रोह का असली कारण अंग्रेजो द्वारा देश की जनता की लूट और इसके खिलाफ समाज के सभी वर्गों में पनपता गुस्सा था। अपने देश में पूंजीवाद के विकास के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने हमारे देश के लोगो और संसाधनों का दोहन किया। हमें यह याद रखना चाहिए कि ब्रिटिश शासन ने खिराज वसूली (tribute extraction) और विऔद्योगीकरण (deindustrialisation) की नीतियों के माध्यम से न केवल भारत की संपत्ति का व्यवस्थित रूप से दोहन किया, बल्कि भारतीय समाज की आर्थिक रीढ़ को भी तोड़ दिया। ब्रिटिशों द्वारा खिराज वसूली का अर्थ था कि भारत में उत्पन्न संपत्ति का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन भेज दिया जाता था। भारतीय किसानों से अत्यधिक कर वसूल किए जाते, जिससे वे कर्ज़ और भुखमरी की स्थिति में पहुँच जाते। भूमि-राजस्व की कठोर नीतियां और करों में लगातार बढ़ोतरी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लगभग पंगु कर दिया।
इसके साथ ही, विऔद्योगीकरण ने भारत के पारंपरिक उद्योगों, विशेषकर कपड़ा उद्योग, को बर्बाद कर दिया। ब्रिटिश मशीन-निर्मित सस्ते सामानों की बाढ़ और भारतीय कारीगरों पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण लाखों शिल्पकार बेरोज़गार हो गए। इन दोनों आर्थिक प्रक्रियाओं, अत्यधिक कराधान और उद्योगों के विनाश, ने आम भारतीयों के जीवन को गहरी गरीबी, भूख और असुरक्षा में धकेल दिया। यही व्यापक आर्थिक पीड़ा 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि का एक मुख्य कारण बनी। जनता, किसान, कारीगर और सिपाही सभी इस शोषणकारी व्यवस्था से त्रस्त हो चुके थे, जिसके परिणामस्वरूप असंतोष धीरे-धीरे व्यापक विद्रोह में बदल गया।
साम्राज्यवादी इतिहासकार प्रचार करतें है कि भारत की अर्थ व्यवस्था घाटे की थी लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है जिसको कई अध्ययनों ने साबित किया है। देश की जनता विशेष तौर पर किसानो से भारी कर वसूल किया जाता था। जितना भी अधिशेष पैदा होता वह लंदन हथिया लेता था। विश्व व्यापर में भारत के लिए ऐसी व्यवथा बनाई गई थी कि उसकी जनता के हिस्से में केवल घाटा ही आता। मूल रूप से, जो भी भारत से सामान खरीदना चाहता था, उसे काउंसिल बिल्स के ज़रिए खरीदना पड़ता था, यह एक विशेष कागज़ी मुद्रा थी, जिसे केवल ब्रिटिश क्राउन ही जारी करता था। और इन बिलों को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका था लंदन से उन्हें सोना या चाँदी देकर खरीदना। व्यापारी लंदन को सोने में भुगतान करते और बदले में ये बिल प्राप्त करते, फिर इन्हीं बिलों से भारतीय उत्पादकों को भुगतान किया जाता। लेकिन जब भारतीय इन बिलों को स्थानीय औपनिवेशिक दफ़्तर में नक़द करवाते, तो उन्हें कर-संग्रह से प्राप्त रुपयों में 'भुगतान' किया जाता, यानी उसी धन से जो अभी-अभी उन्हीं से कर के रूप में वसूला गया था। इस तरह, असल में उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता था; बल्कि उनके साथ ठगी की जाती थी।
इस बीच, लंदन को वह सारा सोना और चाँदी मिल जाता था, जो भारतीय निर्यातकों को सीधे मिलना चाहिए था। यह भ्रष्ट व्यवस्था ऐसी थी कि जबकि भारत दुनिया के साथ भारी व्यापार अधिशेष चला रहा था, जो बीसवीं सदी के आरंभिक तीन दशकों तक कायम रहा, राष्ट्रीय खातों में इसे घाटे के रूप में दिखाया जाता था, क्योंकि भारत के निर्यात से हुई वास्तविक आय पर पूरा का पूरा अधिकार ब्रिटेन ने जमा लिया था।
बहुत से लोग इस काल्पनिक घाटे को इस बात का सबूत मानते हैं कि भारत ब्रिटेन पर बोझ था लेकिन असल में सच्चाई ठीक इसके उलट है। ब्रिटेन भारतीय उत्पादकों को लूट रहा था। दूसरी तरफ इसे तथाकथित घाटे के कारण भारत के पास अपनी आयात आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ब्रिटेन से क़र्ज़ लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता था। इस प्रकार, पूरे भारतीय समाज को इस अनावश्यक क़र्ज़ में धकेल दिया गया, जिससे औपनिवेशिक प्रभुत्व और मजबूत हो गया।
