जनता की जासूसी में मुस्तैद पर कॉरपोरेट-परस्ती में नतमस्तक ; राष्ट्रीय सुरक्षा को पूंजीपतियों के भरोसे छोड़ने वाली मोदी सरकार का राष्ट्रवाद पूरी तरह बेनकाब!
सुरक्षा में सेंध: देश के सबसे बड़े परमाणु केंद्र (कुडनकुलम) से जुड़े 8 लाख से अधिक गोपनीय दस्तावेज़ डार्क वेब पर लीक हो गए हैं।
कॉरपोरेट लापरवाही: यह संवेदनशील डेटा सरकार के कॉरपोरेट मित्र रिलायंस समूह के लचर थर्ड-पार्टी सर्वर से चोरी हुआ है।
जवाबदेही से फरार: जन-निगरानी और जासूसी में व्यस्त मोदी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर डेटा लीक पर पूरी तरह मौन है।
डिजिटल इंडिया का खोखला ढोल:
डार्क वेब पर बिका देश के सबसे बड़े परमाणु केंद्र का सीक्रेट डेटा; कॉरपोरेट-परस्ती में दांव पर राष्ट्रीय सुरक्षा!
चेन्नई। 16 जुलाई। साइबर सुरक्षा और 'डिजिटल इंडिया' का चौबीस घंटे ढोल पीटने वाली नरेंद्र मोदी सरकार की नाक के नीचे देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ एक बेहद खतरनाक खिलवाड़ सामने आया है। तमिलनाडु स्थित देश के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा केंद्र—कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (KKNPP)—से जुड़े लाखों बेहद संवेदनशील और गोपनीय दस्तावेज हैकर्स द्वारा 'डार्क वेब' पर लीक कर दिए गए हैं।
विचारकों और सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना साबित करती है कि मोदी सरकार की दिलचस्पी आम नागरिकों की जासूसी करने, उनका निजी डेटा जुटाने और विरोधियों की आवाज दबाने में जितनी है, उतनी देश के सबसे महत्वपूर्ण परमाणु बुनियादी ढांचे की सुरक्षा करने में नहीं है। सरकार की कारपोरेट-हितैषी और आउटसोर्सिंग नीतियों के कारण आज देश एक बड़े सुरक्षा जोखिम के मुहाने पर खड़ा है।
पूंजीपति मित्रों को ठेका और राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध
रॉयटर्स (Reuters) की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, 'वर्ल्ड लीक्स' (World Leaks) नामक एक खूंखार रैंसमवेयर ग्रुप ने डार्क वेब पर करीब 8 लाख 58 हजार फाइलों को सार्वजनिक कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि हैकर्स ने यह संवेदनशील डेटा किसी सरकारी महकमे से नहीं, बल्कि देश के बड़े पूंजीपति घराने—रिलायंस समूह—के सर्वर से उड़ाया है। लीक हुए दस्तावेजों में लगभग 19,000 फाइलें अत्यंत संवेदनशील श्रेणी की हैं। इनमें 2016 से 2025 के बीच तैयार किए गए परमाणु परियोजना के ब्लूप्रिंट (नक्शे), उपकरणों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों (सप्लायर्स) की जानकारी, आंतरिक बैठकों के मिनट्स, तकनीकी मूल्यांकन और इंश्योरेंस से जुड़े बेहद गोपनीय दस्तावेज शामिल हैं। विदित हो कि कुडनकुलम में 1,000 मेगावाट क्षमता की दो इकाइयां काम कर रही हैं और चार अन्य इकाइयां निर्माणाधीन हैं, जिनमें से दो के निर्माण का ठेका रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के पास है। रिलायंस ने माना है कि डेटा रखने वाली थर्ड-पार्टी कंपनी 'योटा' (Yotta) के सर्वर में सेंधमारी हुई है।
मुनाफाखोरी के चक्कर में 'सप्लाई चेन' बनी सबसे कमजोर कड़ी
इस सुरक्षा चूक ने पूंजीवादी व्यवस्था के उस ढर्रे को बेनकाब कर दिया है जहां मुनाफे के चक्कर में राष्ट्रीय महत्व के कार्यों को निजी कंपनियों को आउटसोर्स कर दिया जाता है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही मुख्य रिएक्टर का कंट्रोल सिस्टम (जो रूसी तकनीक रोसाटॉम पर आधारित है) सुरक्षित हो, लेकिन सहयोगी बुनियादी ढांचे और रणनीतिक परियोजनाओं का डेटा निजी और ठेका कंपनियों के लचर सर्वर पर छोड़ देना एक आत्मघाती कदम है। 'न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव' (NTI) के सीनियर डायरेक्टर निकोलस रथ ने चेतावनी दी है कि इस तरह का डेटा लीक होना एक "गंभीर सुरक्षा जोखिम" पैदा करता है। अगर यह जानकारी किसी दुश्मन देश या अराजक तत्वों के हाथ लग गई, तो देश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
2019 की घटना से भी नहीं लिया सबक; जवाबदेही से भागती सरकार
यह पहली बार नहीं है जब कुडनकुलम परमाणु केंद्र पूंजीवादी लापरवाही का शिकार हुआ है। इससे पहले साल 2019 में भी इस प्लांट में 'डीट्रैक' (Dtrack) नामक मालवेयर का संक्रमण हुआ था। वामपंथी दलों का सवाल है कि उस गंभीर चेतावनी के बाद भी सरकार ने रणनीतिक बुनियादी ढांचे और उसकी 'सप्लाई चेन' की साइबर सुरक्षा को पुख्ता क्यों नहीं किया? 'सर्ट-इन' (CERT-In) ने मामले की जांच तो शुरू कर दी है, लेकिन हमेशा की तरह मोदी सरकार इस महा-लापरवाही पर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ रही है। प्रचार तंत्र पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने वाली सरकार आज इस कड़वी हकीकत पर पूरी तरह खामोश है कि उसके कॉरपोरेट मित्रों की तिजोरियां तो सुरक्षित हैं, लेकिन देश का परमाणु तंत्र भगवान भरोसे है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर देश की जनता के साथ एक बड़ा धोखा है।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 16 जुलाई 2026
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