यह सिर्फ एक गोल नहीं था। यह अफ्रीका के आत्मविश्वास की घोषणा थी। हर पास, हर टैकल में इद्रिसा गाना गुए, पपे गुए, सादियो माने और इलीमान एनदिआये मानो कह रहे थे—यूरोप के नाम से बड़ा मैदान का सच होता है।
जन समाचार मंच
यह सिर्फ एक गोल नहीं था। यह अफ्रीका के आत्मविश्वास की घोषणा थी। हर पास, हर टैकल में इद्रिसा गाना गुए, पपे गुए, सादियो माने और इलीमान एनदिआये मानो कह रहे थे—यूरोप के नाम से बड़ा मैदान का सच होता है।
फुटबॉल कभी-कभी इंसानों की तरह झूठा लालच दिखाता है।
86 मिनट तक उसने सेनेगल को इस बात का यकीन दिलाए रखा कि यह रात उनकी है। सिएटल के आसमान में तब 'तेरांगा शेरों' की दहाड़ गूंज रही थी। बेल्जियम मानो एक बूढ़ा साम्राज्य था—जिसका नाम था, यादें थीं, लेकिन रफ्तार नहीं थी। और सेनेगल? वे भविष्य थे, ताकत थे, अफ्रीका का धड़कता हुआ दिल थे।
लेकिन फुटबॉल कभी घड़ी की सुइयों के हिसाब से नहीं चलता। आखिरी सीटी बजने से पहले तक समय भी निश्चित नहीं होता।
प्रथमार्ध के 25वें मिनट में कहानी की पहली पंक्ति हबीब दियारा ने लिखी। मिडफील्ड से शुरू हुए आक्रमण के सामने बेल्जियम का डिफेंस एक पल के लिए थम सा गया। उसी जमे हुए समय के बीच से दियारा अंदर घुस गए, और उनके शॉट ने थिबॉट कोर्टुआ को छका दिया। सेनेगल 1-0।
यह सिर्फ एक गोल नहीं था। यह अफ्रीका के आत्मविश्वास की घोषणा थी। हर पास, हर टैकल में इद्रिसा गाना गुए, पपे गुए, सादियो माने और इलीमान एनदिआये मानो कह रहे थे—यूरोप के नाम से बड़ा मैदान का सच होता है।
बेल्जियम के मिडफील्ड में केविन डी ब्रुइन, यूरी टिलेमन्स और हान्स वानाकेन को गेंद मिल तो रही थी, लेकिन वे खेल की लय नहीं बना पा रहे थे। जेरेमी डोकू दौड़ रहे थे, पर सेनेगल का डिफेंस हर रास्ता बंद कर दे रहा था। उस समय सेनेगल के गोलकीपर मोरी दियाओ गोलपोस्ट के सामने इतने निश्चिंत अंदाज में खड़े थे, मानो उन्हें पता हो कि आज कोई तूफान नहीं आने वाला।
दूसरे हाफ के 51वें मिनट में फिर तूफान आया। मूसा नियाखाते के लंबे पास को छाती पर रोककर इस्माइला सार दाहिनी ओर से अंदर घुसे और ऐसा शॉट लगाया जो बेल्जियम के गोलकीपर कोर्टुआ की पहुंच से दूर जाकर जाल से चूम गया। सेनेगल 2-0।
उस पल ऐसा लग रहा था कि अफ्रीका सिर्फ जीत नहीं रहा है—मैदान, गेंद और स्कोरलाइन सब उनके परम मित्र बन चुके हैं।
बेल्जियम के कोच रूडी गार्सिया ने हाफ-टाइम के बाद एक के बाद एक कई बदलाव किए। ब्रेक के तुरंत बाद रोमेलु लुकाकू मैदान पर आए। बाद में थॉमस म्यूनिएर, डिएगो मोरेरा और निकोलस रास्किन आए। मानो शतरंज का खिलाड़ी अपनी आखिरी कुछ चालें बचाकर बैठा था।
लेकिन समय तब भी सेनेगल के पक्ष में था। 85 मिनट बीत चुके थे। स्टेडियम में कई लोग शायद मन ही मन अगले मैच के बारे में सोचने लगे थे। तभी फुटबॉल ने अचानक अपना नियम बदल दिया। 86वां मिनट। 86वें मिनट में थॉमस म्यूनिएर के नीचे रहते हुए क्रॉस पर फ्रंट पोस्ट पर डाइव लगाकर, दाहिने पैर के एक हल्के स्पर्श से रोमेलु लुकाकू ने अंतर कम कर दिया। 2-1। ठीक वैसे ही जैसे एक असली स्ट्राइकर करता है—बिजली जैसी फुर्ती से लिया गया फैसला, एक हल्का सा टच और गोल।