गौरतलब है कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित एक शोध में यह अनुमान लगाया है कि 1765 से 1938 की अवधि में ब्रिटेन ने भारत से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति चूस ली । पटनायक ने 1765 से 1938 के बीच औपनिवेशिक भारत की चार अलग-अलग आर्थिक अवधियों की पहचान की, प्रत्येक अवधि में निकासी की गणना की और फिर उस पर औसत 5 प्रतिशत (जो बाज़ार दर से कम है) की ब्याज दर लगाते हुए वर्तमान तक जोड़कर देखा। सबको मिलाकर उन्होंने पाया कि कुल निकासी 44.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचती है। उनके अनुसार यह आंकड़ा भी कम है, क्योंकि इसमें वे क़र्ज़ शामिल नहीं हैं, जो ब्रिटेन ने कम्पनी राज के दौरान भारत पर थोपे थे। इसे हम ऐसे समझ सकते है कि उस समय के 45 ट्रिलियन डॉलर, आज के समय में ब्रिटेन के कुल वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से 17 गुना अधिक है। ब्रिटेन ने भारत में की जाने वाली इस लूट की आमदनी का इस्तेमाल यूरोप और यूरोपीय उपनिवेशों (जैसे कनाडा और ऑस्ट्रेलिया) में पूंजीवाद के विस्तार में किया। इसलिए केवल ब्रिटेन का ही औद्योगिकीकरण नहीं, बल्कि पश्चिमी दुनिया के बड़े हिस्से का औद्योगिकीकरण, उपनिवेशों से की गई इस लूट से संभव हुआ।
सिपाहियों की दुर्दशा बनी विद्रोह की चिंगारी: अपने खिलाफ विद्रोहों के बीज शासक वर्ग खुद ही बोता है। 1832 में जब ब्रिटैन के औद्योगिक वर्ग का देश की राजनीति में बोलबाला था और वह लगभग सत्ता को नियंत्रित कर रहा था। इसी समय, ब्रिटिश संसदीय सुधार हुए जिससे ब्रिटिश औपनिवेशिक विस्तार की एक नई लहर शुरू हुई। इस नीति में बंगाल की आर्मी को अत्याधिक व्यस्त कर दिया और सैनिकों पर इसका बहुत बुरा असर हुआ। क्रिमीआ से लेकर चीन तक की लड़ाइयों में इन सैनिको को लड़ने और मरने के लिए मज़बूर किया गया। इन दशकों में इस आर्मी को कई लड़ाइयां लड़नी पड़ी। इस दौर का पहला भयंकर युद्ध जिसमे बंगाल की आर्मी को धकेल दिया गया, 1839 से 1842 के बीच लड़ा अफगान युद्ध था, इसके बाद 1843 की ग्वालियर का युद्ध, 1844 में सिन्ध का युद्ध आदि। इन युद्धों में आर्मी को भारी नुक्सान का सामना करना पड़ा। इसके बाद शुरू हुए पंजाब के युद्ध जिसमे 1945- 46 और 1848-49 में बंगाल आर्मी को भारी नुक्सान हुआ। 1852 में ब्रिटैन के लिए बर्मा पर जीत हासिल करने के लिए बंगाल आर्मी को बर्मा के दूसरे युद्ध के लिए भेज दिया गया। 1840-42 के बीच इसे चीन के तथाकथित अफीम युद्ध में भी लड़ना पड़ा। रूस के खिलाफ लड़ने के लिए 1854 में इसे फिर क्रीमिया भेज दिया गया। इस तरह हम देखते हैं कि 1839-1857 तक यह आर्मी लगातार युद्धों में लड़ रही थी।
यहां तक कि 1856-57 में भी पर्शिया में एक युद्ध चल रहा था, और बंगाल आर्मी की टुकड़ियां वहां लड़ने के लिए भेजी गई थी। उस समय, विश्व की कोई अन्य सैना इस तरह इतने लम्बे समय तक निरंतर युद्धों में नहीं लगी हुई थी। सेना विशेषज्ञ के अनुसार किसी भी सेना को अगली लड़ाई लड़ने के लिए अठारह वर्षो का आराम मिलना चाहिए लेकिन बंगाल की आर्मी को तो सांस लेने की फुर्सत नहीं दी जा रही थी। जॉन विलियम के जो एक ब्रिटिश सैन्य इतिहासकार थे, के अनुसार उन दिनों बंगाल आर्मी में ब्रिटिश अधिकारीयों के लिए सैनिकों को युद्ध के लिए डराना एक आम बात थी। जब भी कोई सैनिक गलती करता तो अधिकारी धमकाते कि उसे बर्मा या चीन में लड़ने के लिए भेज दिया जायेगा यहां उनकी मौत हो जाएगी।
इस सबसे सिपाहियों में जो निराशा पैदा हुई वह बंगाल आर्मी के लिए घातक साबित हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सिपाहियों के गुस्से का विद्रोह रुपी ज्वालामुखी के रूप में फटने का कारण केवल चर्बी लगे कारतूस नहीं थे बल्कि पिछले कई वर्षो से जमा हो रहे अपमान, विशेष रूप से नस्लीय और धार्मिक अपमान था, जिसका उन्हें लगातार सामना करना पड़ा था। ऊपर से लगातार युद्धों की शारीरिक और मानसिक थकान। यह गौर करने वाली बात है कि यह उस आर्मी की बात हो रही है जो उस समय सबसे आधुनिक और ब्रिटेन से बाहर सबसे बड़ी सेना थी। इसलिए यह अंगेर्जों की सबसे चहेती सैना भी थी।
