रेगिस्तान के तूफान के मुँह से वापसी
अर्जेंटीना - 3
(क्रिस्टियन रोमेरो 79, लियोनेल मेसी 83, एन्जो फर्नांडीज 90+3)
मिस्र -2
(यासर इब्राहिम 15', मुस्तफा जीको 67')

• शमीक लाहिड़ी
कुछ मैचों के केवल स्कोरलाइन होते हैं। कुछ मैचों की यादें होती हैं। और कुछ मैच ऐसे होते हैं, जिनका आखिरी सीटी बजने के बाद भी दर्शकों का सम्मोहन लंबे समय तक नहीं टूटता। अटलांटा की दोपहर में एक ऐसे ही मैच का जन्म हुआ।
फुटबॉल कभी-कभी अपनी सबसे क्रूर कविताएं उम्मीद की स्याही से लिखता है। वह पहले विश्वास छीन लेता है, फिर वही विश्वास वापस लौटाता है — लेकिन पहले की तरह नहीं; और अधिक भारी, और अधिक मूल्यवान बनाकर।
विश्व चैंपियन अर्जेंटीना पसंदीदा (फेवरेट) के रूप में मैदान पर उतरा था। उनकी जर्सी पर तीन सितारे थे और करोड़ों लोगों की उम्मीदें उनके कंधों पर थीं। और दूसरी तरफ मिस्र था — नील नदी का देश, पिरामिडों का देश, वह टीम जिसके लिए यह मैच केवल एक नॉकआउट नहीं था, बल्कि इतिहास के दरवाजे पर दस्तक देना था।

शुरुआत से ही साफ था कि मिस्र डरने नहीं आया है। वे गेंद के पीछे नहीं भागे; वे मौकों के पीछे भागे। मिडफील्ड में भारी दबाव, दाईं ओर से तेज आक्रमण, और मोहम्मद सालाह के हर स्पर्श के साथ अर्जेंटीना के डिफेंस में चिंता की लकीरें।
पंद्रहवें मिनट में वह चिंता हकीकत में बदल गई। एक सेट-पीस। बॉक्स के अंदर पल भर की लापरवाही। क्रिस्टियन रोमेरो और उनके साथी गेंद के बजाय जर्सी देख रहे थे। उसी बीच यासर इब्राहिम उभर कर आए। एक नपा-तुला हेडर और गेंद सीधे जाल में। 1-०।
एक पल में स्टेडियम का शोर बदल गया। अर्जेंटीना न केवल पिछड़ गया था; बल्कि उसने अपनी लय भी खो दी थी।
इस विश्व कप में उनके डिफेंस को पहले भी सवालों का सामना करना पड़ा है। केप वर्डे के खिलाफ चेतावनी के संकेत मिले थे। लेकिन आज वह चेतावनी मानो एक पूर्ण आरोप में बदल गई। फुल-बैक्स के पीछे खाली जगह, बॉक्स में कमजोर मार्किंग, क्रॉस को संभालने में घबराहट — मिस्र लगातार उन्हीं घावों पर दबाव बना रहा था।
इसके बाद एक ऐसा दृश्य आया, जो शायद भविष्य की विश्व कप डॉक्यूमेंट्रीज़ में कई बार दोहराया जाएगा। टैगलियाफिको पर फाउल। पेनल्टी। गेंद लियोनेल मेसी ने थाम ली। जिस इंसान ने अनगिनत बार असंभव को संभव किया है, उसके पैर से भी कभी-कभी गलतियां जन्म लेती हैं। शॉट। मुस्तफा शोबेइर ने बाईं ओर छलांग लगाई और एक शानदार बचाव किया।
पेनल्टी बचाना कभी-कभी गोल करने से भी बड़ी घटना बन जाता है। क्योंकि उस पल न केवल गेंद रुकती है, बल्कि प्रतिद्वंद्वी का आत्मविश्वास भी थम जाता है।
मेसी कुछ देर शांत खड़े रहे। यह दृश्य उनके कैरियर में नया नहीं है। लेकिन हर बार यह मानो लोगों को नए सिरे से याद दिलाता है — जादूगर भी गलतियां करते हैं। ऑस्ट्रिया के खिलाफ ग्रुप स्टेज में उनका शॉट गोलपोस्ट से बाहर चला गया था। वह विश्व कप के मंच पर उनकी तीसरी पेनल्टी मिस थी। विश्व कप के नियमित समय में (टाईब्रेकर को छोड़कर) मेसी इससे पहले 2018में आइसलैंड के खिलाफ और 2022में पोलैंड के खिलाफ पेनल्टी मिस कर चुके थे। नतीजतन, क्या फुटबॉल का यह जादूगर अब विश्व कप इतिहास में सबसे अधिक पेनल्टी मिस करने वाले खिलाड़ी के रिकॉर्ड का एकमात्र हकदार बन गया है?
