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लेनिन — एक समझौताहीन अडिग क्रांतिकारी और आजीवन संग्रामी

राजीव कुमार पाण्डेय•22 अप्रैल 20269 मिनट पठन52 बार पढ़ा गया
दर्शन का प्राथमिक उद्देश्य केवल अमूर्त चिंतन नहीं है, बल्कि दुनिया और मानव जीवन का रूपांतरण और वास्तव में, उसका बेहतर बनाना है।
लेनिन — एक समझौताहीन अडिग क्रांतिकारी और आजीवन संग्रामी

लेख:- श्रीदीप भट्टाचार्य(बांग्ला में लिखा गया)

(गणशक्ति से साभार)

आज कॉमरेड लेनिन की 157वीं जयंती है। कॉमरेड व्लादिमीर इलिच लेनिन एक शोषण-मुक्त समाज की स्थापना के लिए हुए क्रांतिकारी संघर्ष के एक असाधारण नेता थे। वे एक ऐसे क्रांतिकारी नेता थे, जिन्होंने पूंजीवादी शोषण और उसके वर्चस्व का अंत किया और इस प्रकार एक सर्वहारा राज्य—यानी, एक समाजवादी राज्य—की स्थापना की। मार्क्सवाद से प्रेरणा लेते हुए, व्लादिमीर लेनिन सर्वहारा वर्ग के क्रांतिकारी संघर्ष के पहले सफल सूत्रधार थे। सिद्धांत और व्यवहार के बीच सामंजस्य बिठाने की क्षमता ही एक सच्चे क्रांतिकारी की पहचान होती है; कॉमरेड लेनिन इस के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक के रूप में हमारे सामने आते हैं। लेनिन का संपूर्ण क्रांतिकारी जीवन सिद्धांत और कर्म के एक असाधारण मेल को दर्शाता है। एक ओर, उन्होंने नई परिस्थितियों के संदर्भ में मार्क्सवादी सिद्धांतों को समृद्ध करने के अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा किया। दूसरी ओर, एक ऐसे दौर में जब पूंजीवाद विकसित होकर साम्राज्यवाद के चरण में पहुँच चुका था, उन्होंने रूस में सर्वहारा क्रांति को सफलतापूर्वक साकार करके यह सिद्ध कर दिया कि ऐसी क्रांति वास्तव में संभव है, यहाँ तक कि एक अपेक्षाकृत पिछड़े पूंजीवादी राष्ट्र में भी।

मार्क्सवाद प्रयोग का एक सिद्धांत

मार्क्स की सिद्धांत और दर्शन की समझ उनके अपने लेखन से स्पष्ट रूप से झलकती है। अपने ग्रंथ *Theses on Feuerbach* (फायरबाख पर थीसिस) की ग्यारहवीं थीसिस में, मार्क्स ने कहा था: "दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की केवल अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की है; लेकिन असली बात तो इसे बदलना का है।" दूसरे शब्दों में, दर्शन का प्राथमिक उद्देश्य केवल अमूर्त चिंतन नहीं है, बल्कि दुनिया और मानव जीवन का रूपांतरण और वास्तव में, उसका बेहतर बनाना है। मार्क्स और एंगेल्स का ऐतिहासिक योगदान द्वंद्ववाद (dialectics) को आदर्शवाद से मुक्त कराने और उसे भौतिकवाद के साथ एकीकृत करके 'द्वंद्वात्मक भौतिकवाद' के दर्शन की स्थापना करने में निहित है।

जिस समय लेनिन मार्क्सवाद को लागू करने के संघर्ष में जुटे हुए थे, उसी समय "द्वंद्वात्मक भौतिकवाद" पर वैश्विक पूंजीवादी खेमे द्वारा लगातार हमला हो रहा था। विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं की आड़ में, वैज्ञानिक प्रगति की गलत व्याख्या करके द्वंद्ववाद को गलत साबित करने के व्यापक प्रयास किए गए। मार्क्सवादी दर्शन (और विशेष रूप से द्वंद्ववाद)!की रक्षा के संघर्ष में लेनिन ने एक निर्णायक नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।

