इंद्रधनुषी शब्दों के
रंग-बिरंगे मायाजाल को
उसी तरह चीर कर
जैसे अंडे में से
निकलता है चूज़ा
वैसे ही
बाहर निकलने का वक्त है
जन समाचार मंच
इंद्रधनुषी शब्दों के
रंग-बिरंगे मायाजाल को
उसी तरह चीर कर
जैसे अंडे में से
निकलता है चूज़ा
वैसे ही
बाहर निकलने का वक्त है

यही वक्त है
बिल्कुल यही वक्त है
अपनी उंगलियों से
रंग तितलियों के पोंछ
उन्हें स्याही में डुबोने का
यह सही वक्त है
इंद्रधनुषी शब्दों के
रंग-बिरंगे मायाजाल को
उसी तरह चीर कर
जैसे अंडे में से
निकलता है चूज़ा
वैसे ही
बाहर निकलने का वक्त है
यही वक्त है
जब हर चीज़ को
उसके सही नाम से
बुलाया जाना चाहिए
बीच चौराहे पर
चीखते हुए
चोर को चोर
हत्यारे को हत्यारा
पाखंडी को पाखंडी
बलात्कारी को बलात्कारी
कमीने को कमीना
कहने का
यही सही वक्त है
बहुत दिनों तक
रामनामी में छुरे लपेटकर
और धर्मग्रंथों में
कामशास्त्र की
पोथी छिपाकर
घूमने वाले चंटों
लंपटों को
पंडित ज्ञानी कहकर
बहुत भोग चुके
महामूर्खमार्तंड को
महामार्गदर्शक
मानकर
जो हिमालय जैसी
भूल की थी
उसे सुधारने का
यही वक्त है
यही सही वक्त है
कि अब निर्भय होकर
गुंडे को गुंडा कहें
केंचुए को केंचुआ
और जेबकतरे को
सिर्फ़ जेबकतरा कहें
कुछ और नहीं
जो अब तक कहते आए हैं
यही वक्त है
यह तै करने का
कि जब आप
ग़लत चीज़ों को
उनके सही नाम से
नहीं पुकारते हो
तो वह संज्ञा
नष्ट हो जाती है
जिसका इस्तेमाल
ग़लत चीज़ों के लिए
किया गया था
जैसे
नष्ट हो गई
कुछ महत्वपूर्ण संज्ञाएं
जैसे
राष्ट्र
जैसे देशभक्ति
ईश्वर
संसद
संविधान
विकास
न्याय
ज्ञान
शिक्षा
प्रज्ञा
ये सभी संज्ञाएं
बजबजाकर
दुर्गंध फेंक रही हैं
इसलिए
बची रहे भाषा
बचे रहें शब्द
अपने सही अर्थों में
इसलिए
अब बिल्कुल देर
नहीं करनी है
सभी को
निकलना होगा
घर से बाहर
चौराहे पर खड़े होकर
एक साथ चिल्ला कर
चोर को चोर
और मूर्ख को मूर्ख
कहना ही होगा
इससे पहले
कि हम शब्दों के असली अर्थ
भूल जाएं
हमें निकल पड़ना चाहिए
- हूबनाथ
[लेखक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक "हूबनाथ" 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]
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प्रकाशित: 22 जुलाई 2026 • 2 मिनट पठन

प्रश्न करना /
राजद्रोह /
आंदोलन करना /
देशद्रोह /
हक़ मांगना /
राष्ट्रद्रोह /
बना दिया ।
इन सबके बावजूद /
लोग डर नहीं रहे /
छोटे-छोटे बच्चे /
खिलाफत को /
उतारू हैं ।
16 सितंबर 2026

मंगलवार दोपहर गड़वेता के अमलागोड़ा तिराहे पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने हथौड़े से लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। उससे पहले शनिवार रात शालबनी में हमला हुआ था। शालबनी बाजार के पास सीपीआई(एम) का पुराना कार्यालय 'तुलसी भवन' है। सोमवार आधी रात को सबल और बड़े सीमेंट के खंभों से गेट तोड़कर बीजेपी कार्यकर्ता अंदर घुसे। उन्होंने टीवी, कंप्यूटर, रसोई गैस, पंखे समेत अन्य सामान लूट लिया। इसके बाद तोड़फोड़ करके आग लगा दी।
16 सितंबर 2026

हम तो /
नारी शक्ति के समक्ष /
नतमस्तक हैं ।
हम सभी /
एक स्त्री से ही तो /
जनमे हैं ।
उसी के संरक्षण में /
हमारा स्वर्णिम /
बालपन बीता है ।
12 सितंबर 2026

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026
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