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फुटबॉल का एक मुकम्मल थ्रिलर 'लियोनेल मेसी' - चंदन दे

केशव कुमार भट्टड़•17 जुलाई 20269 मिनट पठन56 बार पढ़ा गया

सरहदें और पासपोर्ट नफ़रत की सियासत तय कर सकते हैं, फुटबॉल का जादू नहीं; क्योंकि कला किसी सरहद तक सीमित नहीं होती। तमाम नैरेटिव, सोशल मीडिया की नफ़रत और भू-राजनीतिक लांछनों को धता बताते हुए अर्जेंटीना ने मेसी के चमत्कारी नेतृत्व में विश्वकप के फाइनल में जगह बनाई है। यह टीम महज़ आंकड़ों पर नहीं, बल्कि आखिरी पलों तक हार न मानने वाले जुझारूपन और हारते हुए मैचों को ऐतिहासिक थ्रिलर में तब्दील करने के जज़्बे से जीत रही है। मेसी का खेल उस खो चुके पारंपरिक 'जोगो बोनिटो' (फूटबाल की खूबसूरत ब्राज़ीलियन खेल शैली ) का आखिरी जीवित प्रतिनिधि है, जो सिर्फ गोल करना नहीं बल्कि दर्शकों को मुग्ध करना सिखाता है। यह फुटबॉल की उस शाश्वत खूबसूरती को रेखांकित करता है जहां हुनर के सामने उग्र राष्ट्रवाद और सरहदें घुटने टेक देती हैं, और प्रतिद्वंद्वी भी कलाकार का मुरीद हो जाता है।

फुटबॉल का एक मुकम्मल थ्रिलर 'लियोनेल मेसी' - चंदन दे

सरहदें और पासपोर्ट नफ़रत की सियासत तय कर सकते हैं, फुटबॉल का जादू नहीं; क्योंकि कला

किसी सरहद तक सीमित नहीं होती।

फुटबॉल का एक मुकम्मल थ्रिलर

लियोनेल मेसी

- चंदन दे

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कोलकाता। 17 जुलाई । नफ़रतबाज़ों के मुंह पर कालिख पोतते हुए 'कमेटी की टीम' आखिरकार फाइनल में पहुंच गई। विश्वकप शुरू होने से पहले अर्जेंटीना को लेकर न जाने कैसी-कैसी भविष्यवाणियां की जा रही थीं। किसी ने कहा कि वे आसान ड्रॉ के सौभाग्य के भरोसे आगे बढ़ रहे हैं, तो किसी ने तंज कसते हुए उन्हें 'कमेटी की टीम' का नाम दे दिया। कुछ ने तो यहां तक आरोप लगाया कि आयोजकों ने उनके लिए रेड कारपेट बिछा रखा है। लेकिन अंत में, स्कोरबोर्ड के सामने कॉरपोरेट और ट्रोलर्स के सारे नैरेटिव धरे के धरे रह गए। तमाम विरोधियों के दावों को धता बताते हुए अर्जेंटीना फाइनल में पहुंच चुका है।

आज अर्जेंटीना इंटरनेट पर आलोचना का केंद्र बिंदु बना हुआ है। ऐसा वहां के ट्रंप समर्थक सनकी शासक (हाविएर मिलेई) या किसी कूटनीतिक रुख के कारण नहीं है। अर्जेंटीना का सबसे बड़ा 'अपराध' बस इतना है कि वे हारना नहीं चाहते। वे हर नॉकआउट मैच को एक ऐसे नाटक में तब्दील कर रहे हैं, जिसका आखिरी दृश्य आखिरी सीटी बजने से ऐन पहले लिखा जाता है। उन्होंने विश्वकप के नॉकआउट को एक थ्रिलर बना दिया है, जहां वे प्रतिद्वंद्वी को यह यक़ीन दिलाते हैं कि 'बस अब खेल ख़त्म', और फिर चंद मिनटों में उस यक़ीन के परखच्चे उड़ा देते हैं।

