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मिड-डे मील और इस्कॉन - मालिनी भट्टाचार्य

राजीव कुमार पाण्डेय•24 जून 20263 मिनट पठन24 बार पढ़ा गया

बच्चों की भूख को हम जो मिटा नहीं पाए हैं, उसका एक बड़ा कारण यह है कि परियोजना शुरू होने के बावजूद, नवउदारवाद के दौर में सरकारी नीतियां इसके विपरीत दिशा में चली गईं।

मिड-डे मील और इस्कॉन - मालिनी भट्टाचार्य

जब केंद्र सरकार ने स्कूलों में मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) योजना शुरू की थी, तब उसके पीछे जनहितकारी परियोजनाओं के विकेंद्रीकरण की अवधारणा थी। जिसके लिए यह परियोजना है, सामाजिक क्षेत्र में उनकी सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने का एक लोकतांत्रिक उद्देश्य उसमें निहित था। पंचायत स्तर पर महिला संचालित स्वयं सहायता समूहों को खाना पकाने और वितरण के काम से जोड़ने का भी यही रुख था।

इसमें कोई संदेह नहीं कि कागजों पर जो परियोजना थी, उसे लागू करने में कई कमियाँ रह गईं। लेकिन बच्चों की भूख को हम जो मिटा नहीं पाए हैं, उसका एक बड़ा कारण यह है कि परियोजना शुरू होने के बावजूद, नवउदारवाद के दौर में सरकारी नीतियां इसके विपरीत दिशा में चली गईं। इसे लागू करने में बढ़ती लापरवाही ने मोदी-युग में आकर इस तरह की परियोजनाओं को एक बिल्कुल ही विपरीत तर्कसंगत श्रृंखला के अंतर्गत ला खड़ा किया है। परियोजना को पूरी तरह से खत्म न करके यह कहा जा रहा है कि स्थानीय लोगों के प्रयासों से ये सब नहीं किया जा सकता। बच्चों को भोजन देने का एकमात्र उपाय यह है कि तमाम सरकारी निवेश की व्यवस्था को बड़े निजी उपक्रमों (कॉर्पोरेट) के हाथों में सौंप दिया जाए। खाद्य वितरण का केंद्रीकरण उनके हाथों में हो जो कहीं अधिक 'प्रोफेशनल' हैं।

निजीकरण का मतलब ही अधिक दक्षता नहीं होता। इस्कॉन (ISKCON) द्वारा संचालित 'अक्षय पात्र' कई अन्य राज्यों में मिड-डे मील के काम से जुड़ी हुई है। उन पर सरकारी धन के गबन से लेकर ताजा खाना न दे पाने और सरकारी चावल-आटा बाहर बेचने जैसे कई आरोप हैं। भारतीय बच्चों में लगातार बढ़ती पोषण की कमी को दूर करने में भी वे कोई भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं, तो क्या हुआ? 'हरे कृष्ण' के जाप के बावजूद वे बड़े कॉर्पोरेट व्यापारियों के अलावा और कुछ नहीं हैं। और सरकारी नीतियां तो हमें रोज समझा ही रही हैं कि इन्हीं के हाथों में हमारी लौकिक और पारलौकिक मुक्ति है।

इस्कॉन के मेनू में अंडा नहीं है, या यह इस राज्य (पश्चिम बंगाल) के बच्चों की खान-पान की आदतों के अनुकूल नहीं है, या जो लोग अभी मिड-डे मील पकाते हैं उनका क्या होगा—इस 'न्यू नॉर्मल' के दौर में कई शिक्षित लोग भी इन तर्कों को सुनने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने तो यह मान ही लिया है कि गरीब बच्चों के लिए यही बहुत है। इस्कॉन जैसी विश्व प्रसिद्ध संस्था इसकी जिम्मेदारी ले रही है, यह तो उनका सौभाग्य है। 'इसके हाथ से नहीं खाएंगे, उसके हाथ से नहीं खाएंगे' जो लोग ऐसा कहते थे, डिब्बाबंद शुद्ध भोजन मिलने पर उनके पास भी कहने को कुछ नहीं रहेगा। जहाँ कुतर्क ही तर्क बन जाए, वहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों और विकेंद्रीकरण जैसी बातों का क्या मोल? यह सरकारी शिक्षा प्रणाली के निजीकरण का ही तो एक हिस्सा है। इस राज्य की भाजपा सरकार अलग रास्ता क्यों चुनेगी?

शुभेंदु अधिकारी आपके बच्चे को 'हरे कृष्ण' कहने से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं, तो इस वजह से वे इस्कॉन को इतने बड़े ठेके से क्यों वंचित करेंगे?

यदि आप भोजन को बच्चे का अधिकार मानते हैं, यदि आप मानते हैं कि जिनका अधिकार है वे ही इसे सही तरीके से लागू कर सकते हैं और यह शक्ति उन्हीं के हाथों में होनी चाहिए, तो आंदोलन पर भरोसा रखिए।

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(लेखिका पूर्व सांसद, जादवपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की पूर्व प्रोफेसर और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की पूर्व अध्यक्ष हैं)

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मिड-डे मील और इस्कॉन - मालिनी भट्टाचार्य

प्रकाशित: 24 जून 2026 • 3 मिनट पठन

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