क्रांतिकारी इतिहास का एक चिंतनीय पक्ष
और जन्मदिन पर बिस्मिल की याद
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शहीदों और क्रांतिकारियों पर विगत कई वर्षों से विपुल मात्रा में लेकिन बहुत भ्रामक ढंग से लिखा जा रहा है। ऐसा करने वालों में वाम और दक्षिण दोनों तरह के लोग हैं जिनका क्रांतिकारी परम्परा से कोई जुड़ाव न होने के साथ ही उनमें उस इतिहास के वैचारिक विकास की समझ का भी नितांत अभाव है। ऐसे में यह चिंतनीय है कि आखिर जानबूझ कर विकृत की जा रही उस ऐतिहासिक चेतना और उसकी विरासत के संरक्षण के लिए हम किन तरीकों और कोशिशों को अपनाएं ?
अधिकांश लोग भारतीय क्रांतिकारी संग्राम के नायकों में भगत सिंह को ही ’एकमात्र क्रांतिकारी इतिहास’ मानते हुए उनके आगे-पीछे देखना छोड़ कर सिर्फ उनके दस्तावेजों-बयानों और पत्रों आदि का संकलन अपने नाम के साथ चस्पां कर और उन्हें बेचने के खुशफहम उपक्रम को क्रांति की सेवा मानने लग गए हैं। आख़िर क्या कारण है कि सैकड़ों भगत सिंह-प्रेमियों के रहते-होते अब तक भगत सिंह की एक भी फुललेंथ की जीवनी नहीं लिखी जा सकी ? भगत सिंह के पूर्ववर्ती विप्लवी संग्राम और उसके साथ ही चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह के नेतृत्व में बने दल के अन्य क्रांतिकारी सदस्य प्रायः पूरी तरह उपेक्षित और चर्चा से बाहर बने रहने के पीछे क्या कारण है ? अनेक प्रश्नों के मध्य सांकेतिक तौर पर सिर्फ इतना ही कि क्यों किसी प्रगतिशील खेमे की ओर से एक बार भी ’बम का दर्शन’ जैसे क्रांतिकारी संघर्ष के सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेज रचने वाले शहीद भगवतीचरण की न तो जन्मशती मनाई गई और न ही गांधी के 'कल्ट ऑफ द बम' का ऐतिहासिक प्रत्युत्तर देने वाले इस गंभीर, विवेकशील और लक्ष्य को ओर सीधे इस पर्चे पर कोई विमर्श सम्पन्न किया गया जो इसकी ऐतिहासिक आवश्यकता और उसकी भविष्यगामी ज़रूरत व दृष्टिकोण को सामने रख पाता। क्या यह हम सबकी ओर से जानबूझ कर किया जाने वाला ऐतिहासिक गुनाह नहीं है ?
आज काकोरी (1925) के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के जन्मदिन पर उनकी चर्चा के मध्य हम यह विस्मृत करना नहीं भूलते कि विगत कुछ समय से बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला की जोड़ी को याद करने की सुखद कवायद के बीच उनके समय की क्रांतिकारी पार्टी के अन्य सदस्यों और उनके चिंतन को भी उसी तरह इतिहास-बदर करने वाला रवैया कुछ कम सोचनीय नहीं है। इतिहास से अपनी सुविधानुसार कुछ नायकों का चयन और शेष को छोड़ देने की प्रवृत्ति उसे पूर्णता में देखने में बाधक है। अंततः क्रांतिकारी आन्दोलन के संचालन के लिए किसी सुगठित और वैचारिक चेतना से लैस तथा लक्ष्य को समर्पित किसी दल की हमें ज़रूरत है जो क्रांति के संचालन और उसके सम्पन्नता के बाद क्रांतिकारी ढंग से सत्ता का भी संचालन कर सके। सम्पूर्ण पार्टी को अनुपस्थित कर एक-दो क्रांतिकारी व्यक्तियों और प्रतीकों की पूजा-आराधना ही की जा सकती है जिसे हम करते ही आ रहे हैं।
याद करिए कि शाहजहांपुर में काकोरी शहीदों का जो स्मारक ध्वस्त किया गया, फिर उसका क्या हुआ ?
