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क्या शांति समझौता सचमुच शांति लाएगा?: गीतश्री सरकार

राजीव कुमार पाण्डेय•20 जून 20268 मिनट पठन37 बार पढ़ा गया

युद्ध का प्रभाव केवल युद्धरत देशों को ही तबाह नहीं कर रहा, बल्कि इसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई है। आम मध्यमवर्गीय परिवार की रसोई से लेकर शेयर बाज़ार तक, हर जगह इसका असर साफ़ देखा जा सकता है।

क्या शांति समझौता सचमुच शांति लाएगा?: गीतश्री सरकार

कहानी है कि 'राजाओं के युद्ध में आम जनता (उलुखागड़ा) की जान जाती है'। क्या आज की तथाकथित स्वतंत्र दुनिया सचमुच स्वतंत्र है? अगर स्वतंत्र होती, तो क्या कोई देश बिना किसी रोक-टोक के दूसरे देश पर अंधाधुंध बमबारी और ड्रोन हमले कर पाता? लेकिन रोज़ाना यही हो रहा है। सैन्य हथियारों से समृद्ध एक शक्तिशाली देश पलक झपकते ही दूसरे देश के स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों को मलबे में तब्दील कर रहा है। बेजान पड़े बच्चों के शव, किसी आम इंसान की खुली रह गईं आँखें, मलबे के नीचे दबे बुजुर्ग—क्या इन्होंने युद्ध की घोषणा की थी? या फिर ये परमाणु बम बना रहे थे?

युद्ध का प्रभाव केवल युद्धरत देशों को ही तबाह नहीं कर रहा, बल्कि इसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई है। आम मध्यमवर्गीय परिवार की रसोई से लेकर शेयर बाज़ार तक, हर जगह इसका असर साफ़ देखा जा सकता है; इस दौरान पेट्रोल-डीज़ल से लेकर दैनिक उपयोग की चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं। जहाँ एक तरफ आम आदमी रोज़ाना की दुर्दशा और समस्याओं से जूझ रहा है और वैश्विक राजनीति-अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँच रहा है; वहीं दूसरी तरफ सवाल यह उठता है कि क्या इन 'राजाओं', सत्ताधीशों और उद्योगपतियों को कोई समस्या हुई या फिर उनका व्यावसायिक मुनाफ़ा और बढ़ गया? अतः, लंबे समय से जारी इस तनाव और युद्ध विराम की घोषणा क्या सभी समस्याओं का स्थायी समाधान करेगी, या यह महज़ एक क्षणिक राहत है?

प्राप्त समाचारों के अनुसार, डोनाल्ड ट्रम्प, उपराष्ट्रपति वेंस और ईरान की संसद के स्पीकर ने इलेक्ट्रॉनिक रूप से इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। आगामी 19 जून को स्विट्जरलैंड में आधिकारिक तौर पर इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस MoU (Memorandum of Understanding) के मुख्य बिंदु हैं—युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करना। इस समझौते के माध्यम से पूर्ण शांति स्थापित होगी या नहीं, इस विषय पर विशेषज्ञ हलकों में चर्चा शुरू हो चुकी है। स्वाभाविक रूप से, सभी पक्ष इस समझौते पर एकमत नहीं हैं; इज़राइल लेबनान से अपनी सेना वापस बुलाने को तैयार नहीं है, ईरान के विभिन्न गुटों में मतभेद हैं, और समझौते की शर्तों को स्वीकार करने को लेकर द्वंद्व अभी भी जारी है।

शर्तों का भँवर और भू-राजनीति

अमेरिका की मुख्य शर्त ईरान के समृद्ध यूरेनियम के भंडार को नष्ट करना है, जबकि ईरान एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि - NPT) के अनुसार शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम का भंडारण और संवर्द्धन (enrichment) करना चाहता है। ईरानी प्रशासन के अनुसार, यह उनकी राष्ट्रीय संपत्ति और राष्ट्रीय अधिकार है। दूसरी ओर, संयुक्त राज्य अमेरिका और उसका मित्र देश इज़राइल, ईरान के इस शक्ति संचय को पूरी तरह से विफल करना चाहते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य अगले 20 वर्षों के लिए ईरान को किसी भी प्रकार के यूरेनियम संवर्द्धन से रोकना है। अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षकों को भेजकर इस भंडार को नष्ट करने की शर्त रखी है। लेकिन ईरान फिलहाल अपनी इस परमाणु सैन्य क्षमता पर किसी भी चर्चा के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने आईएईए (IAEA) के निरीक्षकों को पहुँच (access) देने या भंडार को नष्ट करने की मांग का समर्थन नहीं किया है।