बंगाल की आर्मी में भारतियों की अफसर रैंक पर पदोन्नति के अवसर बहुत कम थे। कुल मिलकर 20 या फिर 30 सैनकों में से किसी एक को जमादार बनने का मौका मिलता था। ऐसे 30 जमादारों में से केवल एक सूबेदार, इससे भी बहुत कम सूबेदार मेजर बन सकते थे इसके बाद पदोन्नति रास्ते बंद हो जाते थे। इसलिए उनमे आत्मसम्मान की भारी कमी थी। ऐसे हालात में केवल जाति की श्रेष्ठता ही एकमात्र सम्मान बचा था। इरफ़ान हबीब के अनुसार बंगाल की आर्मी के दो महत्वपूर्ण सामाजिक गुण थे; यह जाति के प्रति अत्यधिक संवेदनशील थी, लेकिन सांप्रदायिक नहीं थी। दरअसल जाति की श्रेष्ठता ही एकमात्र सम्मान बच्चा था। अब चर्बी लगे कारतूस थोपने के जरिये अंग्रेज उनसे यह भी छीन रहे थे जिसके विरोध में पूरे सैनिक एकजुट हुए।
उल्लेखनीय है कि उस समय तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने धर्म के आधार पर जनता की एकता तोड़ने की नीति की खोज नहीं की थी इसलिए आर्मी में भी धर्म के आधार पर रेजीमेंट कम्पनी का गठन नहीं किया गया था। इसलिए उनमे एकता होती थी। आर्मी में भर्ती भी एक विशेष क्षेत्र से ज्यादा होती थी जिससे सैनिको में एकता ज्यादा बढ़ी। बंगाल की आर्मी में सैनिकों का एक बहुत बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और हरियाणा से भर्ती किया जाता था जो एक जबान बोलते थे। यह एक बहुत बड़ा कारण बना विद्रोह में सैनिकों के एकता बनाने और एकजुट निर्देशों का पालन करने में।
सैनिकों में गहरे गुस्से का पता एक वाकया से चलता है जब ख़ारिज किये गए चर्बी लगे करतूद सैनिकों ने विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ प्रयोग किये। जब बहादुर शाह का अभियोग चला तो अंग्रेजों की तरफ से अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील पेश की कि जिन विद्रोहियों ने चर्बी लगे कारतूस का विरोध किया था, वही इन्ही कारतूसों को अपने दांतो से तोड़ कर अंग्रेजो के खिलाफ प्रयोग कर रहे थे। लेकिन इसमें महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा वह अपनी इच्छा से कर रहे थे न कि किसी हुक्म या जबरदस्ती के चलते।
किसानो और आम जनता का आंदोलन: इस विद्रोह की शुरुआत चाहे सिपाही विद्रोह के रूप में हुई हो लेकिन जनता के अन्य तबके भी इसमें बड़ी संख्या में शामिल हुए। अलग अलग इतिहासकारों के अनुसार जनता में इस संग्राम के लिए व्यापक समर्थन था जिसमे किसान एक बड़ी ताकत थी। इस समर्थन के बिना इस विद्रोह की निरंतरता और इतने बड़े स्तर पर इसका फैलाव संभव नहीं है। इसी के चलते यह विद्रोह इतना लम्बा चला। इस विद्रोह की शुरआत 'वर्दी पहने हुए किसानों' (ज्यादातर सैनिक मूलता किसान परिवारों से ही थे ) ने ही की लकिन जल्दी ही यह आम जनता विशेष तौर पर किसानो का संग्राम बन गया। विद्रोह में सैनिकों के शामिल होने का एक बड़ा कारण यह भी था कि ज्यादातर सैनिक उन इलाको से ही आते थे जहां किसानो से भरी ऋण बसूल किया जाता था और उनके परिवारों की दुर्दशा उन्होंने अपनी आँखों से देखी थी जिसके खिलाफ उनमे घोर गुस्सा था।
हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि अंग्रेजों की राजस्व नीतियां जैसे स्थायी बंदोबस्त (1793), रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्था, ने किसानों की रीढ़ तोड़ दी। भूमि पर परंपरागत स्वामित्व नष्ट हुआ, कर संग्रह में मध्यस्थ (जमींदार, महाजन) हावी हुए, और किसानों को नगद कर भुगतान के लिए मजबूर किया गया। इसका न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर घातक असर हुआ बल्कि किसानों की सभी श्रेणियां इससे गंभीर रूप से प्रभावित हुई। अगर हम देखें तो उत्तर भारत में अवध इसका सबसे साफ़ उदाहरण था।