मैच ख़त्म होने से ठीक पहले डेस्क के एक साथी पत्रकार ने कहा, "मेसी, रोनाल्डो और नेमार की तस्वीरें निकालो। फ्रंट पेज पर तीनों को अगल-बगल लगाएंगे। हेडलाइन होगी—'तीन महानायकों की विदाई'।" अखबारों की डेस्क पर ऐसा अति-आत्मविश्वास नया नहीं है। लेकिन फुटबॉल कभी-कभी कॉपी-एडिटर से भी बड़ा संपादक साबित होता है। आख़िरकार, मैदान खुद हेडलाइन लिखता है और कई बार वह कलम लियोनेल मेसी के हाथ में होती है। मिश्र (इजिप्ट) के खिलाफ अर्जेंटीना 78वें मिनट तक 2-0 से पीछे था। गैलरी में उदासी थी। सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखना शुरू कर दिया था कि 'अंत ऐसा ही होना था।' लेकिन आखिरी सीटी अभी नहीं बजी थी। 79वें मिनट से उल्टी गिनती शुरू हुई। पहले रोमेरो, फिर मेसी, और उसके बाद एन्जो फर्नांडीज। न एक्स्ट्रा टाइम, न पेनल्टी शूटआउट; निर्धारित समय के भीतर ही स्कोर 3-2 हो गया। इतिहास के पन्नों पर एक नया अध्याय दर्ज हुआ। विश्वकप नॉकआउट के इतिहास में 78वें मिनट तक 2-0 से पिछड़ने के बाद इस तरह की वापसी की कोई मिसाल नहीं मिलती। 'ऑप्टा' के आंकड़ों के मुताबिक, रोमेरो के गोल के वक्त अर्जेंटीना की जीत की संभावना महज 0.6 फ़ीसदी थी। आंकड़े कुछ और कह रहे थे, लेकिन फुटबॉल कभी-कभी गणित और लॉजिक को खारिज कर देता है—खासकर तब, जब गेंद मेसी के पैरों में हो।

इंग्लैंड के खिलाफ भी यही कहानी दोहराई गई। लंबे समय तक पिछड़ने के बाद आखिरी पलों में एन्जो फर्नांडीज का शानदार गोल और एक बार फिर ऐतिहासिक वापसी। ऐसा लग रहा था कि अर्जेंटीना सिर्फ मैच नहीं जीत रहा, बल्कि इस पूरे ड्रामे की स्क्रिप्ट खुद लिख रहा है। यही वजह है कि मेसी की कहानी सिर्फ आंकड़ों और स्टैट्स की नहीं है। 2016 में जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास की घोषणा की थी, तब अर्जेंटीना के एक किशोर के भावुक और खुले खत ने उन्हें अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था। उस वापसी के बाद कोपा अमेरिका, फिनालीसिमा, विश्वकप और अब एक और विश्वकप फाइनल। एन्जो का वह गोल मानो सालों पहले मेसी को वापस लाने वाले उसी बच्चे के फैसले का सम्मान था, क्योंकि उस भावुक खत को लिखने वाले उस किशोर का नाम भी एन्जो ही था।

इसके बावजूद आरोप नहीं थमे। सोशल मीडिया पर 'फीफा का लाडला', 'स्क्रिप्टेड वर्ल्ड कप' या 'फिक्सिंग' और 'वार-जेंटिना' जैसे लांछन लगाए गए। लेकिन अंततः मैच का फैसला सोशल मीडिया के हैशटैग नहीं, बल्कि मैदान के गोल तय करते हैं। शून्य दशमलव छह फ़ीसदी की संभावना को सच में बदल देने वाला कोई सॉफ्टवेयर अभी तक दुनिया में नहीं बना है, यह जादुई करिश्मा सिर्फ और सिर्फ मैदान पर ही मुमकिन है। इस विश्वकप में अर्जेंटीना सिर्फ एक फुटबॉल टीम नहीं, बल्कि उससे कहीं बड़ी चीज़ बनकर उभरा है।