ईरान के मोजतबा खामेनेई होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और परमाणु ऊर्जा की रक्षा को राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा के समान मानते हैं। दूसरी ओर, सईद जलीली, पायदारी फ्रंट और तस्नीम जैसे मीडिया घरानों ने इस समझौते को 'आत्मसमर्पण' करार दिया है; वे अमेरिकी नियंत्रण के खिलाफ मुखर हैं। इसके विपरीत, ईरान की वर्तमान सरकार इस समझौते पर हस्ताक्षर करके देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के पक्ष में है।

जहाँ एक तरफ अमेरिकी प्रशासन ईरान को विभिन्न सशस्त्र समूहों की मदद करने को लेकर चेतावनी दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस समझौते की शर्त के रूप में ईरान ने लेबनान से इज़राइली सेना की वापसी की मांग की है। लेबनान को मुक्त कराना इस समझौते की प्रमुख शर्तों में से एक है, लेकिन ट्रम्प के 'बीबी' (बेंजामिन नेतन्याहू) सहित इज़राइल के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बयानों में कुछ अलग ही सुर सुनाई दे रहे हैं। ट्रम्प द्वारा नेतन्याहू को 'अधिक जिम्मेदार' (more responsible) बनने का सुझाव देने के बाद भी इज़राइल ने लेबनान में अपना सैन्य अभियान जारी रखने की पुरज़ोर वकालत की है। ईरान के दावों के अनुसार, अमेरिका के साथ समझौता वार्ता की घोषणा के बाद भी इज़राइल ने दक्षिण लेबनान पर लगभग 84 बार हमले किए हैं। अब समय ही बताएगा कि यह समग्र परिस्थिति विश्व राजनीति को किस नए मोड़ पर लाकर खड़ा करेगी। क्या वास्तव में शांति स्थापित होगी या अंततः "शांति की मधुर वाणी एक व्यर्थ उपहास बनकर रह जाएगी।"

लेबनान के मलबे में लौटते लोग

ईरान-अमेरिका युद्धविराम समझौते की घोषणा के बाद से ही, दक्षिण लेबनान के लोग खतरों की परवाह किए बिना अपने घरों को लौटने की कोशिश कर रहे हैं। वे एक तबाह हो चुके शहर और अपनों को खो चुके सूने घरों में लौट रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में लेबनान पर हुए इज़राइली हमलों के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। इन हमलों में लगभग 4,000 लोग मारे गए हैं, 11,000 लोग घायल हुए हैं और लगभग 12 लाख लोग बेघर हो गए हैं। लेबनान के प्रभावित इलाकों के लगभग 70 फीसदी घर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। इस स्थिति में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा ने आम लोगों को फिर से अपने घरों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है; हालाँकि, स्थानीय प्रशासन और सेना ने सुरक्षा स्थिति सामान्य होने तक लोगों को इन प्रभावित क्षेत्रों में न जाने की सलाह दी है।

लेबनान के लोग तो अपने घरों को लौटना चाहते हैं, लेकिन इज़राइल सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं है। आरोप लग रहे हैं कि युद्धविराम की घोषणा के बाद भी इज़राइल ने 84 बार हमले किए हैं और अब भी लेबनान के 20 प्रतिशत क्षेत्र (लगभग 570 वर्ग किलोमीटर भूमि) पर उसका कब्ज़ा है। जबकि युद्धविराम की प्रमुख शर्तों में से एक लेबनान से इज़राइली सेना की वापसी है। ट्रम्प अक्सर नेतन्याहू को अपना खास दोस्त बताते रहे हैं, लेकिन लेबनान के मुद्दे पर वही दोस्त अब ट्रम्प की बात की अनदेखी कर रहा है। चूंकि लेबनान से सेना हटाना एक मुख्य शर्त है, इसलिए माना जा रहा है कि इज़राइल का यह रुख ईरान-अमेरिका संबंधों को प्रभावित करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अपनी आंतरिक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए यह समझौता कर रहा है, जबकि इज़राइल अपनी घरेलू राजनीति के कारण लेबनान पर युद्ध जारी रखने की नीति अपनाए हुए है। इस युद्ध के ज़रिए नेतन्याहू अपनी 'राष्ट्रवादी छवि' को बनाए रखना चाहते हैं। लेबनान के मुद्दे पर ट्रम्प बार-बार नेतन्याहू को सचेत कर रहे हैं और अधिक ज़िम्मेदार होने की बात कह रहे हैं, लेकिन इज़राइल की ओर से अभी तक कोई सकारात्मक भूमिका नहीं देखी गई है। हालांकि, इस सब के बावजूद दोनों देशों और दोनों राष्ट्राध्यक्षों के संबंधों में दरार नहीं आई है, वे अभी भी अटूट हैं।आर्थिक संकट और वैश्विक विरोध