अवध के किसानों ने नवाब वाजिद अली शाह के अपदस्थ होने (1856) और अंग्रेजी राजस्व नीति के विरोध में विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके आलावा यूरोपीय उद्योगों की आवश्यकता के लिए भारत में कृषि को नकदी फसलों (जैसे कपास, जूट, नील, चाय आदि) की ओर धकेला गया। किसानों को इन फसलों को उगाने के लिए प्रेरित या बाध्य किया गया। इससे उनकी पारंपरिक कृषि व्यवस्था बाधित हुई और खाद्यान्न की स्थिरता भी प्रभावित हुई। इसी तरह अंग्रेजी औद्योगिक नीतियों ने दस्तकारों और शिल्पियों की भी बर्बादी कर दी थी। भारतीय हस्तशिल्प, विशेषकर उत्तर भारत के बनारस, लखनऊ, आगरा और मुरादाबाद के वस्त्र एवं धातु शिल्प, नष्ट हो गए। लाखों कारीगर बेरोजगार हुए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा। यह सब तबके अपने अनुभवों से ही ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ थे और सक्रीय तौर पर संग्राम में शामिल हुए। उत्तर भारत में यह व्यापक रूप से ग्रामीण आंदोलन था जिसमे किसानों ने न केवल सैनिकों को रसद और आश्रय दिया, बल्कि स्वयं भी हथियार उठाए। कई स्थानों पर जैसे अवध, बिहार, बुंदेलखंड, अलीगढ़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव-गांव में किसान अंग्रेज़ चौकियों पर हमले करते, तहसीलें जलाते और ज़मींदारों को खदेड़ते थे।
किसानों से लेकर जमींदार तक इस संग्राम में अंग्रेजो के खिलाफ लड़े। इसका मुख्य कारण अंग्रेजों की विलय की नीति थी जिसे लॉर्ड डलहौजी ने लागू किया। इस नीति के अनुसार, यदि किसी देशी रियासत का शासक बिना पुरुष उत्तराधिकारी के मृत्यु को प्राप्त होता, तो उसकी संप्रभुता समाप्त कर उसकी रियासत को ईस्ट इंडिया कंपनी में मिला लिया जाता। इस संग्राम के तीन प्रमुख नेता नाना साहेब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और बहादुर शाह दरअसल अंग्रेजों की विलय की निति के शिकार थे। इस नीति के कारण सतारा (1848), संबलपुर (1850), झांसी (1853), नागपुर (1854) और अवध (1856) जैसी बड़ी रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। इससे न केवल शासकों का अस्तित्व संकट में पड़ा, बल्कि उनके दरबारियों, सैनिकों, कर्मचारियों और आश्रितों का भी भविष्य अंधकारमय हो गया, क्योंकि उनके संसाधन और आजीविका अचानक समाप्त हो गई। अवध के किसान और जमींदार राजस्व बन्दोबस्त और बहुत कठोर कर से ग्रसित थे, लखनऊ के कारीगर बेरोजगारी और विऔद्योगीकरण से बदहाल थे आदि आदि। यही कारण था कि यह संग्राम पूरी जनता और व्यापक क्षेत्र का आंदोलन बन गया। इस संग्राम की व्यापकता और जन भागीदारी का पता इस लड़ाई में मरने वाले लोगो की संख्या से लगाया जा सकता है। एक अनुमान के अनुसार इस संग्राम के कुल 1.5 लाख लोगो की मौत हुई जिसमे से 1 लाख आम नागरिक थे।
बर्गीय स्वरुप: प्रभात पटनायक लिखतें है की 1857 के विद्रोह का अगर हम वर्गीय विश्लेषण करे तो मूलता यह किसानों की एक बगावत थी जिसका नेतृत्व भूस्वामी कर रहा था जिसमे छोटे सरदार और अपनी रियासतों से विस्थापित सामंती शासक भी थे, जिनको अंग्रेजों ने अलग अलग कानूनों के जरिये उनकी रियासतों से अलग कर दिया था। ब्रिटिश हुकूमत की स्थापना के साथ ही "प्रत्यक्ष विलय" या "विलय की नीति" को भी लागू करने का मतलब ही था कि ईस्ट इंडिया कंपनी को अधिशेष के बड़े हिस्से पर अधिकार मिल गया था। अंग्रेजी हुकूमत की इन नीतियों से 'कर अदा करने वाला' एक नया वर्ग भी पैदा हुआ जिसने परंपरागत भूस्वामी वर्ग की जगह ली। इसने भूस्वामियों को अंग्रेजी साशन के विरुद्ध क्रोधित कर दिया।
जब देश में लोग इस विद्रोह को केवल एक सैनिक विद्रोह करार दे रहे थे ठीक उसी यहां से हज़ारों किलोमीटर दूर कार्ल मार्क्स ने इसे केवल सैनिक विद्रोह न मानकर, पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा। उन्होंने 1857 के विद्रोह पर न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में कई लेख लिखे। मार्क्स ने लिखा कि यह केवल सिपाहियों का विद्रोह नहीं है; यह भारत के लोगों का पहला स्वतंत्रता संग्राम है, जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया।” इन लेखों में मार्क्स ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विनाश, किसानों और कारीगरों की बदहाली, तथा औपनिवेशिक शोषण के आर्थिक चरित्र का विश्लेषण किया और इस विद्रोह को औपनिवेशिक पूंजीवाद के विरुद्ध एक प्रारंभिक जन-क्रांति बताया। उनके अनुसार, यह विद्रोह यद्यपि असंगठित और पुरानी सामंती शक्तियों के नेतृत्व में था, फिर भी इसने भविष्य में एक नई क्रांतिकारी चेतना की नींव रखी।