एक बेहद वायरल पोस्ट में लिखा गया, "पूरी दुनिया अर्जेंटीना से नफ़रत करती है।" एक अन्य पोस्ट का दावा था, "इस वक्त दुनिया का सबसे नापसंद किया जाने वाला देश अर्जेंटीना है।" किसी ने सवाल उठाया, "मेसी या अर्जेंटीना के खिलाफ किसी भी नफ़रती पोस्ट को 50 हज़ार से ज़्यादा लाइक्स क्यों मिल रहे हैं?" तो किसी ने टिप्पणी की, "मेसी और अर्जेंटीना के खिलाफ नफ़रत अपने चरम पर है।" अर्जेंटीना इस विश्वकप का सबसे बड़ा 'ऑनलाइन विलेन' बना दिया गया है। कई लोग तो अर्जेंटीना का मैच सिर्फ इसलिए देख रहे हैं ताकि वे इस विश्व चैंपियन टीम को हारते हुए देख सकें। इसके पीछे सिर्फ खेल नहीं है। कतर विश्वकप के बाद से गाजा, यूक्रेन और ईरान समेत तमाम अंतरराष्ट्रीय संघर्षों ने सोशल मीडिया के विमर्श को बदल दिया है। फुटबॉल भी इस ध्रुवीकरण से अछूता नहीं रहा। मेसी के पुराने यरुशलम दौरे की तस्वीरें फिर से फैलाई गईं; नेतन्याहू के साथ उनकी पुरानी तस्वीरें दोबारा वायरल की गईं, हालांकि फैक्ट-चेकर संस्थाओं ने साफ किया कि वे तस्वीरें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की करामात थीं। नतीजा यह हुआ कि मैदान की इस जंग के साथ जियो-पॉलिटिक्स (भू-राजनीति) को भी जोड़ दिया गया। वैसे, फुटबॉल से इतर भी अर्जेंटीना को लेकर विवाद नए नहीं हैं। इस लातिन अमेरिकी देश की यूरोपीय सांस्कृतिक पहचान, अश्वेतों और मूल निवासियों को हाशिए पर धकेलने का उसका अतीत, बड़े टूर्नामेंटों के दौरान बार-बार बहस के केंद्र में आ जाता है।

लेकिन एक शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता—बेहतरीन कला या खेल किसी राष्ट्रीयता की सीमाओं में नहीं बंधते। एक समय था जब दुनिया ब्राजील के 'जोगो बोनिटो' (सुंदर खेल) की दीवानी थी, आज उसी सौंदर्यपरक कला का एक बड़ा हिस्सा मेसी के पैरों में पनाह लिए हुए है। इसीलिए, ब्राजील के कुछ कट्टर समर्थक भी छिपकर मेसी के गोल पर तालियां बजा देते हैं। प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह है, लेकिन कला के प्रति सम्मान कभी ख़त्म नहीं होता। 1982 के विश्वकप में ब्राजील के खिलाफ मैच के दौरान जब माराडोना रेड कार्ड पाकर बाहर जा रहे थे, तब सारिया स्टेडियम की दीर्घाएं सांबा की धुन पर झूम रही थीं। लेकिन उस 21 साल के नौजवान ने अपने पहले ही विश्वकप में दिखा दिया था कि इतिहास बदलने वाला नायक आ चुका है।

क्रिकेट में जो तपिश भारत-पाकिस्तान के मैच में होती है, फुटबॉल में वही जगह दशकों से ब्राजील-अर्जेंटीना की प्रतिद्वंद्विता की रही है। इन दोनों देशों का रिश्ता ऐसा है कि मानो पड़ोसी के बेटे के अच्छे नंबर आने पर अपने घर में मातम छा जाए। विश्वकप में एक-दूसरे की हार का जश्न मनाना जैसे कोई अलिखित 'राष्ट्र-कर्तव्य' हो। मगर फुटबॉल का एक अजब नियम है। झंडे चाहे कितने भी अलग हों, हुनर के सामने उग्र राष्ट्रवाद अक्सर घुटने टेक देता है। तभी तो, 1986 के विश्वकप के बाद ब्राजील के महान फुटबॉलर सुकरात ने माराडोना को 'दूसरे ग्रह का फुटबॉलर' बताते हुए कहा था, "माराडोना एक ऐसा खिलाड़ी है, जिसका समर्थन किए बिना आप रह ही नहीं सकते।" ठीक वैसे ही, जैसे उसके एक साल बाद पैदा हुए लियोनेल आंद्रेस मेसी को बार्सिलोना में पहली बार देखते ही ब्राजील के एक और महान खिलाड़ी (रोनाल्डिन्हो) ने कह दिया था, "एक दिन यह लड़का दुनिया का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनेगा।" यही फुटबॉल की असली खूबसूरती है। जर्सी का रंग जुदा हो सकता है, लेकिन कला को किसी पासपोर्ट की जरूरत नहीं होती।

