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माराडोना के चार मिनट, मेसी के सात मिनट ! - शमीक लाहिड़ी

केशव कुमार भट्टड़•16 जुलाई 20267 मिनट पठन84 बार पढ़ा गया

"मैदान पर उतरीं 'फॉकलैंड युद्ध' की स्मृतियाँ; अब आगे स्पेन की 'घड़ी' बनाम अर्जेन्टीना का 'कम्पास'!"

मर्सिडीज बेंज स्टेडियम में 1986 के माराडोना युग की यादें ताजा करते हुए अर्जेंटीना ने इंग्लैंड को 2-1 से हराकर फाइनल में प्रवेश किया। 85वें मिनट तक 1-0 से पीछे चल रही अर्जेंटीना के लिए लियोनेल मेसी ने अपनी जादुई रणनीति से पहले एंजो (85') और फिर इंजरी टाइम में लाउतारो (92') का गोल करवाकर पासा पलट दिया।

फाइनल की जंग: अब फाइनल में अर्जेंटीना का मुकाबला स्पेन से होगा।

माराडोना के चार मिनट, मेसी के सात मिनट ! - शमीक लाहिड़ी

अटलांटा का स्मृति रण

माराडोना के चार मिनट, मेसी के सात मिनट

- शमीक लाहिड़ी

स्कोर बोर्ड

इंग्लैंड 1 - एंथोनी गॉर्डन - (55')
अर्जेंटीना 2 - एंज़ो फर्नांडीज - (85'), लुटारो मार्टिनेज - (90'+2')

यह केवल बूट्स की गड़गड़ाहट और चमड़े की गेंद का खेल नहीं था। यह अटलांटा के मर्सिडीज बेंज स्टेडियम में खेला गया एक ऐसा राजनीतिक और ऐतिहासिक थ्रिलर था, जहाँ हर एक पास के पीछे इतिहास का हिसाब चुकता करने की छटपटाहट थी और हर एक टैकल में लातिन अमेरिका के आत्मसम्मान की लड़ाई। 85वें मिनट तक ब्रिटेन का स्कोर मर्सिडीज बेंज स्टेडियम के स्कोरबोर्ड पर 1-0 से चमक रहा था। लेकिन फिर शुरू हुआ लियोनेल मेसी का जादुई और खामोश तख्तापलट। इतिहास ने खुद को दोहराया नहीं, बल्कि 1986 के उस सुर (Rhyme) से मिला दिया, जब डिएगो माराडोना ने मेक्सिको के एज्टेका स्टेडियम में ब्रिटेन की धज्जियां उड़ाई थीं। अर्जेंटीना ने इंग्लैंड को 2-1 से धूल चटाकर फाइनल का टिकट पक्का कर लिया है।

शमीक लाहिड़ी, 16 जुलाई। आज अटलांटा में खेले गए सेमीफाइनल की शुरुआत फुटबॉल से नहीं, बल्कि झड़पों से हुई। पहले दस मिनट में ही छह फाउल हुए; पच्चीसवें मिनट तक दस हो गए। हाफ टाइम तक यह संख्या उन्नीस तक पहुंच गई। क्या किसी ने गोल पर शॉट लगाया? एक भी नहीं। मैदान दोनों टीमों को अलग करने वाली सीमा की तरह लग रहा था, जहां हर पास से पहले टैकल और हर हमले से पहले धक्का-मुक्की का खतरा मंडरा रहा था। एलियट एंडरसन ने मेस्सी पर फाउल किया। लिसैंड्रो मार्टिनेज ने मॉर्गन रोजर्स को रोकने के लिए उन्हें नीचे गिरा दिया। क्रिस्टियन रोमेरो को भी पीला कार्ड मिला। उस क्षण से अर्जेंटीना के दोनों सेंटर-बैक ने शेष मैच में सावधानी और साहस के मिश्रण के साथ खेला।

और इंग्लैंड? उनकी रणनीति थी इंतज़ार करना। हैरी केन ने शुरुआती आधे घंटे में केवल पाँच बार गेंद को छुआ था। फिर भी, कभी-कभी स्ट्राइकर का काम केवल गेंद को छूना ही नहीं होता, बल्कि विपक्षी टीम को अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाना भी होता है। 55वें मिनट में उनका यह धैर्य रंग लाया।

55वां मिनट और धमाका:

इंग्लैंड के मॉर्गन रोजर्स ने दाहिने छोर से एक नपा-तुला क्रॉस बॉक्स में उछाला। एंथोनी गॉर्डन बिजली की तरह आगे बढ़े, गेंद को छुआ। बस इतना ही काफी था। और स्कोर हो गया 1-0। ब्रिटेन के फैंस 1966 के अपने पुराने गौरव की गूंज में डूब गए।

अर्जेंटीना इस गोल से घबराया नहीं; जोश और बढ़ गया

लेकिन अर्जेंटीना! वो इस गोल से घबराया नहीं; बल्कि उनका जोश और बढ़ गया। मैच के आँकड़े धीरे-धीरे यही कहानी बयां करने लगे: 64 प्रतिशत पज़ेशन (गेंद पर कब्ज़ा), 578 पास, 93 प्रतिशत पासिंग एक्यूरेसी (सटीकता)। इंग्लैंड के 331 पास के मुकाबले, अर्जेंटीना गेंद पर अपने कंट्रोल के ज़रिए मैदान की हर घास पर कदम रखते हुए मानो अपने हक का घोषणापत्र लिख रहा था।

इसके बाद पिकफोर्ड का दौर शुरू हुआ। उन्होंने निको गोंजालेज के हेडर को रोका। कुछ ही देर बाद, उन्होंने पास से आए एक और हेडर को भी रोक दिया। एक समय तो गोलपोस्ट ने भी उनकी मदद की। गोलकीपर सिर्फ़ गोल नहीं बचाते; वे समय भी निकालते हैं। 70वें मिनट के बाद से, पिकफोर्ड अकेले ही इंग्लैंड को फ़ाइनल की ओर ले जा रहे थे। इंग्लैंड के कोच थॉमस ट्यूशेल को भी समझ आ गया था कि क्या हो रहा है। इसलिए, एंथनी गॉर्डन की जगह एज़री कोंसा को मैदान पर उतारा गया। बाद में, डैन बर्न मैदान पर आए और रीस जेम्स को बाहर बुला लिया गया। इंग्लैंड थोड़ा और पीछे रह गया। अर्जेंटीना थोड़ा और आगे बढ़ गया।

85वां मिनट और पलटवार

खेल के 85वें मिनट में लियोनेल मेसी को बॉल मिली। मैच अभी भी इंग्लैंड के हाथ में था; स्कोरबोर्ड पर एंथनी गॉर्डन का गोल चमक रहा था, और पिकफोर्ड अभी भी निको गोंजालेज के हेडर को रोकने खुमार से उबर नहीं पाए थे। डैन बर्न पिच पर आ चुके थे और डिफेंस की आखिरी दीवार की तरह खड़े थे। तभी मेसी ने बॉल एन्ज़ो फर्नांडीज को पास की। एन्ज़ो ने दूर से एक ज़ोरदार शॉट मारा; बॉल घूमती हुई सीधे नेट के अंदर । ..और गोल। स्कोर 1-1!

इतिहास का भूगोल

और अचानक, स्टेडियम के कुछ हिस्सों में ऐसा लगा मानो लोग अटलांटा में नहीं हैं। वे उस द्वीप-समूह में थे जिसे कुछ लोग फ़ॉकलैंड्स और कुछ मालविनास के नाम से जानते हैं। वे प्यूर्टो अर्जेंटीनो—या स्टैनली—में थे। कभी-कभी, एक ही शहर के दो नाम होते हैं, और हर नाम के पीछे एक इतिहास छिपा होता है। नामों में कभी-कभी साम्राज्य भी छिपे हो सकते हैं।

फ़ुटबॉल सरहदें नहीं बदलता। फिर भी, यादें कभी-कभी बिना पासपोर्ट के सफ़र करती हैं।

उस दिन, 39 साल के उस जादूगर (मेसी) ने ज़्यादा दौड़-भाग नहीं की थी। लेकिन 1986 में, 'फ़ुटबॉल के भगवान' (माराडोना) ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सचमुच दौड़ लगाई थी। उन्होंने पिच की आधी लंबाई तय की थी। उन्होंने दुनिया के लिए एक गोल किया—'गोल ऑफ़ द सेंचुरी'। उन्होंने इतिहास के साथ अपना एक निजी हिसाब बराबर करने के लिए एक और गोल किया—'हैंड ऑफ़ गॉड'।

क्लाइमेक्स: 'इंजरी टाइम' की वो उबलती साँसे

इंजरी टाइम ; 92वां मिनट - समय समाप्त हो रहा था, आखिरी क्षण में मेसी को फिर से गेंद मिली। उन्होंने दौड़ नहीं लगाई—शायद हर पल अपना नायक खुद चुनता है। उन्होंने बस गेंद को दूर वाले पोस्ट की तरफ हवा में उछाला। लाउतारो मार्टिनेज़ ने उछलकर उस पर हेडर मारा। ... और गोल! स्कोर 2-1!

