शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचलने के लिए आरएसएस से जुड़े असामाजिक तत्वों का इस्तेमाल करना दिल्ली पुलिस के लिए कोई नया नहीं है। वर्ष 2020 में भी इसी तरह से विभिन्न उग्र दक्षिणपंथी संगठनों के उपद्रवियों का इस्तेमाल कर शाहीन बाग के प्रदर्शन को खत्म कराया गया था। सांप्रदायिक दंगों का उकसावा देकर उमर खालिद सहित लोकतांत्रिक आंदोलन के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। विभिन्न हलकों से यह आरोप लग रहे हैं कि यही रणनीति इस बार भी अपनाई गई है।
दिल्ली पुलिस और केंद्रीय बलों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पेलेट गन का इस्तेमाल करने की पुरजोर कोशिश की है। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास के इस आरोप से विभिन्न हलकों में हड़कंप मच गया है। इसने कई अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। हालांकि मंगलवार को दिल्ली पुलिस ने इस आरोप से इनकार किया, लेकिन उससे पहले ही पेलेट गन की गोलियों से घायल कई युवाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाने के कारण पुलिस का यह दावा टिक नहीं सका।
हवा के दबाव से एक ही गोली में अनगिनत सीसे के टुकड़े (पेलेट) छोड़ने के लिए पेलेट गन का उपयोग किया जाता है। इस तरह की एक गोली की चोट से शरीर पर गहरे घाव, अत्यधिक रक्तस्राव और आंखों को स्थायी नुकसान होने का खतरा रहता है। जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व भारत में प्रदर्शनों को दबाने के लिए अक्सर पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया है। वर्ष 2020-21 में दिल्ली की सीमाओं पर हुए किसान आंदोलन को रोकने के लिए भी पुलिस और केंद्रीय बलों ने इसका इस्तेमाल किया था। कई देशों में इस बंदूक पर प्रतिबंध है। वर्ष 2020 में मानवाधिकार संगठन 'ह्यूमन राइट्स वॉच' और 'एम्नेस्टी इंटरनेशनल' ने एक लंबी रिपोर्ट में भारत सरकार को इस हथियार पर प्रतिबंध लगाने का संदेश दिया था।
इस बीच मंगलवार को 'फैक्ट चेक' के अंदाज में भाजपा आईटी सेल ने दावा किया है कि वायरल वीडियो वाले युवक को पेलेट गन से नहीं, बल्कि कील लगे डंडों से मारा गया है। उनका रवैया ऐसा था मानो दिल्ली में प्रदर्शन दबाने के लिए पेलेट गन से मारना गलत है, लेकिन कील लगे डंडों से मारना काफी स्वीकार्य है! हालांकि दिल्ली पुलिस ने कील लगे डंडों के इस्तेमाल की बात स्वीकार नहीं की है। उनका यह भी दावा है कि सोमवार की रैली में लाठीचार्ज बिल्कुल नहीं किया गया। पुलिस के अनुसार, केवल हल्की धक्का-मुक्की हुई थी और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिसकर्मियों ने बीच-बीच में थोड़ा धक्का देकर 'स्थिति को नियंत्रण' में किया।
दूसरी ओर, जब दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को लाठीचार्ज के वीडियो या तस्वीरें दिखाकर सवाल पूछे गए, तो वे पत्रकारों से कह रहे हैं, "कोई राजनीतिक सवाल मत पूछिए!" उनके इस हास्यास्पद व्यवहार को खुद भाजपा के ही कई नेता और कार्यकर्ता तवज्जो नहीं दे रहे हैं। आईटी सेल की ओर से आया 'कील लगे डंडे की चोट' का सिद्धांत ही इसका प्रमाण है।
आरोप यह भी उठे हैं कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन रोकने के लिए न केवल पेलेट गन का इस्तेमाल किया, बल्कि एबीवीपी, भाजपा युवा मोर्चा और बजरंग दल के लठैतों की फौज का भी इस्तेमाल किया। लाठियां हाथ में लिए बिना वर्दी वाले हट्टे-कट्टे युवकों की तस्वीरें इंटरनेट की दुनिया में पहले ही फैल चुकी हैं। उन्हें वर्दीधारी पुलिसकर्मियों के साथ ही देखा गया है। गोदी मीडिया भले ही उन्हें 'सादे कपड़ों में पुलिस' (सिविल ड्रेस पुलिस) होने का दावा कर रहा है, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों से लेकर विश्लेषकों का एक बड़ा हिस्सा कुछ और ही कह रहा है।
कंधे तक लंबे बाल, कानों में बालियां, हाथों में कड़ा-धागा पहने और चेहरे को रुमाल से बांधे इन युवकों को एक झलक देखने से ही साफ समझ आता है कि ये किसी भी हाल में पुलिसकर्मी नहीं हो सकते। घटना स्थल पर मौजूद अन्य सादे कपड़ों वाले असली पुलिसकर्मियों और इन युवकों के चेहरे व पहनावे में अंतर साफ दिखाई दे रहा था।