देखा जाए तो जिस 'जोगो बोनिटो' (फूटबाल की खूबसूरत ब्राज़ीलियन खेल शैली ) के जादू में कभी पूरी दुनिया ब्राजील की मुरीद हो गई थी, आज खुद ब्राजील उस फुटबॉल को कितना खेल पा रहा है? गारिंचा, पेले, जिको, सुकरात, रोमारियो, रोनाल्डो, रोनाल्डिन्हो की उस समृद्ध विरासत का वारिस आज कहां है? नेमार बेशक एक अपवाद हैं, लेकिन उनके बाद क्या कोई ऐसा फुटबॉलर आया है जिसके लिए पूरी दुनिया टीवी के सामने ठहर जाए? जो गेंद पर अपने एक टच से दर्शकों को यह याद दिला दे कि फुटबॉल सिर्फ स्कोरबोर्ड का नतीजा नहीं, बल्कि एक तरह का खूबसूरत विद्रोह है? शायद यही वजह है कि आज कुछ ब्राजीलियाई लोगों की नज़रों में मेसी सिर्फ अर्जेंटीना के कप्तान नहीं हैं। वे फुटबॉल के उस खो चुके दर्शन के आखिरी जीवित प्रतिनिधि हैं, जो दर्शन कहता है—गोल करने से पहले इंसानी दिल को मुग्ध करो, उसे जीतो।

विश्वकप के दौरान साओ पाउलो के कुछ इलाकों में स्थानीय युवाओं ने चंदा इकट्ठा करके एलईडी स्क्रीन पर अर्जेंटीना के मैच देखने का इंतजाम किया था। सोशल मीडिया पर वह तस्वीर खूब घूमी। ऐसा इसलिए क्योंकि वे अर्जेंटीना के नागरिक नहीं थे, वे मेसी के फुटबॉल के नागरिक थे। उनके लिए राष्ट्रीयता 90 मिनट की थी, लेकिन कला ता-उम्र के लिए। यह कुछ वैसा ही है जैसे रवींद्र संगीत गाते-गाते अचानक नजरुल से मोहब्बत हो जाना, या सत्यजीत रे के सिनेमा से गुजरते हुए ऋत्विक घटक के दीवाने हो जाना। महान कला आखिरकार किसी एक देश के लिए नहीं खेलती, वह समूची मानवता के लिए खेलती है। इसीलिए आज भी दुनिया के अलग-अलग कोनों में ऐसे ब्राजीलियाई मिल जाएंगे जो अर्जेंटीना का समर्थन भले न करें, लेकिन मेसी के लिए चुपके से ताली बजा उठते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि विरोधी से नफ़रत की जा सकती है, लेकिन कलाकार को खारिज नहीं किया जा सकता।

दिलचस्प बात यह है कि मेसी के खिलाफ जितने आरोप मढ़े गए, वे अर्जेंटीना के अवाम के लिए उतने ही ज़्यादा 'अर्जेंटाइन' होते गए। बाहरी दुनिया ने उन्हें जितना 'विलेन' प्रोजेक्ट किया, ब्यूनस आयर्स ने उन्हें अपने राष्ट्रगान के अघोषित दूसरे अंतरे की तरह गले से लगा लिया। तभी तो, उम्र भर ब्राजील का मुरीद रहा एक आम दर्शक भी इंग्लैंड के खिलाफ मेसी के उस दूसरे गोल पर अनजाने में ही सोफे से उछल पड़ता है, चीख उठता है और फिर खुद ही थोड़ा शरमा जाता है। क्योंकि फुटबॉल कब समर्थक का पासपोर्ट छीनकर उसे महज़ एक मुग्ध दर्शक बना देता है, इसका पता किसी को नहीं चलता। यही फुटबॉल का सबसे बड़ा जादू है, और इस जादू का सबसे बड़ा जादूगर आज भी लियोनेल मेसी है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और बांग्ला दैनिक गणशक्ति के उपसंपादक हैं।

साभार बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 17 जुलाई 2026

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फुटबॉल का एक मुकम्मल थ्रिलर 'लियोनेल मेसी' - चंदन दे

प्रकाशित: 17 जुलाई 2026 • 9 मिनट पठन

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