इस विद्रोह में एक बात बड़ी दिलचस्प है कि जहां देश के दूसरे हिस्सों में ज़मींदारों ने विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ हिस्सा लिया लेकिन पश्चिम बंगाल के ज्यादातर ज़मींदार ब्रिटिशों के प्रति वफादार बने रहे। इसका प्रमुख कारण इन ज़मींदारों के अपने हित थे क्योंकि स्थाई बंदोबस्त (Permanent Settlement) प्रणाली में उनका निहित स्वार्थ था, जिसने उन्हें व्यापक शक्ति और राजस्व वसूलने का अधिकार दिया था। वे ब्रिटिश व्यवस्था को अपनी संपत्ति और अधिकार बनाए रखने का साधन मानते थे। इसके विपरीत, मध्य और उत्तर भारत के ज़मींदारों ने विद्रोह किया क्योंकि ब्रिटिश नीतियों, जैसे विलय की नीति (Annexation) और लैप्स का सिद्धांत (Doctrine of Lapse), ने उनकी पारंपरिक शक्ति को खतरे में डाल दिया था, और नई राजस्व प्रणालियों के कारण बेदखली और आर्थिक संकट पैदा हुआ, जिससे उनकी ज़मीन और प्रभाव दोनों कम हो गए।
जनता को शामिल करने के सचेत प्रयास: इस तरह हम देखते है कि जनता खुद 1857 की क्रान्ति में शामिल हुई लेकिन इसके लिए गंभीर और सचेत प्रयास भी किये गए थे। उदाहरण के लिए विपिन चंद्रा अपनी किताब 'मॉडर्न इंडिया' में लिखतें है कि 11 मई को दिल्ली पर कब्ज़ा करने और बहादुर शाह जफ़र को हिंदुस्तान का महाराजा (बादशाह) घोषित करने के साथ ही सिपाहियों ने सैनिक बगावत को एक क्रांतिकारी युद्ध में तब्दील कर दिया।
इस मामलें में 25 अगस्त 1857 को मुग़ल शहज़ादे फिरोज़ शाह की घोषणा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है जो उस समय की अनेक जन असंतोषों को सूचीबद्ध करती है और कुछ ठोस वायदों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को विद्रोही ध्वज के नीचे आकर्षित करने का प्रयास करती है। यह घोषणा ज़मींदारों से अपील के साथ आरंभ होती है: अंग्रेज़ उन पर भारी कर लगा रहे थे, जबकि बादशाही सरकार केवल उपज का आधा हिस्सा कर के रूप में लेगी; जो ज़मींदार धन और सैनिकों से सहायता करेंगे उन्हें कर-मुक्त किया जाएगा, और जो केवल धन देंगे उन्हें केवल उपज का चौथाई हिस्सा कर के रूप में देना होगा। इसके अतिरिक्त, उनकी ‘साधारण रैयतों’ के मुकाबले गरिमा की रक्षा की जाएगी। व्यापारियों को धन से सहायता दी जाएगी और उन्हें अपने माल के परिवहन के लिए सरकार की भाप-जहाजों और भाप-गाड़ियों का लाभ मिलेगा, यह एक विशेष रूप से ‘आधुनिक’ परियोजना प्रतीत होती है। सरकारी कर्मचारियों और सैनिकों का वेतन बढ़ाया जाएगा। कारीगरों को रोज़गार देने का वादा किया गया, उनकी वर्तमान स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया गया: यूरोपियों ने अंग्रेज़ी वस्तुएँ भारत में लाकर बुनकरों, कपड़ा साफ़ करने वालों, बढ़ईयों, लोहारों और मोचियों आदि को बेरोज़गार कर दिया है, यहां तक कि हर प्रकार का देशी कारीगर भिक्षावृत्ति की हालत तक पहुँच गया है। अंततः, ‘पंडितों, फकीरों और विद्वानों’ (हिंदू और मुसलमान दोनों) को ज़मीन दी जाएगी, बशर्ते वे विद्रोहियों के पक्ष में घोषणा करें। यह स्पष्ट है कि समाज के लगभग हर वर्ग, किसानों तक से, अपील की गई।
हिन्दू मुस्लिम एकता: 1857 के विद्रोह में एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू है, हिंदू–मुस्लिम एकता। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही वर्गों पर ब्रिटिश शासन की नीतियां आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से प्रतिकूल थीं। दोनों समुदायों को कर, जमीन संबंधी दमन और धार्मिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा। इस साझा अनुभव ने एकता की आधारशिला रखी। यह भी महत्वपूर्ण था कि बंगाल की आर्मी में विभिन्न जातियों से सम्बंधित हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो के सैनिक थे। यह हिन्दू मुस्लिम एकता का आधार बना जो इससे पहले नहीं देखा गया था। जैसे हिन्दू और मुस्लिम सिपाही एक साथ मिल कर लड़े उसी तरह हिन्दू और मुस्लिम तालुकदार और राजा भी एकजुट हुए। सामान्य नागरिक, हिन्दू और मुस्लिम दोनों ने मिल कर बहादुरी के साथ अंग्रेजो के खिलाफ लड़े और अंग्रेजों के दमन का सामना लिया।
