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10 में से 9 टीमें अफ्रीकी हैं

राजीव कुमार पाण्डेय•30 जून 20262 मिनट पठन34 बार पढ़ा गया

अफ्रीका के 54 सदस्य देशों के फुटबॉल विकास के लिए लगातार कड़ी मेहनत की गई है। युवा विकास, कोचिंग और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ सुशासन (गुड गवर्नेंस), वित्तीय पारदर्शिता और ऑडिट प्रणाली में सुधार के परिणामस्वरूप नए प्रायोजक (स्पॉन्सर्स) और भागीदार (पार्टनर्स) जुड़े हैं। इससे अफ्रीकी फुटबॉल और भी मजबूत हुआ है।

10 में से 9 टीमें अफ्रीकी हैं

चल रहे विश्व कप में अफ्रीकी टीमों ने शानदार प्रदर्शन किया है। इस सफलता पर कन्फेडरेशन ऑफ अफ्रीकन फुटबॉल (CAF) के अध्यक्ष पैट्रिस मोत्सेपे ने संतोष व्यक्त किया है। उनके अनुसार, युवा फुटबॉल, कोचिंग, पेशेवर लीग और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) में लंबे समय तक किए गए निवेश का परिणाम अब मैदान पर देखने को मिल रहा है।

इस बार के विश्व कप में अफ्रीका की 10 टीमों में से 9 टीमों ने नॉकआउट चरण में जगह बनाई है। अल्जीरिया, केप वर्डे, डीआर कांगो, मिस्र (इजिप्ट), घाना, आइवरी कोस्ट, मोरक्को, सेनेगल और दक्षिण अफ्रीका ने अंतिम 32 (राउंड ऑफ 32) में अपनी जगह पक्की कर ली है। केवल ट्यूनीशिया ही अपने तीनों मैच हारकर ग्रुप चरण से बाहर हुआ है।

मोत्सेपे ने कहा कि अफ्रीका के 54 सदस्य देशों के फुटबॉल विकास के लिए लगातार कड़ी मेहनत की गई है। युवा विकास, कोचिंग और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ सुशासन (गुड गवर्नेंस), वित्तीय पारदर्शिता और ऑडिट प्रणाली में सुधार के परिणामस्वरूप नए प्रायोजक (स्पॉन्सर्स) और भागीदार (पार्टनर्स) जुड़े हैं। इससे अफ्रीकी फुटबॉल और भी मजबूत हुआ है। उन्होंने नॉकआउट में पहुंचने वाले 9 देशों के फुटबॉल संघों और संबंधित सरकारों को बधाई दी। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि ये टीमें विश्व कप में और बेहतर प्रदर्शन करेंगी और पूरे अफ्रीका को गौरवान्वित करेंगी।

आंकड़े भी अफ्रीका की सफलता की गवाही दे रहे हैं। दूसरे दौर (राउंड ऑफ 32) में पहुंचने के मामले में अफ्रीका की सफलता दर 90 प्रतिशत है, जो छह महाद्वीपीय फुटबॉल संघों में सबसे अधिक है। दक्षिण अमेरिका की सफलता दर 83.33 प्रतिशत और यूरोप की 81.25 प्रतिशत है।

कतर विश्व कप में मोरक्को सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली अफ्रीकी टीम बनी थी। इस बार, उसी सफलता के सिलसिले को और आगे बढ़ाने के लक्ष्य के साथ अफ्रीका की नौ टीमें नॉकआउट चरण में उतर रही

हैं।

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साभार: गणशक्ति

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10 में से 9 टीमें अफ्रीकी हैं

प्रकाशित: 30 जून 2026 • 2 मिनट पठन

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आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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