 "अनुभव-आलोचना" (Empirio-criticism) के बैनर तले माखवादियों (Machists) द्वारा किए गए हमलों का मुकाबला करने के लिए, लेनिन ने अपना महत्वपूर्ण ग्रंथ *Materialism and Empirio-criticism* (भौतिकवाद और अनुभव-आलोचना) लिखा।

उन्होंने द्वंद्ववाद के दर्शन को, जो पहले मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों तक ही सीमित था, बदलकर कुछ ऐसा बना दिया जो आम लोगों के लिए भी सुलभ और समझने योग्य हो। "किसी विशिष्ट परिस्थिति का ठोस विश्लेषण ही द्वंद्ववाद का सार है।"

कहने का तात्पर्य यह है कि द्वंद्ववाद का अर्थ है किसी विशिष्ट और वर्तमान परिस्थिति को सटीक रूप से समझने की क्षमता। यद्यपि महान दार्शनिक हेगेल अंततः एक आदर्शवादी निष्कर्ष पर पहुँचे थे, फिर भी लेनिन उन्हें बहुत सम्मान देते थे, क्योंकि द्वंद्वात्मक दर्शन की नींव रखने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

एक सच्चे द्वंद्वात्मक भौतिकवादी के रूप में, लेनिन किसी भी चीज़ को अपरिवर्तनीय नहीं मानते थे। हर चीज़ परिवर्तन और विकास की एक निरंतर प्रक्रिया के भीतर मौजूद होती है, जिसे गति (motion) द्वारा संचालित किया जाता है। द्वंद्ववाद के ही दृष्टिकोण से उन्होंने साम्राज्यवाद का अपना विश्लेषण किया था।

साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की सर्वोच्च अवस्था

मार्क्स और एंगेल्स (क्रमशः 1883 और 1895 में) की मृत्यु के बाद, लेनिन ने वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद और उसके विकास का सटीक आकलन और विश्लेषण करने का ऐतिहासिक कार्य अपने हाथों में लिया। अपने विकास क्रम में, प्रतिस्पर्धी पूंजीवाद का प्रारंभिक दौर एकाधिकार पूंजीवाद में बदल गया। साम्राज्यवाद, ठीक इसी एकाधिकार पूंजीवाद के चरण का प्रतिनिधित्व करता है। साम्राज्यवाद की विशेषताओं पर चर्चा करते हुए, लेनिन ने पाँच विशिष्ट लक्षणों की पहचान की। पहली विशेषता राष्ट्रीय आर्थिक जीवन के सभी क्षेत्रों में एकाधिकारों (monopolies) के वर्चस्व की स्थापना है। साम्राज्यवाद की एक और निर्णायक विशेषता "वित्तीय पूंजी" (finance capital) का उदय है, जो बैंकिंग पूंजी और औद्योगिक पूंजी का एक सम्मिश्रण है। यह वित्तीय पूंजी, जो नए बाजारों की तलाश में सदैव बेचैन रहती है, साम्राज्यवाद की कार्यप्रणाली के भीतर विदेशी क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने और उन्हें लूटने के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति पाती है।

