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फुटबॉल, बाज़ार और एक महाद्वीप का सपना - शमीक लाहिड़ी

राजीव कुमार पाण्डेय•23 जून 20264 मिनट पठन16 बार पढ़ा गया

लैटिन अमेरिका दुनिया के नक्शे पर लंबे समय से संसाधनों का भंडार तो रहा है, लेकिन सत्ता का केंद्र नहीं। सोना उत्तर की ओर गया, चांदी उत्तर की ओर गई, श्रम उत्तर की ओर गया, मुनाफा उत्तर की ओर गया। इस महाद्वीप को कई बार यह सिखाया गया है कि उसे केवल पीछे चलना है, नेतृत्व नहीं करना है।

फुटबॉल, बाज़ार और एक महाद्वीप का सपना - शमीक लाहिड़ी

फुटबॉल मैदान पर बाईस लोग दौड़ते हैं। लेकिन कभी-कभी उनके साथ कुछ और भी दौड़ता है — एक महाद्वीप की यादें, कई हार का इतिहास, कई जीतों की आकांक्षा।

ऑस्ट्रिया के खिलाफ अर्जेंटीना का मैच भी वैसी ही एक रात थी।

स्कोरबोर्ड कहेगा, 2-0। समाचार पत्रों की सुर्खियों में शायद लिखा होगा, 'मेसी के दो गोल'। या फिर इंट्रो होगा – 'पेनल्टी मिस से शुरुआत, रिकॉर्ड बनाने वाले दो गोलों के साथ अंत। लियोनेल मेसी के शानदार प्रदर्शन की बदौलत ऑस्ट्रिया को 2-0 से हराकर अर्जेंटीना ने विश्व कप के ग्रुप चरण में लगातार दूसरी जीत दर्ज की।' आंकड़े बताएंगे, 'अर्जेंटीना नॉक-आउट दौर के और करीब पहुंच गया है'।

लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

लैटिन अमेरिका दुनिया के नक्शे पर लंबे समय से संसाधनों का भंडार तो रहा है, लेकिन सत्ता का केंद्र नहीं। सोना उत्तर की ओर गया, चांदी उत्तर की ओर गई, श्रम उत्तर की ओर गया, मुनाफा उत्तर की ओर गया। इस महाद्वीप को कई बार यह सिखाया गया है कि उसे केवल पीछे चलना है, नेतृत्व नहीं करना है।

फुटबॉल उन चुनिंदा भाषाओं में से एक है, जहाँ दक्षिण (South) कभी-कभी उत्तर (North) की ओर नीचे झुककर बात नहीं करता — बल्कि आँखों में आँखें डालकर बात करता है।

अर्जेंटीना का फुटबॉल उसी भाषा का हिस्सा है।

मेसी जब पेनल्टी मिस करते हैं, तब वे एक आम इंसान होते हैं। जब वे गोल करते हैं, तब वे फिर से याद दिलाते हैं कि क्यों लाखों लोग अब भी असंभव पर भरोसा करने की भूल करते हैं। जब गेंद उनके पैरों में होती है, तो झुग्गी का बच्चा, कारखाने का मजदूर, कर्ज में डूबा किसान या रोजमर्रा के संघर्षों से थका हुआ इंसान भी कुछ पलों के लिए ही सही, यह सोच सकता है कि उसकी भी एक दिन जीत होगी, बस लड़ाई में टिके रहना है। यही फुटबॉल का जादू है, इसीलिए 'फुटबॉल दुनिया का सबसे खूबसूरत खेल है'।

ऑस्ट्रिया अनुशासित और संगठित था। लेकिन अर्जेंटीना उसी पुरानी लैटिन अमेरिकी परंपरा के साथ खेला, जहाँ फुटबॉल सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि कल्पना भी है। जहाँ गेंद सिर्फ आगे नहीं बढ़ती, बल्कि बात करती है। जहाँ ड्रिबल करना कभी-कभी विरोध का एक रूप होता है।

डी पॉल, एन्ज़ो, मैक एलिस्टर्स ने मिडफील्ड में गेंद को घुमाया। मेसी ने आगे इंतजार किया। फिर ठीक सही समय पर प्रहार किया। मानो किसी कवि ने लंबी खामोशी के बाद अचानक एक पंक्ति लिख दी हो, और पूरे महाकाव्य का रुख बदल गया हो।

इस विश्व कप में अर्जेंटीना अभी चैंपियन नहीं बना है। आगे क्या होगा, यह भी हम नहीं जानते! उनके सामने अभी और भी कठिन रास्ता है। मेसी पर निर्भर यह टीम उस रास्ते पर कितनी दूर जा पाएगी, यह भी हम नहीं जानते! लेकिन इस रात ने हमें याद दिला दिया कि वे आज भी लाखों लोगों के सपनों का स्रोत क्यों हैं! क्योंकि फुटबॉल सिर्फ गोलों का हिसाब-किताब नहीं है। यह उन दुर्लभ क्षणों में से एक है, जब इतिहास के बोझ तले दबा हुआ इंसान अचानक महसूस करता है — दुनिया अभी पूरी तरह से अमीरों के कब्जे में नहीं गई है।

इसी वजह से, मैच का मुख्य समय खत्म होने के बाद भी, स्कोरबोर्ड की रोशनी बुझने के मोड़ पर, मेसी का वह दूसरा गोल ठहर जाता है। एक गोल के रूप में नहीं, बल्कि एक याद के रूप में। उनके द्वारा बनाई गई एक और असाधारण फ्रेस्को (भित्तिचित्र) के रूप में।

शमीक लाहिड़ी

22 जून, 2026

{ लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद , 'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं}

(यदि लेख के तथ्यों और आंकड़ों में कोई त्रुटि हो, तो कोई भी सहृदय व्यक्ति उसे सुधारने में मदद करे, तो मैं उनका आभारी रहूँगा।)

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फुटबॉल, बाज़ार और एक महाद्वीप का सपना - शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 23 जून 2026 • 4 मिनट पठन

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आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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