विद्रोहियों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को अपना प्रतीकात्मक नेता चुना। लखनऊ में बेगम हजरत महल ने नेतृत्व किया, अवध में मौलवी अहमदुल्ला शाह और तात्या टोपे, कानपुर में नाना साहेब और अजीमुल्ला खाँ, झांसी में रानी लक्ष्मीबाई सबने मिलकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। मौलवी अहमदउल्लाह शिया और सुन्नी दोनों मुसलमानों को एकजुट करने में सफल रहे। दिल्ली में बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में हनुमान मंदिर के पुजारी और जामा मस्जिद के इमाम दोनों मिलकर निर्णय लेते थे। यह एक साझा भारतीय पहचान के लिए संघर्ष था।
हालांकि बहुत से लोग इस पहलू को कमतर आंकते है और हिन्दू और मुस्लिम शासको के क्षेत्र को लड़ाई का हिन्दू और मुस्लिम केंद्र के तौर पर पेश करते हैं। लंबे समय से कुछ इतिहासकार यह मानते आए हैं कि नाना साहब और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई मुख्यतः ‘हिंदू’ केन्द्रों का प्रतिनिधित्व करते थे, जबकि दिल्ली और बरेली को विशेष रूप से ‘मुस्लिम’ केन्द्र माना जाता था, और यह मान लिया जाता था कि इनके बीच किसी न किसी प्रकार का परस्पर वैमनस्य अवश्य था। इस मामले में जुलाई 1857 में कानपूर से मुद्रित नाना साहब की अंतिम उल्लिखित घोषणा महत्वपूर्ण है। यह धारणा कितनी ग़लत थी, यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि नाना साहब का इश्तिहार न केवल उर्दू में प्रकाशित हुआ और उस पर हिजरी तिथि अंकित थी। जहाँ तक झाँसी की रानी का सवाल है, उनके कुछ सबसे दृढ़ योद्धा मुस्लिम तोपची और पठान अंगरक्षक थे। तथाकथित ‘मुस्लिम’ पक्ष की ओर देखें तो मई 1857 में दिल्ली की जामा मस्जिद से जिहाद का झंडा इसलिए हटा दिया गया था कि कहीं यह समझा न जाए कि इसका लक्ष्य हिंदुओं के विरुद्ध है, और मुसलमानों के ईद-उज़-ज़ुहा त्योहार पर गाय और भैंस की बलि पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
राजत कांत राय ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक फेल्ट कम्युनिटी में विद्रोहियों की मानसिकता का विस्तार से विश्लेषण किया है। उन्होंने विशेष रूप से इस तथ्य को रेखांकित किया कि 1857 के व्यापक विद्रोह में, प्रतिभागियों के मन में धार्मिक भेदभाव की भावना आश्चर्यजनक रूप से कम थी, चाहे वे सिपाही हों या आम नागरिक। हिंदू टुकड़ियाँ मुसलमानों को अपना प्रतिनिधि चुन लेती थीं; मुस्लिम टुकड़ियाँ किसी हिंदू सूबेदार मेजर को अपना प्रमुख स्वीकार कर लेती थीं। जो मुसलमान स्वेच्छा से इस विद्रोह में शामिल हुए, उन्होंने इसे एक धार्मिक रूप से न्यायोचित युद्ध माना और मुझाहिद कहलाए (जिसे अंग्रेज़ी अधिकारियों ने अपनी आधिकारिक अनुवाद में ‘कट्टरपंथी’ कहकर अक्सर ग़लत ढंग से वहाबी आंदोलन से जोड़ा)। लेकिन उनके बीच भी यह गहरी समझ थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को मिलकर एक साझा उद्देश्य के लिए लड़ना है: लक्ष्य केवल अंग्रेज़ थे।
असफलता में छिपे सफलता के सबक: 1857 का विद्रोह बहुत ही बहादुरी और कुर्बानियों के साथ लड़ा गया लेकिन अपना मकसद हासिल नहीं कर पाया और अंतता अंग्रेजी सेना ने इसे कुचल दिया। हम इस विद्रोह की समीक्षा नहीं कर रहें है लेकिन इसकी असफलता के कारणों के जरिये कुछ सबक लेने का प्रयास मात्र है। सबसे बड़ी सीमा तो अंग्रेजी सेना और विद्रोहियों की सेनाओं के बीच की बड़ी खाई थी। अंग्रेजों के पास आधुनिक सेना और विकसित युद्ध रणनीति थी। ब्रिटिश सेना के पास आधुनिक तोपखाना और बंदूकें थीं, जबकि विद्रोही पारंपरिक हथियारों पर निर्भर थे। टेलीग्राफ ने अंग्रेजों को तेजी से संदेश भेजने में मदद की।
यह विद्रोह कोई योजनाबद्ध तरीके कल्पना नहीं कि गई थी। विद्रोह का कोई एक केंद्रीय नेता या संगठन नहीं था। प्रत्येक केंद्र अपने स्थानीय नेता के अधीन स्वतंत्र रूप से लड़ रहा था। सेनाओं के बीच समन्वय की कमी थी। विद्रोह मुख्य रूप से उत्तरी और मध्य भारत तक ही सीमित रहा। कई रियासतों ने जैसे दक्षिण भारत की कई रियासतों हैदराबाद, ग्वालियर के कुछ हिस्से, कश्मीर, पंजाब, बंगाल और राजपूताना के अधिकांश शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया। सिख सैनिक, जिनके साथ 1840 के दशक में अंग्रेजों का युद्ध हुआ था, इस बार अंग्रेजों की तरफ से लड़े। विद्रोह अपेक्षाकृत तेजी से फैल गया, पर उसे योजनाबद्ध और दीर्घकालिक स्वरूप नहीं मिला। इसके आलावा विद्रोहियों को विदेशी सहयोग (संभव नहीं) या अंदरूनी विस्तृत समर्थन नहीं मिला। इसके विपरीत, ब्रिटिशों को ब्रिटेन से, अन्य देशों से, और भारत के अन्य भागों से सहायता मिली।