भले ही साम्राज्यवादी राष्ट्रों के बीच दुनिया का वैश्विक बँटवारा पूरा हो चुका हो, फिर भी उनके बीच संघर्ष अपरिहार्य बना रहता है। ऐसे संघर्ष या युद्ध ठीक नए बाजारों पर कब्ज़ा करने की होड़ से ही उत्पन्न होते हैं। लेनिन ने यह दिखाया कि साम्राज्यवाद के युग में, युद्ध एक अपरिहार्य घटना है। 1945 तक की वैश्विक घटनाओं के घटनाक्रम ने इस व्याख्या और विश्लेषण को सही साबित किया। हालाँकि, 1945 के बाद का काल जो 1973 तक चला वैश्विक पूंजीवाद के लिए अभूतपूर्व समृद्धि का एक चरण (एक "तेजी का दौर" या "बूम पीरियड") साबित हुआ। 1970 का दशक, जो "वैश्विक तेल संकट" के इर्द-गिर्द केंद्रित था, वित्त पूंजी के संकेंद्रण और केंद्रीकरण में अकल्पनीय वृद्धि का गवाह बना। इस प्रकार वैश्वीकरण के युग की शुरुआत हुई। वित्तीय पूंजी विकसित होकर "अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी" का रूप धारण कर लिया। अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी की अवधारणा का निर्माण केवल लेनिन द्वारा वित्तीय पूंजी के संबंध में किए गए मौलिक विश्लेषण को आधार बनाकर ही संभव हो सका। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर साम्राज्यवादी वर्चस्व स्थापित करने के विस्तारित अवसर प्रदान किए हैं (विशेष रूप से उन्हें नव-उदारवादी नीतियाँ अपनाने के लिए विवश करके)। इसके अतिरिक्त, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के इस युग में, हालांकि साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच अंतर्विरोध अभी भी विद्यमान हैं, तथापि वे अपेक्षाकृत मंद पड़ गए हैं; ये अंतर्विरोध अब विश्व युद्धों के रूप में नहीं फूट रहे हैं, हालाँकि क्षेत्रीय संघर्ष अभी भी देखने को मिल रहे हैं।

वर्तमान समय में, हम संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी आक्रामकता को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का अपहरण, तथा फ़िलिस्तीन और ईरान पर किए गए क्रूर हमले—ये सभी आक्रामक साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा ही रचे गए षड्यंत्र हैं।

क्रांतिकारी संघर्ष और पार्टी

पूंजीवाद से पैदा हुए व्यापक संकट, जो समाज और सभ्यता के हर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुका है, को हल करने का एकमात्र साधन स्वयं पूंजीवाद का उन्मूलन है। केवल सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में होने वाली क्रांति ही पूंजीवाद का अंत करने में सक्षम है। इस क्रांति की आयोजक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी है—यानी, कम्युनिस्ट पार्टी। यह एक नए प्रकार की पार्टी है और इसका निर्माण श्रमिक वर्ग के साथ-साथ समाज के अन्य वर्गों से भी सदस्यों को भर्ती करके किया जाता है। यह पार्टी मार्क्सवादी विचारधारा से निर्देशित होती है। इसमें बौद्धिक कुशाग्रता और वर्ग संघर्ष से प्राप्त अनुभव के आधार पर स्थितियों का आकलन करने की क्षमता होती है। यह पार्टी सर्वहारा वर्ग और शोषित जनता की सामूहिक शक्ति का सटीक अनुमान लगाने में सक्षम है। ठीक इसी तरह की एक पार्टी का निर्माण रूस में कामरेड लेनिन के नेतृत्व में किया गया था। परिणामस्वरूप 1905 की असफल क्रांति के सबक सीखते हुए और स्टोलिपिन की प्रतिक्रियावादी ताकतों का सामना करते हुए बोल्शेविक पार्टी (रूसी कम्युनिस्ट पार्टी) नवंबर क्रांति को सफलतापूर्वक संपन्न कराने के संघर्ष का नेतृत्व करने में सक्षम हो सकी।

अत्यधिक लचीलेपन और स्थितियों के आलोचनात्मक विश्लेषण की क्षमता से युक्त यह पार्टी, साम्राज्यवादी घेराबंदी के बावजूद, एक ही देश के भीतर समाजवाद के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने में सक्षम रही। कामरेड लेनिन और रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने मार्क्सवादी सिद्धांत और द्वंद्वात्मकता के सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए आगे कदम बढ़ाए।

लेनिन ने सर्वहारा वर्ग के क्रांतिकारी संघर्ष और क्रांतिकारी पार्टी यानी, कम्युनिस्ट पार्टी के बीच के द्वंद्वात्मक संबंध को सही ढंग से समझा। इस पार्टी का गठन पूरी तरह से सक्रिय और सक्षम सदस्यों द्वारा किया जाता है। यह अनुशासन और लोकतांत्रिक केंद्रीयवाद के मूल सिद्धांतों का पालन करते हुए अपने कार्यों का संचालन करती है। श्रमिक वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी में किसी भी उत्पन्न होने वाली स्थिति का सामना करने की क्षमता होनी चाहिए। इसे श्रमिकों और किसानों सहित जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों के साथ मजबूत संबंध बनाकर आगे बढ़ना चाहिए। पार्टी को द्वंद्वात्मकता को अपनी नींव बनाकर आगे बढ़ना चाहिए।

