के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में कृषि क्षेत्र में 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,933 लोग खेतिहर मजदूर थे, जो कुल मौतों का 56.3 प्रतिशत है।
जन समाचार मंच
के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में कृषि क्षेत्र में 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,933 लोग खेतिहर मजदूर थे, जो कुल मौतों का 56.3 प्रतिशत है।

पहले किसान आत्महत्याएं ही चर्चा का केंद्र बिंदु थीं, लेकिन अब किसानों की तुलना में खेतिहर मजदूर अधिक आत्महत्याएं कर रहे हैं। लंबे समय से जमीन का टुकड़ों में बंटना, खेती में मुनाफा कम होना, कर्ज का बोझ, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और वैकल्पिक रोजगार की कमी—इन सभी कारणों से छोटे और सीमांत किसान धीरे-धीरे खेतिहर मजदूरों में तब्दील हो रहे हैं। यही आर्थिक अनिश्चितता उनमें से कई लोगों को आत्महत्या की ओर धकेल रही है।
महाराष्ट्र के वाशिम जिले के पांगरी नवघरे गांव के 40 वर्षीय राजू कालापाडे की मौत इस संकट का एक क्रूर प्रतीक है। महज दो एकड़ जमीन के मालिक राजू, खेती के साथ-साथ दूसरों के खेतों में मजदूरी का काम भी करते थे। बड़ी बेटी की शादी का खर्च उठाने के लिए उन्होंने स्थानीय साहूकारों से कर्ज मांगा, लेकिन उन्हें नहीं मिला। शादी के दिन ही उन्होंने आत्महत्या कर ली। बाद में गांव के लोगों ने चंदा इकट्ठा कर बेटी की शादी कराई।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में कृषि क्षेत्र में 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,933 लोग खेतिहर मजदूर थे, जो कुल मौतों का 56.3 प्रतिशत है। साल 2021 से पहली बार किसानों की तुलना में खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की संख्या अधिक हो गई, और तब से यह प्रवृत्ति लगातार जारी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 'किसान' और 'खेतिहर मजदूर' के बीच का अंतर धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन का बंटवारा होने और उसके छोटे होने के कारण, कई परिवारों की जमीन अब आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है। नतीजतन, उन्हें अपनी जमीन पर खेती करने के साथ-साथ दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम करना पड़ रहा है।
किसान नेता राजू शेट्टी के मुताबिक, उत्पादन लागत लगातार बढ़ने के बावजूद फसलों के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। सोयाबीन जैसी प्रमुख नकदी फसल में प्रति एकड़ लगभग 20 हजार रुपये का खर्च आने के बावजूद, बाजार भाव लंबे समय से 4,500 से 4,600 रुपये प्रति क्विंटल के बीच ही बना हुआ है। इसके कारण कर्ज बढ़ रहा है, किसान साहूकारों के चक्कर काटने को मजबूर हो रहे हैं और अंततः कई लोग आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं।
विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह है। सिंचाई की कमी, अनियमित बारिश, ओलावृष्टि, सूखा और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ने खेती को और भी अनिश्चित बना दिया है। सीमित जमीन के मालिक किसान मजबूर होकर खेतिहर मजदूरों में बदल रहे हैं, लेकिन वह मजदूरी भी परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
किसान संगठनों का दावा है कि ऋण मिलने में भेदभाव, उत्पादन लागत में वृद्धि, सरकारी सहायता की कमी और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव—इन सबने मिलकर कृषि अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। उनके अनुसार, जब तक ढांचागत समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की यह प्रवृत्ति कम नहीं होगी।
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साभार: गणशक्ति
अपलोडर: VKA-N9LYCE
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 29 जून 2026 • 3 मिनट पठन

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
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उग्र राष्ट्रवाद का गुणगान करते हुए आरएसएस और भाजपा, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को छोटा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बड़ा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। पहनावे और खान-पान जैसी चीजों को लेकर भी लोगों के बीच बंटवारा किया जा रहा है। आम जनता दैनिक जीवन की जरूरतों और समस्याओं से जूझ रही है, लेकिन फिर भी उन्हें एक-दूसरे से अलग करने की साजिश चलाई जा रही है।
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किसी भी बड़े घोटाले में अपराधी भले ही व्यक्ति हों, व्यक्तियों का समूह हो, लेकिन "छात्रों का भरोसा टूटना" सरकार की बड़ी असफलता है। सरकार केवल जांच तक सीमित न रहकर, पूरी चयन और सुरक्षा प्रक्रिया का 'रूट कैनाल ट्रीटमेंट' (जड़ से सफाई) करे। यह करना जरूरी है। किसी भी परीक्षा पेपर का लीक होना मतलब सरकारी सुरक्षा को भेद कर परीक्षा पेपर की बिक्री करने वाले गिरोह उसे सही समय पर उड़ा लेते हैं और मुंह-मांगी कीमत पर आगे बेच देते हैं। नीट पेपर का लीक होना सरकार के काम-काज की गंभीरता पर सीधा सवालिया निशान (?) है।
केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।
केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।
जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।
भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।
एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।
मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।
लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026
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