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86 मिनट का सपना, पाँच मिनट में ही मौत: शमीक लाहिड़ी

राजीव कुमार पाण्डेय•02 जुलाई 20265 मिनट पठन27 बार पढ़ा गया

यह सिर्फ एक गोल नहीं था। यह अफ्रीका के आत्मविश्वास की घोषणा थी। हर पास, हर टैकल में इद्रिसा गाना गुए, पपे गुए, सादियो माने और इलीमान एनदिआये मानो कह रहे थे—यूरोप के नाम से बड़ा मैदान का सच होता है।

86 मिनट का सपना, पाँच मिनट में ही मौत: शमीक लाहिड़ी

फुटबॉल कभी-कभी इंसानों की तरह झूठा लालच दिखाता है।

86 मिनट तक उसने सेनेगल को इस बात का यकीन दिलाए रखा कि यह रात उनकी है। सिएटल के आसमान में तब 'तेरांगा शेरों' की दहाड़ गूंज रही थी। बेल्जियम मानो एक बूढ़ा साम्राज्य था—जिसका नाम था, यादें थीं, लेकिन रफ्तार नहीं थी। और सेनेगल? वे भविष्य थे, ताकत थे, अफ्रीका का धड़कता हुआ दिल थे।

लेकिन फुटबॉल कभी घड़ी की सुइयों के हिसाब से नहीं चलता। आखिरी सीटी बजने से पहले तक समय भी निश्चित नहीं होता।

प्रथमार्ध के 25वें मिनट में कहानी की पहली पंक्ति हबीब दियारा ने लिखी। मिडफील्ड से शुरू हुए आक्रमण के सामने बेल्जियम का डिफेंस एक पल के लिए थम सा गया। उसी जमे हुए समय के बीच से दियारा अंदर घुस गए, और उनके शॉट ने थिबॉट कोर्टुआ को छका दिया। सेनेगल 1-0।

यह सिर्फ एक गोल नहीं था। यह अफ्रीका के आत्मविश्वास की घोषणा थी। हर पास, हर टैकल में इद्रिसा गाना गुए, पपे गुए, सादियो माने और इलीमान एनदिआये मानो कह रहे थे—यूरोप के नाम से बड़ा मैदान का सच होता है।

बेल्जियम के मिडफील्ड में केविन डी ब्रुइन, यूरी टिलेमन्स और हान्स वानाकेन को गेंद मिल तो रही थी, लेकिन वे खेल की लय नहीं बना पा रहे थे। जेरेमी डोकू दौड़ रहे थे, पर सेनेगल का डिफेंस हर रास्ता बंद कर दे रहा था। उस समय सेनेगल के गोलकीपर मोरी दियाओ गोलपोस्ट के सामने इतने निश्चिंत अंदाज में खड़े थे, मानो उन्हें पता हो कि आज कोई तूफान नहीं आने वाला।

दूसरे हाफ के 51वें मिनट में फिर तूफान आया। मूसा नियाखाते के लंबे पास को छाती पर रोककर इस्माइला सार दाहिनी ओर से अंदर घुसे और ऐसा शॉट लगाया जो बेल्जियम के गोलकीपर कोर्टुआ की पहुंच से दूर जाकर जाल से चूम गया। सेनेगल 2-0।

उस पल ऐसा लग रहा था कि अफ्रीका सिर्फ जीत नहीं रहा है—मैदान, गेंद और स्कोरलाइन सब उनके परम मित्र बन चुके हैं।

बेल्जियम के कोच रूडी गार्सिया ने हाफ-टाइम के बाद एक के बाद एक कई बदलाव किए। ब्रेक के तुरंत बाद रोमेलु लुकाकू मैदान पर आए। बाद में थॉमस म्यूनिएर, डिएगो मोरेरा और निकोलस रास्किन आए। मानो शतरंज का खिलाड़ी अपनी आखिरी कुछ चालें बचाकर बैठा था।

लेकिन समय तब भी सेनेगल के पक्ष में था। 85 मिनट बीत चुके थे। स्टेडियम में कई लोग शायद मन ही मन अगले मैच के बारे में सोचने लगे थे। तभी फुटबॉल ने अचानक अपना नियम बदल दिया। 86वां मिनट। 86वें मिनट में थॉमस म्यूनिएर के नीचे रहते हुए क्रॉस पर फ्रंट पोस्ट पर डाइव लगाकर, दाहिने पैर के एक हल्के स्पर्श से रोमेलु लुकाकू ने अंतर कम कर दिया। 2-1। ठीक वैसे ही जैसे एक असली स्ट्राइकर करता है—बिजली जैसी फुर्ती से लिया गया फैसला, एक हल्का सा टच और गोल।