फिर एक फ्री-किक आई। इस बार गेंद पोस्ट से टकराई। ऐसा लग रहा था कि भविष्य भी आज अर्जेंटीना के खिलाफ खेल रहा है।
पहला हाफ खत्म होने पर अर्जेंटीना के फुटबॉल में घबराहट थी, जबकि मिस्र के फुटबॉल में विश्वास था।
दूसरे हाफ में वह विश्वास और बड़ा हो गया। 67 वें मिनट में मिस्र ने आक्रमण किया। सालाह की गति के साथ अर्जेंटीना का डिफेंस तालमेल नहीं बिठा सका। गेंद मुस्तफा जीको के पास पहुंची। ठंडे दिमाग से किया गया फिनिश। 2-0।
उस पल अटलांटा के आसमान में मानो रेगिस्तान की रेत उड़ रही थी।
हालांकि उससे पहले वह पल आया था, जो शायद सालों तक काहिरा की चाय की दुकानों, अलेक्जेंड्रिया के समुद्र तटों या फुटबॉल की महफिलों में बार-बार याद किया जाएगा। दूसरी बार गेंद अर्जेंटीना के जाल में समा गई थी। मिस्र के फुटबॉलर कॉर्नर फ्लैग की तरफ दौड़ पड़े थे। बेंच खड़ी हो गई थी। स्टेडियम का एक हिस्सा यह मानने लगा था कि इतिहास का दरवाजा खुल चुका है।
तभी पर्दे के पीछे से तकनीक आकर खड़ी हो गई। VAR। इसके बाद समय पीछे लौट गया। कैमरा कुछ सेकेंड पहले मैदान के दूसरे छोर पर गया। वहां एक बूट, एक टखना और खींची हुई जर्सी दिखाई दी। और फिर तकनीक ने कहा —
'दरअसल इस गोल की कहानी यहीं से शुरू हुई थी।' उस पल मिस्र ने न केवल एक गोल गंवाया, बल्कि शायद उस आघात को भी खो दिया जो विश्व चैंपियन को पूरी तरह से धूल चटा सकता था।
लेकिन फुटबॉल बड़ा ही बेरहम है। क्योंकि वह कभी-कभी नायक नहीं चुनता, बल्कि पल चुनता है। और आज दोपहर का वह पल अर्जेंटीना के पक्ष में गवाही दे रहा था।
तब विश्व चैंपियन की विदाई कोई कल्पना नहीं थी; वह एक वास्तविक संभावना थी। लेकिन फुटबॉल का सबसे बड़ा सबक यह है — घड़ी आखिरी फैसला सुनाती है, तात्कालिक स्कोरबोर्ड नहीं।
लियोनेल मेसी ने अभी भी हार नहीं मानी थी। वह दौड़ रहे थे। गेंद को अपने पैरों में लाना चाह रहे थे। अपने साथियों को आवाज दे रहे थे। शायद उनका अनुभव ही कह रहा था कि मैच बचाने के लिए कभी-कभी कुछ पल ही काफी होते हैं।
वह पल 79 वें मिनट में आया। दाईं ओर से मेसी की सटीक डिलीवरी। क्रिस्टियन रोमेरो आगे बढ़े। हेडर। 2-1। जिस डिफेंडर की गलती से पहले गोल का रास्ता खुला था, उसी ने उम्मीद की वापसी कराई।
फुटबॉल कभी किसी को सिर्फ मुजरिम बनाकर नहीं रखता। मौका मिलने पर वह मुक्ति का दरवाजा भी खोल देता है। अचानक मैच की हवा बदल गई। मिस्र पहली बार अपनी लय से भटक गया। और अर्जेंटीना पहली बार अर्जेंटीना की तरह खेलने लगा।
चार मिनट बाद गेंद फिर मेसी के पैरों में आई। कुछ समय पहले जो इंसान पेनल्टी स्पॉट के सामने हार गया था, इस बार वही समय के खिलाफ खड़ा था। उसी भरोसेमंद बाएं पैर से शॉट। गेंद एक वक्र (कर्व) लेते हुए दूर के कोने की तरफ इस तरह निश्चित होकर बढ़ी, मानो उसने अपना पता अपने जन्म से पहले ही लिख लिया हो। मुस्तफा शोबेइर ने छलांग लगाई थी। गोलकीपर हमेशा छलांग लगाते हैं — कभी गेंद की तरफ, कभी इतिहास की तरफ। लेकिन कुछ शॉट हाथों की पहुँच से बाहर होने के लिए ही जनमते हैं। गेंद जाल से टकरा गई। 2-2।