इस समय तक देश में मज़दूर वर्ग बड़े स्तर पर पैदा नहीं हुआ था जो इस विद्रोह में अपनी भूमिका निभा पाता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी विद्रोह की सफलता के लिए राजनीतिक पार्टी का बहुत महत्व होता। विश्व इतिहास इसका साक्षी है। हमारे देश में इस समय तक सामंती व्यवस्था ही और किसी तरह की कोई भी राजनैतिक पार्टी या उसका कोई समकक्ष नहीं था जो विद्रोह को दिशा दे पाता। विद्रोह में भाग लेने वाले अधिकांश नेता सामंती वर्ग से थे, जिनका लक्ष्य पुरानी व्यवस्था को बहाल करना था, न कि एक लोकतांत्रिक राष्ट्र का निर्माण करना।
दूरगामी प्रभाव: 1857 का विद्रोह भले ही सैन्य दृष्टि से असफल रहा, परंतु यह ऐतिहासिक व गहरा प्रभाव छोड़ गया जिससे हमारे देश के समाज में कई परिवर्तन देखने को मिले। इस विद्रोह का प्रभाव तुरंत दिखा जब बड़े स्तर पर प्रशासनिक बदलाव किये गए। विद्रोह के बाद, ब्रिटिश संसद ने 1858 का भारत सरकार अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज (क्राउन) के अधीन हो गया, भारत का गवर्नर-जनरल अब 'वायसराय' कहलाने लगा, लंदन में भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद सृजित किया गया, जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था और भारतीय परिषद अधिनियम 1861 पारित किया गया, जिसमें वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया, जिसमें कुछ भारतीयों को नामांकित किया गया।
सेना का पूर्ण पुनर्गठन किया गया, यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई और तोपखाना पूरी तरह से उनके हाथ में दे दिया गया। 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत, सेना में विभिन्न जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों को भर्ती किया जाने लगा, ताकि वे एकजुट न हो सकें। गोरखा, सिख और पंजाबी रेजीमेंटों को, जिन्होंने विद्रोह में अंग्रेजों का साथ दिया था, विश्वसनीय माना गया और उनकी संख्या बढ़ा दी गई।
विद्रोह से सबक लेते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने रियासतों के प्रति अपनी नीति में बदलाव किया। 'विलय की नीति' को समाप्त कर दिया गया और दिखावे के लिए ही सही देशी रियासतों के प्रति सम्मान की नीति अपनाई गई और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य का 'सहयोगी' घोषित किया गया। सरकार ने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया और धार्मिक सहिष्णुता की नीति की घोषणा की। जमींदारों के अधिकारों की रक्षा की गई ताकि उनका समर्थन हासिल किया जा सके। इन सब के बावजूद विद्रोह के बाद अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की खाई और गहरी हो गई। 'श्वेत' और 'अश्वेत' के बीच की रेखा और स्पष्ट हो गई। अंग्रेज स्वयं को एक 'श्रेष्ठ नस्ल' मानने लगे।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन हमेशा 1857 के विद्रोह से प्रेरणा लेता रहा। एक तरफ तो यह विद्रोह हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनी, वहीं औपनिवेशिक शोषण और राजस्व नीतियों के प्रति जनता में जन-जागरूकता बढ़ी। इसने एक ऐसी राष्ट्रीय चेतना का सूत्रपात किया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के लोगों ने पहली बार एक साझा शत्रु के खिलाफ संघर्ष किया। 1857 का विद्रोह भारतीयों में राजनीतिक चेतना को उजागर करने वाला पहला जन-आंदोलन था।