आज बिस्मिल के जन्मदिन पर फेसबुक पर उन्हें याद करने वालों की लम्बी कतार है। बिस्मिल के शहर में उनका मकान लापता है। पूजावादी लोग उसे ही उनका जन्मस्थान मान कर फूल चढ़ाने लग गए जिस पर उनकी शहादत के बाद मां ने सस्ती जमीन खरीद कर रहना शुरू कर दिया था। पीड़ा के साथ कहना पड़ता कि अपनी गुज़र-बसर के लिए बिस्मिल की मां को पहले अपने कुछ गहने और बाद को भूमि का वह टुकड़ा भी बेचना पड़ा जहां उनके क्रांतिकारी पुत्र ने जन्म लिया था। आर्थिक तंगी में पिता नहीं रहे और कुछ दिन बाद बिस्मिल का छोटा भाई सुशील भी चिकित्सा के अभाव में टी.बी. से घुटकर मर गया। यह शहर में लिए अत्यंत लज्जा की बात है। हां, आज़ादी के बाद ’शहीद द्वार’ और ’शहीद संग्रहालय’ का निर्माण हमारी संसदीय राजनीति की जानी-मानी फितरत है जिस पर हम कतई मुग्ध नहीं हैं। इन पर क्रान्तिकारियों के हत्यारे पुष्पांजलि करते हैं।
इसी 23 मार्च को सवेरा होते-होते जब हमें खबर मिली थी कि हमारे शहर में काकोरी शहीदों के प्रतिमाओं को रात्रि के अंधेरे में 3 बजे ध्वस्त कर मलवा बाहर डंपिंग ग्राउंड में फिंकवा दिया गया जो हमारे ऊपर बड़ी चोट थी। हमारे त्वरित प्रतिरोध के चलते टूटी शहीद मूर्तियों को जोड़-गाँठ कर पुनर्स्थापित कर दिया गया लेकिन यह हमारी प्रसन्नता का विषय नहीं था। अब तक यह रहस्मय है कि आख़िर यह ध्वस्तीकरण क्यों हुआ ? नगर निगम से लेकर समस्त जनप्रतिनिधियों की चुप्पी षड्यंत्र को और भी गहराती है।
अजब है कि इस घटना के बाद हड़बड़ी में ही नहीं, बल्कि दिखावे और लीपापोती के लिए सौन्दर्यीकरण के लिए नामित फर्म फ्लाई इंफ्राटेक को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया जिसने उच्च न्यायालय में पहुंच कर कहा कि वह रात में काम नहीं करती और उनका बुलडोजर या कर्मचारी उस रात्रि में वहां उपस्थित नहीं था। अब नगर निगम और सत्ता के हुक्मरान क्या करें ? आगे यह हुआ कि फर्म को भी 'काली सूची' से हटा दिया गया और फर्म को आपूर्ति की भी अनुमति दे दी गई, इस शर्त के साथ कि तीन माह तक उसके निर्माण कार्य पर रोक रहेगी और निर्णय बाद में लिया जायेगा। खुदा हो तो इन सबकी खैर करे!
हमारा यह जो शहर बिस्मिल के माता-पिता और उनके बीमार भाई के इलाज और उनके लिए एक सम्मानजनक मृत्यु मुहैया नहीं करा सका, वह क्या ही उनके ईंट-पत्थर के बेजान स्मारकों की सुरक्षा कर सकेगा! हालांकि यह लिखते हुए मैं बहुत लज्जित हूँ।
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नोट : नीचे के चित्र में शाहजहांपुर के टाउन हाल में टूटी शहीद प्रतिमाओं को जोड़कर बनाया गया उपेक्षित पड़ा प्रतिमा स्थल।
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साभार: सुधीर विद्यार्थी
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