अब अचानक हवा का रुख बदल गया। तीन मिनट बाद, 89वें मिनट में, लिएंड्रो ट्रॉसार्ड के हवा में तैरते हुए पास का गोलकीपर मोरी दियाओ ने गलत अनुमान लगाया। उस गलती का फायदा यूरी टिलेमन्स ने उठाया। उनका हेडर सीधे जाल में समा गया। अब स्कोर 2-2 था।
महज तीन मिनट। छियासी मिनट तक संजोया गया एक सपना सिर्फ तीन मिनट में टूटने की कगार पर आ गया।
हालाँकि, एक्स्ट्रा टाइम में सेनेगल ने फिर से मौके बनाए थे। मैच के 13वें मिनट में ही इस्माइला सार का एक शानदार शॉट कोर्टुआ की उंगलियों को छूता हुआ पोस्ट से जा टकराया था। उसी पल लग गया था कि सेनेगल आज बेल्जियम की कड़ी परीक्षा लेने आया है। एक और आक्रमण को कोर्टुआ ने असाधारण कुशलता से रोक दिया।
तब स्कोरबोर्ड दोनों टीमों के बीच खड़ा होकर यह तय नहीं कर पा रहा था कि क्या लिखे!
फिर वह पल आया, जिस पर लंबे समय तक चर्चा होगी। एक्स्ट्रा टाइम आगे बढ़ते-बढ़ते ऐसा लगने लगा था कि इस मैच का फैसला पेनल्टी शूटआउट से ही होगा। दोनों टीमें थक चुकी थीं, फिर भी कोई हार मानने को तैयार नहीं था।
तभी 120+5वें मिनट में वह पल आया, जिस पर आने वाले कई दिनों तक विवाद चलेगा।
बॉक्स के अंदर यूरी टिलेमन्स गिर गए। रेफरी ने पहले खेल जारी रखा, लेकिन बाद में VAR (वीडियो असिस्टेंट रेफ्री) के बुलावे पर वे मॉनिटर देखने गए। सब कुछ देखने के बाद उन्होंने पेनाल्टी का फैसला सुनाया। सेनेगल के खिलाड़ियों ने रेफ्री को घेर लिया, विरोध किया, लेकिन फैसला नहीं बदला। टिलेमन्स ने गेंद हाथ में ली। इस एक किक से या तो इतिहास लिखा जाना था या फिर मैच पेनल्टी शूटआउट में जाना था। उन्होंने जोरदार शॉट लगाया। जाल हिल उठा। बेल्जियम 3-2।
यह शायद इस विश्व कप के इतिहास में सबसे देर से आया विजयी गोल था।
आखिरी सीटी बजते ही दो अलग-अलग दुनिया सामने आ गईं। एक तरफ लुकाकू, टिलेमन्स और कोर्टुआ थे—जो असंभव को संभव करने की खुशी में दौड़ रहे थे। दूसरी तरफ सादियो माने, इस्माइला सार और हबीब दियारा थे—जो यह समझ रहे थे कि फुटबॉल में सबसे क्रूर हार आज की है, जहाँ जीत को छूकर भी उसे थामा नहीं जा सका। उस वक्त उनके आँसू और चेहरे का पसीना मिलकर एक हो गए थे।
इस मैच में बेल्जियम सिर्फ जीता नहीं है। वे मौत के मुँह से वापस लौटे हैं।
और सेनेगल? वे स्कोरबोर्ड पर भले ही हार गए, लेकिन उनके फुटबॉल, साहस, रफ्तार और खूबसूरती ने याद दिला दिया कि—अफ्रीका का सपना अब ज्यादा दूर नहीं है। बस कभी-कभी फुटबॉल अपनी सबसे बेरहम कविता की पंक्तियां बिल्कुल आखिरी पलों में लिखता है।
( लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद, 'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 02 जुलाई 2026 • 5 मिनट पठन

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
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केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।
जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।
भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।
एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।
मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।
लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026
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