मीडिया में आए वीडियो फुटेज में उन्हें अक्सर प्रदर्शनकारियों के साथ हाथापाई करते देखा गया है। उनकी पहचान पूछते ही, बिना कोई जवाब दिए वे महिलाओं, पुरुषों और पत्रकारों पर अंधाधुंध लाठियां बरसाकर उन्हें हटाने लगते थे। यहां तक कि जब प्रदर्शनकारी उनका वीडियो बना रहे थे, तो वे फोन छीनने के लिए उनकी तरफ झपटते हुए भी दिखाई दिए।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि वर्दी पहने पुलिसकर्मियों या चिह्नित सादे कपड़ों वाली पुलिस की तुलना में इन अज्ञात पहचान वाले युवकों का व्यवहार कहीं अधिक हिंसक और पूर्वाग्रह से ग्रस्त था। कुछ जगहों पर तो बिना वर्दी वाली इस 'पुलिस' द्वारा की जा रही अंधाधुंध पिटाई को रोकने के लिए खुद वर्दीधारी पुलिसकर्मियों को आगे आना पड़ा, ऐसा भी आरोप है। इससे कई लोगों को संदेह है कि सोमवार को दिल्ली पुलिस के साथ प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए एबीवीपी, भाजपा युवा मोर्चा या बजरंग दल के लठैतों की फौज को भी तैनात किया गया था। प्रत्यक्षदर्शियों के एक हिस्से ने पहले ही कम से कम एक ऐसे युवक की पहचान की है, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में एबीवीपी समर्थित एक असामाजिक तत्व के रूप में जाना जाता है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचलने के लिए आरएसएस से जुड़े असामाजिक तत्वों का इस्तेमाल करना दिल्ली पुलिस के लिए कोई नया नहीं है। वर्ष 2020 में भी इसी तरह से विभिन्न उग्र दक्षिणपंथी संगठनों के उपद्रवियों का इस्तेमाल कर शाहीन बाग के प्रदर्शन को खत्म कराया गया था। सांप्रदायिक दंगों का उकसावा देकर उमर खालिद सहित लोकतांत्रिक आंदोलन के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। विभिन्न हलकों से यह आरोप लग रहे हैं कि यही रणनीति इस बार भी अपनाई गई है।
सोमवार को दिल्ली की सड़कों से कई सौ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया। विभिन्न इलाकों में बिना किसी उकसावे के अंधाधुंध गिरफ्तारियां जारी हैं। कई युवा अपने जीवन में पहली बार किसी ऐसे प्रदर्शन में शामिल हुए थे, जहां आंसू गैस और वॉटर कैनन से बचने के लिए वे हेलमेट, स्विमिंग गॉगल्स (चश्मा) और N-95 मास्क पहनकर आए थे। सोमवार रात तक सड़कों पर जैसे ही कोई इस तरह के सामान के साथ दिखा, उसे तुरंत प्रिसन वैन में डाल दिया गया।
मंगलवार रात तक भी कम से कम 100 प्रदर्शनकारियों को रिहा करने से दिल्ली पुलिस ने इनकार कर दिया है। आरोप है कि उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर बंधक बनाकर रखा गया है। इसके विरोध में मंगलवार रात 8 बजे से दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर कॉकरोच जनता पार्टी ने धरना शुरू कर दिया। पार्टी के दो घंटे के धरने के बाद आखिरकार पुलिस प्रशासन हिरासत में लिए गए सभी प्रदर्शनकारियों को छोड़ने पर मजबूर हुआ। इसके बाद ही मुख्यालय के सामने से धरना हटाया गया।
हालांकि, जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन अभी भी जारी रहेगा। शिक्षाविद और सोनम वांगचुक भी अनशन पर बैठेंगे। सोमवार सुबह इस परिसर में बने प्रदर्शन मंच और टेंट को दिल्ली पुलिस ने उखाड़ दिया था, लेकिन रात होते-होते प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्च से लौटकर दोबारा इस परिसर पर अपना नियंत्रण कर लिया।
मंगलवार को जंतर-मंतर पर आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए अभिजीत दिपके ने कहा, "कल स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के आवास पर सीजेपी के प्रतिनिधियों को बैठक के लिए बुलाकर हमें समय नहीं दिया गया। हमारे प्रतिनिधि आशुतोष रांका और सौरभ दास को नड्डा के आवास पर एक प्रकार से बंधक बनाकर रखा गया। उनके मोबाइल फोन छीन लिए गए। उन्हें करीब पांच घंटे तक वहां बैठाकर रखने का मुख्य उद्देश्य यही था कि उन्हें मुख्य आंदोलन से अलग कर दिया जाए और एक भ्रम की स्थिति पैदा की जाए—ताकि सड़कों पर आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस का हमला आसान हो सके।"
दूसरी ओर, शनिवार को जंतर-मंतर से वांगचुक का अपहरण करने के बाद पिछले चार दिनों से उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। उन्हें किसी अन्य अस्पताल में स्थानांतरित (शिफ्ट) करने की मांग को लेकर वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मंगलवार को हाईकोर्ट ने सफदरजंग अस्पताल से हटाकर उन्हें परिवार की पसंद के अस्पताल में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है। आंग्मो की याचिका में कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के स्थान पर इलाज कराने का पूरा अधिकार है और राजनीतिक दुर्भावना के कारण ही उन्हें सफदरजंग अस्पताल में कैद रखा गया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने वांगचुक के स्वास्थ्य में आ रही गिरावट पर डॉक्टरों की चिंता को ध्यान में रखते हुए सरकार की सहमति से यह निर्देश जारी किया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अस्पताल बदलने का यह निर्णय पूरी तरह से वांगचुक के मौलिक अधिकारों की रक्षा और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए लिया गया है, और पत्नी होने के नाते गीतांजलि देवी बिना किसी बाधा के उनके साथ रह सकती हैं।
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साभार:- गणशक्ति
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