काबो वर्दे विदा हो गया। लेकिन एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह नहीं। वह देश जिसका क्षेत्रफल मात्र चार हजार वर्ग किलोमीटर है, जहाँ की आबादी एक मध्यम शहर से भी कम है, जो समुद्र के बीच बिखरे कुछ ज्वालामुखी द्वीपों का समूह है — उस देश ने स्पेन को रोका है। उरुग्वे को रोका है। सऊदी अरब को रोका है। और विश्व चैंपियन अर्जेंटीना को 120 मिनट तक याद दिलाया कि — ताकत को हमेशा नक्शे के आकार से नहीं मापा जाना चाहिए।
फुटबॉल कभी-कभी विश्व चैंपियन के खिलाफ भी विद्रोह कर देता है। तब साम्राज्य को भी एक छोटे से देश के सामने जवाबदेह होने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
मियामी गार्डन्स में, अपनी छाती पर तीन सितारे सजाए अर्जेंटीना खड़ा था। और उसके सामने थी ज्वालामुखी की आग और अटलांटिक के खारे पानी से जनमा एक द्वीप समूह — काबो वर्दे।
विश्व चैंपियन बनाम नवागंतुक। इतिहास बनाम भूगोल। लेकिन फुटबॉल इतिहास की अदालत नहीं है। यहाँ हर मैच एक नया संविधान लिखता है।
प्रथमार्ध में अर्जेंटीना ने गेंद को अपने पास रखा, मानो पूरी दुनिया उनकी विरासत हो। काबो वर्दे ने गेंद छोड़ दी थी, लेकिन अपना हौसला नहीं। वे इंतजार कर रहे थे। ठीक वैसे ही, जैसे मछुआरे ज्वार का इंतजार करते हैं। एक मौके का। एक गलती का।
खेल काफी थकाऊ लग रहा था – अब यह भारतीय समयानुसार भोर के आखिरी पहर में नींद से जागकर मैच देखने की थकान थी या खेल ही थकाऊ हो रहा था! आखिरकार फीफा की ओर से आधिकारिक रूप से दिया गया 'हाइड्रेशन ब्रेक' आया, जो कि वास्तव में विज्ञापनों से कमाई बढ़ाने का एक जरिया है। खिलाड़ियों ने कार्बोनेटेड पानी या वैसा ही कुछ पिया, और हम जो थोड़े सुस्त पड़ रहे थे, चाय/कॉफी बनाकर पी और खुद को थोड़ा तरोताजा किया।
फुटबॉल का वह जादूगर क्या पीता है, मैं नहीं जानता, लेकिन वह चमक उठा; उसके बाएं पैर ने मैदान को फिर से अपनी भाषा सिखाई। लियोनेल मेसी। एक ऊंचा पास। एक हल्का सा स्पर्श। एक असंभव कोण पर जाकर शॉट। गोल। एक ऐसा गोल, जो वास्तव में गोलकीपर के खिलाफ नहीं, बल्कि वास्तविकता के खिलाफ था।
कभी-कभी लगता है कि मेसी गेंद लेकर दौड़ते नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के साथ मोल-भाव करते हैं।
सबने सोचा, अब कहानी खत्म। छोटे देशों को आमतौर पर बस इतना ही मौका दिया जाता है। थोड़ा सा सपना देखने का।
लेकिन इसके तुरंत बाद हकीकत सामने आई। काबो वर्दे ने वास्तविकता की परिभाषा ही बदल दी। हाफ-टाइम के बाद उन्होंने प्रतिद्वंद्वी को और सम्मान नहीं दिया। आँखों में आँखें डालीं। कंधे से कंधा मिलाया। डेरोए डुआर्टे के गोल ने न केवल बराबरी की, बल्कि यह घोषणा भी की — फुटबॉल किसी देश की आबादी गिनकर नहीं खेला जाता।
अर्जेंटीना को तब समझ आने लगा कि ट्रॉफी का वजन पैरों में बांधकर खेलना पड़ता है। अतीत गोल नहीं कर सकता। मैदान पर केवल वर्तमान ही रहता है।
खेल एक्स्ट्रा टाइममें चला गया। मेसी का कॉर्नर। लिसांद्रो मार्टिनेज। अर्जेंटीना एक बार फिर आगे निकल गया।
स्टेडियम में कई लोगों ने निश्चित रूप से सोचा होगा कि इतिहास अपनी जगह पर वापस आ गया है। इतिहास बड़ा आलसी है। वह एक ही कहानी बार-बार सुनाना पसंद करता है। लेकिन फुटबॉल ऐसा नहीं है।
जब लोपेज काबराल ने दूसरा गोल किया, तो ऐसा लगा मानो अटलांटिक की हवा खुद गेंद को धकेल कर ले जा रही हो। एक डिफेंडर फिसल गया। दूसरा देखता रह गया। गेंद ने मोड़ लिया। जाल डोल उठा। स्टेडियम स्तब्ध रह गया। जब कोई छोटा देश किसी बड़ी टीम के खिलाफ बराबरी करता है, तो स्कोरबोर्ड पर केवल नंबर नहीं बदलते; ताकत का संतुलन भी थोड़ा हिल जाता है।
फिर फुटबॉल की वह क्रूरता आई, जिसमें कोई दया नहीं होती। एक कॉर्नर। एक हेडर। एक अदृश्य स्पर्श। डीने बोर्जेस का शरीर। आत्मघाती गोल। फुटबॉल कभी-कभी अपनी सबसे बड़ी त्रासदी सबसे बेगुनाह इंसान से लिखवाता है। जो गोल नहीं करना चाहता था, इतिहास उसी का नाम दर्ज कर लेता है।
लेकिन काबो वर्दे अभी भी हारा नहीं था। उसने हार मानने से इनकार कर दिया था। आखिरी कुछ मिनटों में उन्होंने फिर से हमला किया। सिडनी काबराल का बाएं पैर का फ्री-किक आसमान में उठा, जैसे अटलांटिक का कोई पक्षी हो। एमिलियानो मार्टिनेज ने सिर्फ एक हाथ बढ़ाकर गेंद को ही नहीं रोका, बल्कि शायद विश्व चैंपियन के राजमुकुट को भी बचा लिया।
आखिरी सीटी बजी। अर्जेंटीना बच गया। हाँ, जीत भी गया।
लेकिन इन दो शब्दों में अंतर है। कभी-कभी सिर्फ बच जाना ही सबसे बड़ी विजय होती है। काबो वर्दे विदा हो गया। लेकिन एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह नहीं। वह देश जिसका क्षेत्रफल मात्र चार हजार वर्ग किलोमीटर है, जहाँ की आबादी एक मध्यम शहर से भी कम है, जो समुद्र के बीच बिखरे कुछ ज्वालामुखी द्वीपों का समूह है — उस देश ने स्पेन को रोका है। उरुग्वे को रोका है। सऊदी अरब को रोका है। और विश्व चैंपियन अर्जेंटीना को 120 मिनट तक याद दिलाया कि — ताकत को हमेशा नक्शे के आकार से नहीं मापा जाना चाहिए।
उपनिवेशवाद के इतिहास में छोटे देशों से बार-बार कहा गया है — तुम इंतजार करो। फुटबॉल में उन्होंने आज फिर जवाब दिया है — हम इंतजार करने नहीं आए हैं।
विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया — ट्रॉफी बड़े देश जीतते हैं। लेकिन लोगों का दिल? उसे अक्सर कोई छोटा सा देश ही जीत ले जाता है। आज उसका नाम था — काबो वर्दे।
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(लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद,'गणशक्ति'के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)
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