अब अचानक हवा का रुख बदल गया। तीन मिनट बाद, 89वें मिनट में, लिएंड्रो ट्रॉसार्ड के हवा में तैरते हुए पास का गोलकीपर मोरी दियाओ ने गलत अनुमान लगाया। उस गलती का फायदा यूरी टिलेमन्स ने उठाया। उनका हेडर सीधे जाल में समा गया। अब स्कोर 2-2 था।

महज तीन मिनट। छियासी मिनट तक संजोया गया एक सपना सिर्फ तीन मिनट में टूटने की कगार पर आ गया।

हालाँकि, एक्स्ट्रा टाइम में सेनेगल ने फिर से मौके बनाए थे। मैच के 13वें मिनट में ही इस्माइला सार का एक शानदार शॉट कोर्टुआ की उंगलियों को छूता हुआ पोस्ट से जा टकराया था। उसी पल लग गया था कि सेनेगल आज बेल्जियम की कड़ी परीक्षा लेने आया है। एक और आक्रमण को कोर्टुआ ने असाधारण कुशलता से रोक दिया।

तब स्कोरबोर्ड दोनों टीमों के बीच खड़ा होकर यह तय नहीं कर पा रहा था कि क्या लिखे!

फिर वह पल आया, जिस पर लंबे समय तक चर्चा होगी। एक्स्ट्रा टाइम आगे बढ़ते-बढ़ते ऐसा लगने लगा था कि इस मैच का फैसला पेनल्टी शूटआउट से ही होगा। दोनों टीमें थक चुकी थीं, फिर भी कोई हार मानने को तैयार नहीं था।

तभी 120+5वें मिनट में वह पल आया, जिस पर आने वाले कई दिनों तक विवाद चलेगा।

बॉक्स के अंदर यूरी टिलेमन्स गिर गए। रेफरी ने पहले खेल जारी रखा, लेकिन बाद में VAR (वीडियो असिस्टेंट रेफ्री) के बुलावे पर वे मॉनिटर देखने गए। सब कुछ देखने के बाद उन्होंने पेनाल्टी का फैसला सुनाया। सेनेगल के खिलाड़ियों ने रेफ्री को घेर लिया, विरोध किया, लेकिन फैसला नहीं बदला। टिलेमन्स ने गेंद हाथ में ली। इस एक किक से या तो इतिहास लिखा जाना था या फिर मैच पेनल्टी शूटआउट में जाना था। उन्होंने जोरदार शॉट लगाया। जाल हिल उठा। बेल्जियम 3-2।

यह शायद इस विश्व कप के इतिहास में सबसे देर से आया विजयी गोल था।

आखिरी सीटी बजते ही दो अलग-अलग दुनिया सामने आ गईं। एक तरफ लुकाकू, टिलेमन्स और कोर्टुआ थे—जो असंभव को संभव करने की खुशी में दौड़ रहे थे। दूसरी तरफ सादियो माने, इस्माइला सार और हबीब दियारा थे—जो यह समझ रहे थे कि फुटबॉल में सबसे क्रूर हार आज की है, जहाँ जीत को छूकर भी उसे थामा नहीं जा सका। उस वक्त उनके आँसू और चेहरे का पसीना मिलकर एक हो गए थे।

इस मैच में बेल्जियम सिर्फ जीता नहीं है। वे मौत के मुँह से वापस लौटे हैं।

और सेनेगल? वे स्कोरबोर्ड पर भले ही हार गए, लेकिन उनके फुटबॉल, साहस, रफ्तार और खूबसूरती ने याद दिला दिया कि—अफ्रीका का सपना अब ज्यादा दूर नहीं है। बस कभी-कभी फुटबॉल अपनी सबसे बेरहम कविता की पंक्तियां बिल्कुल आखिरी पलों में लिखता है।

( लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद, 'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)

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86 मिनट का सपना, पाँच मिनट में ही मौत: शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 02 जुलाई 2026 • 5 मिनट पठन

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