इज़राइल हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अपना सैन्य अभियान जारी रखना चाहता है, और इसके साथ ही इज़राइल के रक्षा मंत्री लेबनान, सीरिया और गाज़ा के कब्जे वाले क्षेत्रों में सेना तैनात रखने की मांग पर अड़े हुए हैं। लेबनान सरकार फिलहाल देश में हिज़्बुल्लाह के प्रभाव को कम करके शांति बहाल करने के पक्ष में है। साल 2019 से ही लेबनान भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहा है, और इस युद्ध-जनित आर्थिक संकट ने देश को मलबे के ढेर में बदल दिया है। 2019 से देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 40-45 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिसके इस युद्धकालीन परिस्थिति में और भी गहराने की आशंका है। खाद्य असुरक्षा, बेरोज़गारी, सैन्य बुनियादी ढांचे की तबाही और स्वास्थ्य क्षेत्र के चरमराने ने लेबनान को पूरी तरह पस्त कर दिया है।

इस गंभीर स्थिति में लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम राज्य की सत्ता और नियंत्रण को फिर से स्थापित करने पर ज़ोर दे रहे हैं। अमेरिका की मध्यस्थता से स्थिति को सामान्य करने के प्रयास तो चल रहे हैं, लेकिन जहाँ एक तरफ हिज़्बुल्लाह और ईरान सरकार दक्षिण लेबनान से इज़राइली सेना की पूर्ण वापसी की मांग कर रहे हैं, वहीं इज़राइल पूरी तरह से पीछे हटने के खिलाफ अपनी ज़िद पर अड़ा है। पूरी दुनिया की नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि इन चारों देशों के संबंध और यह युद्धविराम समझौता भविष्य में कौन सी नई पेचीदगियाँ लेकर आता है।

इस दौरान आयरलैंड, स्पेन, कोलंबिया सहित लातिन अमेरिकी देशों और कई यूरोपीय देशों ने गाज़ा, सीरिया, फिलिस्तीन और लेबनान पर इज़राइल के हमलों की कड़ी निंदा की है। आयरलैंड की शिन फेन पार्टी के सांसद ने तो नेतन्याहू को 'युद्ध अपराधी' (war criminal) तक करार दिया है। इसके अलावा, कई देशों के नेता इज़राइल को एक 'आतंकवादी राज्य' (terror state) के रूप में देख रहे हैं। कई देशों में इज़राइल के साथ सभी संबंध तोड़ने की मांग उठ रही है। ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स, यूरोपीय संसद, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा सहित कई देशों में इज़राइल की नीतियों का विरोध और आलोचना साफ़ देखी जा सकती है।

जी-7 (G7) की बैठक में डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यूक्रेन-रूस युद्धविराम की वकालत कर रहे हैं और बार-बार दावा कर रहे हैं कि उन्होंने कई देशों में युद्ध रुकवाने का नेतृत्व किया है। लेकिन क्या ट्रम्प अपने इस करीबी दोस्त (नेतन्याहू) को समझाने में सफल हो पाएंगे, और आज का यह बहुचर्चित युद्धविराम समझौता अंततः कितना फलदायी साबित होगा—यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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{ लेखिका जादवपुर विश्वविद्यालय की पूर्व विद्यार्थी हैं}

साभार: देशहितैषी

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प्रकाशित: 20 जून 2026 • 8 मिनट पठन

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