माराडोना के पास 'ईश्वर का हाथ' था। मेसी के पास समय के कंधों पर रखे दो हाथ हैं—एक जिसने एन्ज़ो के गोल का निर्माण किया, और दूसरा, लाउतारो के गोल का। अंतिम सीटी बजी। और इतिहास—जो कभी खुद को हूबहू नहीं दोहराता, लेकिन कभी-कभी एक समान लय पा लेता है—ने चुपचाप एक और तारीख अंकित कर दी: पहली थी 22 जून, 1986, मेक्सिको के एज़्टेका स्टेडियम में; और आज 15 जुलाई, 2026, अटलांटा के मर्सिडीज-बेंज स्टेडियम में। दोनों बार इंग्लैंड के खिलाफ। और दोनों बार, अर्जेंटीना फाइनल में।

लेकिन अंतर हैं। उस दिन डिएगो माराडोना मैदान पर थे और एक ऐसे देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो युद्ध में मिली हार और अपमान के घाव झेल रहा था। आज मैदान पर लियोनेल मेसी थे। वह बदले की भाषा नहीं बोलते। न ही वह इतिहास से कोई बहस करते हैं। वह बस एक याद दिलाने वाले की तरह हैं—औपनिवेशिक यादों, समुद्र के पार विवादित द्वीपों, युद्ध के मैदानों और फ़ुटबॉल की याद। लैटिन अमेरिका में, इन चीज़ों को कभी भी पूरी तरह से अलग नहीं किया जा सकता। क्योंकि फ़ुटबॉल सरहदें नहीं बदलता। फिर भी, कभी-कभी सरहद की यादें खेल खेलने के लिए मैदान पर आ जाती हैं।

फाइनल की जंग—स्पेन की 'घड़ी' बनाम अर्जेन्टीना का ' कम्पास'

अब आगे सामने स्पेन है। फ़ाइनल से पहले स्पेन को खेलते हुए देखने पर वे किसी सटीक 'घड़ी' की तरह लगते हैं: हर पुर्जा सही समय पर घूमता है, हर सुई अपनी जगह पर रहती है, और हर पास पहले से तय या 'प्री-कैलिब्रेटेड' लगता है। वे खेल के मैदान और समय पर पूरा कंट्रोल रखते हैं और तय करते हैं कि कब तेज़ी लानी है और कब खेल को धीमा करना है। इसलिए, कागज़ पर देखा जाए तो फ़ुटबॉल के अनुशासन, ज्योमेट्री और घड़ी की तरह सटीक खेलने के अंदाज़ के मामले में स्पेन बाकी टीमों से कहीं आगे है।

और अर्जेंटीना? वे बिल्कुल एक कंपास की तरह हैं। कंपास कभी समय नहीं बताता; वह रास्ता दिखाता है—कभी तूफ़ानों के बीच, कभी अंधेरे में, और कभी तब जब सारे नक्शे बेमानी हो जाते हैं। वह कंपास लियोनेल मेसी हैं। दुनिया की किसी भी दूसरी टीम के पास ऐसा खिलाड़ी नहीं है जो एक ही पास से मैच का रुख बदल सके, या एक ही पल में नब्बे मिनट के सारे हिसाब-किताब को बेमानी कर दे।

तो, फ़ाइनल में स्पेन के पास घड़ी होगी, जबकि अर्जेंटीना के पास कंपास। फ़ुटबॉल के इतिहास का वह पुराना सवाल फिर से उठेगा: क्या समय नेविगेटर को हरा सकता है, या रास्ता ही आख़िरकार समय को अपनी दिशा में मोड़ देता है?


लेखक सीपीआई (एम) की केन्द्रीय समिति के सदस्य हैं।
फोटो: एआई से निर्मित

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माराडोना के चार मिनट, मेसी के सात मिनट ! - शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 16 जुलाई 2026 • 7 मिनट पठन

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