हमें कम्युनिस्ट पार्टी के संबंध में लेनिन की अमूल्य शिक्षाओं का पालन करते हुए कार्य करना चाहिए। उच्च गुणात्मक क्षमता वाले सदस्यों के बिना ऐसी पार्टी का निर्माण करना असंभव है। पार्टी के प्रत्येक सदस्य को स्वयं को एक ऐसे लड़ाके के रूप में ढालना चाहिए जो वैचारिक रूप से दृढ़, समझौता न करने वाला और पार्टी के निर्णयों को लागू करने में अपनी पूरी पहल समर्पित करने वाला हो। इस उद्देश्य को साकार करने के लिए, सी पी आई एम एक 'जन-आधारित' (mass line) क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण के आह्वान के साथ आगे बढ़ रही है।

हमें लेनिन की शिक्षाओं को आत्मसात करके आगे बढ़ना चाहिए

कॉमरेड लेनिन ने सिखाया था कि बुर्जुआ व्यवस्था में निहित सकारात्मक तत्वों विशेष रूप से संसदीय लोकतंत्र का उपयोग कम्युनिस्टों द्वारा वर्गीय आंदोलनों और जन संघर्षों के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है और किया जाना भी चाहिए। इसी शिक्षा को आत्मसात करके हमें आगे बढ़ना है।

कम्युनिस्टों के लिए कार्य-पद्धति का मार्गदर्शन, मौजूदा परिस्थितियों के अनुकूल समायोचित रणनीतियाँ अपनाने से होता है, जबकि व्यापक रणनीति पर उनकी नज़र पूरी तरह से टिकी रहती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में, हमें एक साथ दो मोर्चों पर काम करना है: हमें आरएसएस-भाजपा (जो कॉर्पोरेट हितों और हिंदुत्व विचारधारा के गठजोड़ का प्रतिनिधित्व करने वाला एक शक्तिशाली गठबंधन है) को रोकना है, और साथ ही तृणमूल कांग्रेस को भी हराना है। यह एक ऐसी पार्टी है जिसकी पहचान तानाशाही, भ्रष्टाचार और कम्युनिस्टों के प्रति घोर शत्रुता से होती है। राज्य के विधानसभा चुनावों के लिए यही हमारी रणनीतिक कार्य-पद्धति है।

हमारी रणनीति और कार्य-पद्धति पर आधारित निर्णयों को लागू करने के लिए अटूट समर्पण और दृढ़ संकल्प, दोनों की ही आवश्यकता होती है। यह भी कॉमरेड लेनिन द्वारा दी गई एक मूल्यवान शिक्षा है। कम्युनिस्टों के पास चुनौतियों का सीधे-सीधे सामना करने के लिए आवश्यक साहस मौजूद है। उसी साहस को संबल बनाकर और सर्वहारा क्रांति के असाधारण नेता, कॉमरेड वी.आई. लेनिन की शिक्षाओं को आत्मसात करके अब हमें राज्य के विधानसभा चुनावों में अपनी उचित भूमिका निभाने के लिए आगे कदम बढ़ाना चाहिए।

कॉमरेड लेनिन जो वैचारिक मामलों में कभी समझौता न करने वाले और संघर्ष के मैदान में निडर रहने वाले व्यक्तित्व थे की जयंती के अवसर पर, यही हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

(लेखक सी पी आई एम के पोलित ब्यूरो के सदस्य है)

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लेनिन — एक समझौताहीन अडिग क्रांतिकारी और आजीवन संग्रामी

प्रकाशित: 22 अप्रैल 2026 • 9 मिनट पठन

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विश्लेषण

जंतर-मंतर जेन-जी दमन : कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का बर्बर चेहरा। ~ केशव भट्टड़

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।

केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

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सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।

लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।


केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

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