मेसी ने न केवल बराबरी की, बल्कि कुछ मिनट पहले की अपनी विफलता के खिलाफ अपील करके फैसला ही बदल दिया। उन्होंने जश्न मनाया, लेकिन वह उल्लास से ज्यादा राहत की साँस थी। पेनल्टी मिस करने वाला इंसान एक बार फिर मैच के केंद्र में लौट आया था।
लेकिन ड्रामा अभी खत्म नहीं हुआ था। इंजरी टाइम। मिस्र ने अभी भी आत्मसमर्पण नहीं किया था। शोबेइर एक के बाद एक बचाव कर रहे थे। सालाह हर काउंटर अटैक में नया आतंक पैदा कर रहे थे। थके हुए शरीर फिर भी दौड़ रहे थे, मानो कुछ ही मिनटों में इतिहास बदल जाएगा।
फिर आया 90+3 मिनट। अतिरिक्त समय का तीसरा मिनट। मिस्र तब अतिरिक्त 30 मिनट की उम्मीद में था। अर्जेंटीना तब भी खाई के मुहाने पर था। लाउतारो मार्टिनेज ने दाईं ओर से गेंद को हवा में उछाला। और उस आसमान से नीचे आए एन्जो फर्नांडीज और हेडर। मुस्तफा शोबेइर ने हाथ बढ़ाया था। लेकिन कुछ गेंदें गोलकीपरों के लिए नहीं होतीं। वे खेल का रुख बदलने के लिए ही भेजी जाती हैं। 3-2।
उस पल सिर्फ एक गोल नहीं हुआ था। एक टीम मौत के मुँह से वापस लौट आई थी। खेल समाप्त। अर्जेंटीना बच गया।
लेकिन इस जीत के भीतर भी एक गंभीर चेतावनी छिपी है। उनका डिफेंस आज भी कमजोर है। वे तेज काउंटर अटैक को संभालने में नाकाम हो रहे हैं। बॉक्स के अंदर मार्किंग में अनुशासन की कमी साफ दिख रही है। किसी अधिक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ यह कमजोरी शायद माफ न की जाए।
और मिस्र? स्कोरबोर्ड कहेगा कि वे हार गए। फुटबॉल कहेगा कि उन्होंने विश्व चैंपियन को उसकी आखिरी सीमा तक धकेल दिया था। कभी-कभी हारने वाले ही मैच की गरिमा बढ़ा देते हैं। आज मिस्र ने ठीक वही किया।
और मेसी? वह पहले नाकाम हुए। फिर रास्ता भटके। फिर अपनी ही गलती के ऊपर से होते हुए वापस लौटे। बड़े फुटबॉलरों को शायद इसीलिए लीजेंड (किंवदंती) कहा जाता है। इसलिए नहीं कि वे कभी गलती नहीं करते; बल्कि इसलिए क्योंकि वे गलती के बीच से भी कहानी की आखिरी लाइन अपने हाथों से लिख सकते हैं।
आज अर्जेंटीना क्वार्टर फाइनल में पहुंच गया है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि आज फुटबॉल ने फिर याद दिलाया कि रेगिस्तान के सीने में भी तूफान उठते हैं, और उस तूफान से वापस भी लौटा जा सकता है। बशर्ते नेतृत्व किसी एक को करना होता है। उस दिन भी उस नेता का नाम था – लियोनेल मेसी।
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(लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद 'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)
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