वर्तमान समय में प्रासंगिकता: 1857 केवल एक सैन्य विद्रोह नहीं था, बल्कि साम्राज्यवादी दमन, आर्थिक लूट, सामाजिक अपमान, और राजनीतिक अधिकारों के अपहरण के खिलाफ जनता की सामूहिक पुकार थी। हांसी की लाल सड़क, मेवात के गांव, अवध की गलियाँ, दिल्ली की सरज़मीन, झांसी का किला, इन सबने मिलकर उस महान जनांदोलन की तस्वीर रची, जिसने भारतीय समाज की गहराइयों में छिपे असंतोष को ज्वालामुखी की तरह फाड़कर बाहर ला दिया। इन संघर्षों और बलिदानों ने न केवल अंग्रेजी साम्राज्यवाद की नींव हिलाई, बल्कि आगामी पीढ़ियों को भी यह संदेश दिया कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध अपरिहार्य है ।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हमारी स्कूल की किताबो में मंगल पांडेय के आलावा केवल कुछ राजा और महारानियों का जिक्र ही नाम के साथ 1857 के विद्रोह में आता है लेकिन असल में देश के दूर दराज इलाको में जीवन के सभी क्षेत्रों से कई स्थानीय सामान्य नागरिक कई समूहों के दृढ़ नेता बन कर उभरे और इन में से कई तो महानायक बने जिन्हें आज भी दंतकथाओं में याद किया जाता है। यह विद्रोह औपनिवेशिक पूंजीवाद के खिलाफ एक प्रारंभिक वर्ग-संघर्ष था, जिसमें किसान, दस्तकार और मजदूर वर्ग ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई। यह पहला आंदोलन था जिसमें विभिन्न भाषाएं, धर्म और जातियों ने एक साझा पहचान की ओर रुख किया। यह राष्ट्रीय चेतना की शुरुआत थी।
आज हमारे देश में जब सत्ता पर काबिज हिंदुत्ववादी हुकूमत ही देश को धार्मिक आधार पर बांट रही है और अपने देश के नागरिक अल्पसंख्यकों को बाहरी और पराया घोषित कर शत्रु के तौर पर पेश कर रही है तो, अपने जीवन के अंतिम दिनों में एक ग़ज़ल के हिस्से के तौर पर लिखा गया बहादुर शाह ज़फ़र का मशहूर शेर याद आया है, "कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए, दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में"। कितना प्यार है अपने वतन के लिए और दर्द है देश की मिट्टी से दूर होने का, एक ऐसे व्यक्ति का जिसे 1857 के विद्रोहियों ने देश का बादशाह घोषित किया था। और आज उसे देश का नहीं बाहरी करार दिया जाता है उन लोगों द्वारा जो हथियार बने हमारे देश में अंग्रेजों की फूट डालों और शासन करो की नीति का। यह सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सबक लिया था अंग्रेजों ने इस विद्रोह से। यह साबित करता है कि अगर देश को जनता एकजुट हो तो बड़ी से बड़ी हुकूमत की जड़ें हिला देती है। इसलिए अंग्रेजो ने हमारे देश में मज़हबी तौर पर जनता में फूट डाली। उनकी इसी नीति में सहयोगी बने मुस्लिम और हिन्दू कट्टरपंथी और उनके संगठन। इसी के चलते तीन सांप्रदायिक संगठनों का गठन किया, 1906 में मुस्लिम लीग (जिसे बाद में मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने कब्जे में ले लिया), 1915 में हिंदू महासभा (जिसे बाद में बालकृष्ण शिवराम मुंजे और विनायक दामोदर सावरकर ने अपने कब्जे में ले लिया), और 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसे केशव बलिराम हेडगेवार ने माधव सदाशिव गोलवलकर, प्रभाकर बलवंत दानी, मधुकरराव भागवत (वर्तमान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के पिता) और अन्य की सहायता से बनाया था। ये सभी महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे। ये तीनों संगठन भारतीय जनता के गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहे और वास्तव में इन संगठनों के द्वारा सांप्रदायिक आधार पर स्वाधीनता आंदोलन में अवरोध पैदा कर धोखा देने का काम किया ।
जब पूरा देश की जनता आज़ादी की लड़ाई में एकजुट थे तो सावरकर और जिन्ना तथा उनके संगठन देश को सांप्रदायिक आधार पर बाँटने में अंग्रेजों के साथ खड़े थे। आज भी अगर देश की जनता को अपने सबसे बड़े शत्रु हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ को हराना है तो एकता के साथ अपने आर्थिक शोषण के खिलाफ व साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ना होगा। वर्तमान समय में 1857 की क्रांति का यही सबसे बड़ा सबक है और यही करना ही देश की जनता की इस इस महान विद्रोह के महान शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है।
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(लेखक SFI के पूर्व अखिल भारतीय महासचिव और अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।)
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