फुटबॉल के इतिहास में ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जो विश्व कप जीतकर भी भुला दिए गए। लेकिन रोनाल्डो जैसे इंसान बहुत कम हैं, जो विश्व कप न जीतकर भी फुटबॉल के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों की उस चुनिंदा कतार में हमेशा के लिए अमर रहेंगे।
जन समाचार मंच
फुटबॉल के इतिहास में ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जो विश्व कप जीतकर भी भुला दिए गए। लेकिन रोनाल्डो जैसे इंसान बहुत कम हैं, जो विश्व कप न जीतकर भी फुटबॉल के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों की उस चुनिंदा कतार में हमेशा के लिए अमर रहेंगे।

वह लड़का आज मैदान छोड़ कर चला गया , जो किसी राजमहल में पैदा नहीं हुआ था। जिसे मालूम नहीं था कि एक दिन करोड़ों लोग उसके नाम का नारा लगाएंगे, जय -जयकार करेंगे। जो पुर्तगाल के मादेइरा में कामकाजी लोगों की बस्ती, फुनशाल शहर के सांतो अंतोनियो इलाके में बड़ा हुआ। उसका परिवार निम्न-मध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके से था। पिता नगर पालिका में माली और पार्ट-टाइम किटमैन (सामग्री प्रबंधक) थे, और माँ रसोइया व घरेलू सहायिका का काम करती थीं। फुटपाथ के किनारे, गरीबी से लड़कर बड़े होने वाले उस लड़के का नाम है — क्रिस्टियानो रोनाल्डो (Cristiano Ronaldo)।

इस सदी में, 2006 के बाद जब भी फुटबॉल विश्व कप आता, तो लगता था—शायद इस बार। शायद इस बार वह अधूरी ट्रॉफी क्रिस्टियानो रोनाल्डो अपने दोनों हाथों में थाम लेगा। 2006, 2010, 2014, 2018, 2022, 2026... कैलेंडर के पन्ने बदलते गए, बाल सफेद होते गए, रफ्तार थोड़ी धीमी हुई, लेकिन सपना नहीं मरा। आखिरकार वह एक सपना ही बनकर रह गया। ट्रॉफी कभी हाथ न आ सकी। जिंदगी बड़ी बेरहम है,उसके पैरों के नीचे मखमल का कालीन नहीं, बल्कि कठिन, उबड़-खाबड़ पत्थर थे। लेकिन उन्हीं पत्थरों को उसने अपनी सीढ़ी बना लिया। लहूलुहान होकर भी उस सीढ़ी के एक-एक पायदान को पार करते हुए उसने यूरोप को जीता, पूरी दुनिया को जीता। गोल पर गोल, रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड, ट्रॉफी पर ट्रॉफी और दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान—सब कुछ उसकी झोली में आया।
विश्व कप उसे नहीं पा सका, लेकिन दुनिया ने उसे पा लिया।
फुटबॉल के इतिहास में ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जो विश्व कप जीतकर भी भुला दिए गए। लेकिन रोनाल्डो जैसे इंसान बहुत कम हैं, जो विश्व कप न जीतकर भी फुटबॉल के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों की उस चुनिंदा कतार में हमेशा के लिए अमर रहेंगे।
आज उसकी विदाई के इस पल में ऐसा लग रहा है, जैसे हम किसी फुटबॉलर का नहीं, बल्कि एक युग का अंत देख रहे हैं।
उनके राजमुकुट में शायद विश्व कप का वह हीरा न जड़ा जा सका हो, फिर भी इतिहास के पन्नों पर उनके नाम के आगे लिखा रहेगा—एक ऐसा इंसान, जिसने हर दिन असंभव को संभव बनाया; एक ऐसा योद्धा, जिसने आखिरी सीटी बजने तक कभी हार नहीं मानी, और न ही अपने सपने को छोड़ा।
अलविदा, रोनाल्डो।
तुम्हारे हाथों में विश्व कप की ट्रॉफी भले न सज सकी हो, लेकिन करोड़ों लोगों का दिल तुम बहुत पहले ही जीत चुके हो।
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(लेखक "देशहितैषी "साप्ताहिक पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य हैं)
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प्रकाशित: 07 जुलाई 2026 • 3 मिनट पठन

'सरकार डर गई है, वे डगमगा गए हैं। इसलिए वे फासीवादी तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाना चाहते हैं। उन्होंने लोगों के आंदोलन पर फासीवादी शैली में हमला बोला है। सरकार चाहती तो चर्चा के लिए बैठ सकती थी, बात कर सकती थी। कुछ माँगों को स्वीकार भी किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस रास्ते पर नहीं गई। असल में उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता है, इसलिए यह आक्रामकता है। पहले से ही ट्रेनें रद्द कर दी गईं, मेट्रो बंद कर दी गई, उड़ानों (एयरपोर्ट) से लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल के समय भी नहीं देखा।'
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